शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
पृष्ठ 476, कुल 544 में से
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बोली कि सुबारक हो, यह दौलत तुने पाई ।
सदके तेरी बच्ची, यह खिलायेगी कमाई ॥
लो तुल्का नातहकीक, कहाती हैं रडियां ।
वे दाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रडियां ॥
इन सेठके लड़केने, उधर होय संभाला ।
लड़कीने जवान होते ही, जोबनको निकाला ॥
शैतानने इन दोनोंको, फिर बोखला डाला ।
लड़केने सेठकी उसी लड़कीको संभाला ॥
भाई-बहनको, पास छलाती हैं रडियां ।
वे दाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रडियां ॥
शैतानको श्रापिदें हैं, जरियते शैतान ! ।
लाहौल नहीं पकते, किधर है तुम्हारा ध्यान ? ।
दौलत भी गई मुस्तमें, खोया गया ईमान् ।
गर लाख रुपये दोजिये, तो क्या इनपर है ऐहसान ॥
और अपना ही ऐहसान, जताती हैं रडियां ।
बेदाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रडियां ॥
उपपत्त ।
जातिहीन, कुलहीन, अन्ध ; कुसित कुरूप नर ।
जरा-यसित कशगात, गलितकुडी अरु पांडर ।
सुबारक हो=फलों-फूलों; बधाई है । सदक=बलैयाँ लूँ ; कुबान होऊँ । तुल्का नातहकीक=जिधके बीजका पता न हो । बोखला डाला=पागल बसाया ; गुमराह किया । शैतान=खुदाका मुझालिफ, जो लोगोंको पुरी राह पर चलनेको बहकाता है । जरियते शैतान=शैतानको औलाद । लाहौल=नफरतका कलम । *
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