भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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तरह हुए इकने, फिर आके सताया।

जाकरके लवे बाँम, यह रो-रोके छुआया ॥

जो माल कि था पास मेरे, मैंने लुटाया।

अब रख लो मुलाजिम, तो रहे आपका साया ॥

क्या रंग ज़मानेका, दिखाती हैं रँडियाँ।

वे-दाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रँडियाँ ॥

“शहबाज़” कलम रोक, अब आगे न बढ़ाना।

इतना ये बहुत है, जो तेरे कहनेको माना ॥

रंडोसे वफ़ा कब है ? यह जानता है ज़माना।

इस शब वह होती इमिला, खिन्न उसको ज़माना ॥

हसको नवाँ महीनो, बनाती हैं रँडियाँ।

वे-दाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रँडियाँ ॥

लो और सुनो सेठको, क्रिस्मतकी डुराई।

रंडीके जो लड़की दुहे, वह किसकी कहलाई ॥

हरेकने फिर उनकी तरफ़, उँगली उठाई।

रंडीकी जो लड़की है, इन्हींकी तो है जाई ॥

अब रिश्तेदार तुमको, बनाती हैं रँडियाँ।

वेदाने-मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रँडियाँ ॥

रंडीने छूटी नहाके, लो फिर रात जगाई।

हर भड़वा हरेक रंडी, हरेक नायका आई ॥


बरह हुए=दूर हुए। इश्क़=प्रेम। मुलाजिम=नौकर। साया=छाया। शहबाज़=कविका नाम है, जिसने यह कविता बनाई है। वफ़ा=भलाई। इमिला=गर्भवती। ज़माना=दुनिया। रात जगाई=रतजगा किया।