शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
पृष्ठ 474, कुल 544 में से
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लो इस तरह, हज़ामत बनाती हैं रंघियाँ।
बेदाने सुर्ग-दिलको, फँसाती हैं रंघियाँ।
इकतरफ़ा और गज़ब, फ़लक-पीरने डाला।
गरमी जो हुई, फिरते हैं पक्ड़े हुए ख़ाला॥
जुज़ बहुत नहीं, और कोई पूछनेवाला।
फिर नीमको टहनोसे, पड़ा उनके पाखा॥
दोज़ख़का मज़ा अब तो, चलाती हैं रंघियाँ।
बेदाने सुर्ग-दिलको, फँसाती हैं रंघियाँ।
जिस कमरे पे होली थी, बहुत ब्यापकी इज़ज़त।
अब कोई नहीं पूछता, यह हो गई हालत॥
बेज़ार हैं सुरतसे, ग़ज़ब हो गई नफ़रत।
भड़वाँका इशारा है, कहाँको है ये मिष्ठत॥
किस जिह्वासे बनावोसे, उठाती हैं रंघियाँ।
बेदाने सुर्ग-दिलको, फँसाती हैं रंघियाँ॥
अब भी तुम्हें कुछ शर्मा, मियाँ सेठजी ! ब्राई।
जब बरमें गये, ज़तौसे मारे है खुग्राई॥
लो सुफ़तमें हसवा हुई, जिह्वा भी उठाई।
न माँ है : वफ़ादार, न फ़रज़न्द न माई॥
ज़्तों पे जो बैठें, तो उठाती हैं रंघियाँ।
बेदाने सुर्ग-दिलको, फँसाती हैं रंघियाँ॥
5 ग़ज़ब=शक्ति। फ़लक=श्राप्मान। पीर=देवता। गरम=श्रात- यक, उपदंश। ख़ाला=शिरन, लिंगोन्दिप। दोज़ख़=नरक। हसवा= बदनामी। फ़रज़न्द=बेटा।