भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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कहने लगे—“सीं दो इत्ते, जलदो सजाकर ।”

रंडीसे कहा पहन लो, ऐ ! जान पहले नहाकर ॥”

इस शब फिर उसे, पास छलाती हैं रंडियाँ ।

वेदाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रंडियाँ ॥

शब-भर तो मज़ा सेठजीने, खूब उड़ाया ।

रंडीने सेहर होते ही, एक फ़िक़रा बनाया ॥

ऐसा कोई मर्द नहीं, आज तक आया ।

रग-रगमें मेरे दर्द था, तुम्हने मिटाया ॥

वे-परकी देखो कैसी, उड़ाती हैं रण्डियाँ ।

वे दाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रंडियाँ ॥

ये छुमते ही फिर सेठजी, फूलें न समोये ।

घरमें था जो कुछ मालोज़र, सारा ही ले आये ॥

गुलझरें कई रोज़ तक, खूब उड़ाये ।

जब कुछ न रहा पास, तो फिर फ़ाक्रोंपर आये ॥

शब लुब्बा बेईमान, बताती हैं रंडियाँ ।

वेदाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रंडियाँ ॥

रंडीने मूँड़-माँड़के, जब घरसे निकाला ।

आँखें जो खुलीं फिर, तो नज़र आया उजाला ॥

जो कहता था वहनोई, वह कहता नहीं साला ।

जब कुछ न रहा पास, तो अपने लगे मांसा ॥

शब=रात । शबभर=रातभर । सेहर होते ही=खेरा होते ही रग-रग=नस-नस । बेघर की=बिना सिर-पंर की । फाक्रों पर आये=उपवास करने लगे—भूखों मरने लगे ।

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