शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
पृष्ठ 475, कुल 544 में से
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तरह हुए इकने, फिर आके सताया।
जाकरके लवे बाँम, यह रो-रोके छुआया ॥
जो माल कि था पास मेरे, मैंने लुटाया।
अब रख लो मुलाजिम, तो रहे आपका साया ॥
क्या रंग ज़मानेका, दिखाती हैं रँडियाँ।
वे-दाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रँडियाँ ॥
“शहबाज़” कलम रोक, अब आगे न बढ़ाना।
इतना ये बहुत है, जो तेरे कहनेको माना ॥
रंडोसे वफ़ा कब है ? यह जानता है ज़माना।
इस शब वह होती इमिला, खिन्न उसको ज़माना ॥
हसको नवाँ महीनो, बनाती हैं रँडियाँ।
वे-दाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रँडियाँ ॥
लो और सुनो सेठको, क्रिस्मतकी डुराई।
रंडीके जो लड़की दुहे, वह किसकी कहलाई ॥
हरेकने फिर उनकी तरफ़, उँगली उठाई।
रंडीकी जो लड़की है, इन्हींकी तो है जाई ॥
अब रिश्तेदार तुमको, बनाती हैं रँडियाँ।
वेदाने-मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रँडियाँ ॥
रंडीने छूटी नहाके, लो फिर रात जगाई।
हर भड़वा हरेक रंडी, हरेक नायका आई ॥
बरह हुए=दूर हुए। इश्क़=प्रेम। मुलाजिम=नौकर। साया=छाया। शहबाज़=कविका नाम है, जिसने यह कविता बनाई है। वफ़ा=भलाई। इमिला=गर्भवती। ज़माना=दुनिया। रात जगाई=रतजगा किया।