शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
पृष्ठ 473, कुल 544 में से
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कहने लगे—“सीं दो इत्ते, जलदो सजाकर ।”
रंडीसे कहा पहन लो, ऐ ! जान पहले नहाकर ॥”
इस शब फिर उसे, पास छलाती हैं रंडियाँ ।
वेदाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रंडियाँ ॥
शब-भर तो मज़ा सेठजीने, खूब उड़ाया ।
रंडीने सेहर होते ही, एक फ़िक़रा बनाया ॥
ऐसा कोई मर्द नहीं, आज तक आया ।
रग-रगमें मेरे दर्द था, तुम्हने मिटाया ॥
वे-परकी देखो कैसी, उड़ाती हैं रण्डियाँ ।
वे दाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रंडियाँ ॥
ये छुमते ही फिर सेठजी, फूलें न समोये ।
घरमें था जो कुछ मालोज़र, सारा ही ले आये ॥
गुलझरें कई रोज़ तक, खूब उड़ाये ।
जब कुछ न रहा पास, तो फिर फ़ाक्रोंपर आये ॥
शब लुब्बा बेईमान, बताती हैं रंडियाँ ।
वेदाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रंडियाँ ॥
रंडीने मूँड़-माँड़के, जब घरसे निकाला ।
आँखें जो खुलीं फिर, तो नज़र आया उजाला ॥
जो कहता था वहनोई, वह कहता नहीं साला ।
जब कुछ न रहा पास, तो अपने लगे मांसा ॥
शब=रात । शबभर=रातभर । सेहर होते ही=खेरा होते ही रग-रग=नस-नस । बेघर की=बिना सिर-पंर की । फाक्रों पर आये=उपवास करने लगे—भूखों मरने लगे ।