भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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( ४०१ )

बोली कि सुबारक हो, यह दौलत तुने पाई ।

सदके तेरी बच्ची, यह खिलायेगी कमाई ॥

लो तुल्का नातहकीक, कहाती हैं रडियां ।

वे दाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रडियां ॥

इन सेठके लड़केने, उधर होय संभाला ।

लड़कीने जवान होते ही, जोबनको निकाला ॥

शैतानने इन दोनोंको, फिर बोखला डाला ।

लड़केने सेठकी उसी लड़कीको संभाला ॥

भाई-बहनको, पास छलाती हैं रडियां ।

वे दाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रडियां ॥

शैतानको श्रापिदें हैं, जरियते शैतान ! ।

लाहौल नहीं पकते, किधर है तुम्हारा ध्यान ? ।

दौलत भी गई मुस्तमें, खोया गया ईमान् ।

गर लाख रुपये दोजिये, तो क्या इनपर है ऐहसान ॥

और अपना ही ऐहसान, जताती हैं रडियां ।

बेदाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रडियां ॥

उपपत्त ।

जातिहीन, कुलहीन, अन्ध ; कुसित कुरूप नर ।

जरा-यसित कशगात, गलितकुडी अरु पांडर ।

सुबारक हो=फलों-फूलों; बधाई है । सदक=बलैयाँ लूँ ; कुबान होऊँ । तुल्का नातहकीक=जिधके बीजका पता न हो । बोखला डाला=पागल बसाया ; गुमराह किया । शैतान=खुदाका मुझालिफ, जो लोगोंको पुरी राह पर चलनेको बहकाता है । जरियते शैतान=शैतानको औलाद । लाहौल=नफरतका कलम । *

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