भारतकोश
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शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

Devanagarihipublished544 पृष्ठ

( ४०१ )

बोली कि सुबारक हो, यह दौलत तुने पाई ।

सदके तेरी बच्ची, यह खिलायेगी कमाई ॥

लो तुल्का नातहकीक, कहाती हैं रडियां ।

वे दाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रडियां ॥

इन सेठके लड़केने, उधर होय संभाला ।

लड़कीने जवान होते ही, जोबनको निकाला ॥

शैतानने इन दोनोंको, फिर बोखला डाला ।

लड़केने सेठकी उसी लड़कीको संभाला ॥

भाई-बहनको, पास छलाती हैं रडियां ।

वे दाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रडियां ॥

शैतानको श्रापिदें हैं, जरियते शैतान ! ।

लाहौल नहीं पकते, किधर है तुम्हारा ध्यान ? ।

दौलत भी गई मुस्तमें, खोया गया ईमान् ।

गर लाख रुपये दोजिये, तो क्या इनपर है ऐहसान ॥

और अपना ही ऐहसान, जताती हैं रडियां ।

बेदाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रडियां ॥

उपपत्त ।

जातिहीन, कुलहीन, अन्ध ; कुसित कुरूप नर ।

जरा-यसित कशगात, गलितकुडी अरु पांडर ।

सुबारक हो=फलों-फूलों; बधाई है । सदक=बलैयाँ लूँ ; कुबान होऊँ । तुल्का नातहकीक=जिधके बीजका पता न हो । बोखला डाला=पागल बसाया ; गुमराह किया । शैतान=खुदाका मुझालिफ, जो लोगोंको पुरी राह पर चलनेको बहकाता है । जरियते शैतान=शैतानको औलाद । लाहौल=नफरतका कलम । *

२६

( ४०२ )

ऐसेहू धनवान होय, तो आदर वाकौ।

अपनो गात बिछाय, लेत रस सर्वस ताकौ।

गनिका विवेक-बेलकों, कदन करनवारी।

निरखि बच रहे कुलवन्त नर, रचत पचत मूरख हरषि ॥८६

89. What sensible man would like to have sexual intercourse with those prostitutes who give away their beautiful bodies for the sake of a little wealth even to those who are born blind, are ugly, are inactive due to old age, are foolish, are of low caste and are suffering from leprosy. These prostitutes are like knives to cut the creeper of reasoning.

—*—

वेश्यासौ मदनज्वाला रूपेन्यनसेमथिता ॥

कामिर्भिर्यत्र ह्यनन्ते यौवनानि धनानि च ॥६०॥

यह वेश्या सुन्दरता रूपी ईधनसे जलती हुई प्रचण्ड कामाग्नि है। कामी पुरुष इस अग्निमें अपने यौवन और धनकी आहुति देते हैं ॥६०॥

खुलासा—वेश्या तेज् आगके समान है। जिस तरह आग लकड़ियोंसे जलती है; उसी तरह वेश्या रूपी अग्नि वेश्या के रूप-रूपी ईधनसे जलती है। जिस तरह होमकी अग्निमें घृत, चाँवल और तिल प्रभृतिको आहुति दी जाती है; उसी तरह वेश्याग्निमें कामी लोग अपनी जवानी और धनकी आहुति देते हैं। होमकी अग्निमें घृत चाँवल प्रभृति जिस तरह जल कर

( ४०३ )

राख हो जाते हैं; उसी तरह वेश्या-रूपी अग्निमें, कामियों के रूप, यौवन और धनकी राख हो जाती है। सारांश यह कि, वेश्यासे प्रीति करने वालोंके रूप, यौवन और धन कृतई नाश हो जाते हैं। रणडीबाज़ी करने वाले अनेकों करोड़पति स्नाकपति और दर-दरके मिखांरों हो गये। अतः बुद्धिमानोंको इस वेश्या-रूपी भयङ्कर अग्निसे सदा दूर रहना चाहिये; क्योंकि जिस तरह अग्निमें गिरनेवाला सर्वथा भस्म हो जाता है; उसी तरह वेश्या-रूपी अग्निमें गिरने वाला भी सर्वथा भस्म हो जाता है; • क्योंकि रूप-यौवन तो चन्द्र रोज़में हो स्वाहा हो जाते हैं। जब तक धन रहता है, वेश्या प्यार (झूटा दिखावटो प्यार) करती है। कामी धनहीन हुआ कि, वेश्याने उसे घरसे धक्के देकर या जूतियाँ लगवा कर निकाला। जब कामी इस दुर्गतिको पड़ु ब जाता है, तब वह या तो विष प्रभृति खाकर या गलेमें फाँसी लगा कर मर जाता है अथवा बोरी वगैरः करनेसे पकड़ा जाकर जेलमें ठूस दिया जाता है। वहाँ वह दुःख पाकर मर जाता है। अगर जेलकी अवधि पूरी करके चला भी आता है, तो फिर वेश्याके लिये धन देनेको बोरी प्रभृति करता है या किसीको हत्या करके, उसका धन हथियानेकी चेष्टामें पकड़ा जाकर, फाँसी पर लटक दिया जाता है।

दोहा ।

गनिका कनिका अगिन की, रूप समिध मजबूत ।

होम करत, कामी पुरुष, धन यौवन याहूत ॥६०॥

( ४०४ )

सार—वेश्या धन और प्राणों के नाश करने वाली भयङ्कर अग्नि है ।

90 The prostitutes are the flames of passion burning with the fuel of beauty. Lustful men throw into that fire their wealth and health.

—*

करचुम्बति कुलपुरुषो वेश्याधरपल्लव मनोहमपि ।

चारभटचौरचेटकनटविदनिधीवनशरावम् ॥६१॥

वेश्याका अवर-पल्लव ( ब्राँठ ) यद्यपि अतीव मनोहर है ; किन्तु वह जासूस, सिपाही, चोर, नट, दास, नीच और जारोंके थूकनेका ठीका है । इसलिये कौन कुलीन पुरुष उसे चूमना चाहैगा ॥६१॥

खुलासा—सुन्दरी वेश्या के होठ निश्चय ही बढ़े मनोहर होते हैं, परन्तु उसके सुन्दर होठोंको चोर, बदमाश, गुण्डे, गुलाम, डाकू और भाँड़ प्रभृति महानीच चूमते और चूसते हैं ; इसलिये वह महाअपवित्र और गन्दे हो जाते हैं । ऐसे गन्दे और नापाक ओठोंको कौन प्रतिष्ठित और ऊँचे कुल का पुरुष चूमना चाहता है ? अर्थात् उसे नीच लोग ही चूमना चाहते हैं ; कुलीन पुरुष उस नीचोंके थूकनेके ठीकरके अपनी जीभ लगा कर उसे गन्दी नहीं करते ।

पहले लिख आये हैं कि, वेश्या पैसेकी गुलाम है, उसे पैसे

( ४०५ )

से प्रेम है । वह रूप, यौवन, गुण, विद्या और उत्तम वंश प्रभृति को नहीं देखती ! उसे यदि भङ्गी और चमार धन दें, तो वह उन्हींकी हो जाती है । उसके सुन्दर ओठोंको वही चूमते-चाटते और उसके शरीरको गन्दा करते हैं । जिसे कुछ भी पवित्रता-अपवित्रताका ध्यान है, जिसने उच्च कुल और उत्तम वर्णमें जन्म लिया है, वह वैसी गन्दगीकी खानसे नेह लगाकर, क्यों अपनी आत्माको कलुषित करेंगी ? वेश्या नीच पापियोंके योग्य है, अतः नीच लोग ही उसके पास जायेंगे । भङ्गी और चमारोंका काम भङ्गी-चमार ही करेंगे ; ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य उनके कामोंको हरगिज़ न करेंगे ।

सोरठा ।

गनिकाके मृदु थोठ ; को कुलीन चुम्बन करें ? ।

नट, मट, विट, ठग, गोठ ; पीकपाल है सबनको ॥६१॥

सार— वेश्याएँ महा अधम और पापियोंके द्वारा भोगी जाती हैं, अतः वे श्रेष्ठ-कुलोत्पन्न पुरुषोंके योग्य नहीं ।

91. Though the leaf-like lips of a prostitute are beautiful, yet what respectable person would kiss that which is the pot where cheats, rogues, rustics, thieves and knaves throw their saliva.

—*

( ४०६ )

धन्यास्त एव चपलायतलोचनानां

तारुण्यदर्पवनपीनपयोधराणाम् ॥

चामोदरोपरिलसत्त्रिवलीलतानां

हृदृवाऊर्ति विकृतिभेति मनो न येषाम् ॥६२॥

चञ्चल और बड़ी-बड़ी आँखों वाली, यौवनेके अभिमानसे पूर्ण, हृद और पुष्ट स्तनों वाली एवं क्षीण उदर-भाग पर त्रिवलीसे सुशोभित युवती स्त्रियोंकी सूत्र देखकर, जिन पुरुषोंके मनमें विकार उत्पन्न नहीं होता, वे पुरुष धन्य हैं ।

खुलासा—बड़ी-बड़ी चञ्चल आँखों वाली, नारङ्गियोंके समान गोल और कठोर स्तनों वाली तथा पेटके अघोभाग पर तीन रेखाओं वाली जवान स्त्री को देखकर किसी विरुद्ध ही माईके लालके मनमें अनुराग उत्पन्न नहीं होता । जिसके मनमें ऐसी सुन्दरीको देखकर उथल-पुथल नहीं मचती, जिसका मन ऐसी नारीको देखकर विचलित नहीं होता, वह पुरुष निश्चयः ही क्राबिल-तारीफ़ है । उसने संसारको जीत लिया है । उससे बढ़कर और शूरवीर नहीं । वह चेष्टा करनेसे सहजमें परमपद पा सकता है । जिसका मन ऐसी सुन्दरी पर नहीं चलता, उसका मन और किसी भी संसारी पदार्थ पर चल नहीं सकता । जिसे ऐसी तक्षणीसे विराग है, उसे संसारसे विराग है । जिसे ऐसी नारीसे चिरक्ति है, वह निश्चय ही महात्मा है । किसोने ठीक ही कहा है :—

( ४०७ )

सानुरागां क्षिप्रं दृष्ट्वा, मृत्युं वा समुपस्थितम् ।

आविकलमनाः स्वस्थो, मुक्त एव महाशयः ॥

अनुराग-पूर्णं स्त्री और मौतको सामने देखकर भी, जिसका मन व्याकुल नहीं होता, वह महाशय मुक्त-रूप है ।

दोहा ।

जीए लंक अरु पीन कुच, लखि तिथके हगतीर ।

जे अधीर नहिं करत मन, धन्य-धन्य ते धीर ॥६२॥

सार—परमा रूपवती नवीना नारी पर जिस का मन नहीं चलता, वह मनुष्य नहीं देवता है ।

92. Blessed are those whose minds are not disturbed on looking at the woman who has restless big eyes, is young and handsome, has full grown and high breasts and on whose thin belly are the elegant lines,

—*—

बाले लीलामुकुलितमभी सुन्दरा दृष्टिभाताः

किं चिप्पन्ते विरम विरम व्यर्थ एष श्रमस्ते ॥

सम्पत्यन्ये वृद्धमुपरतं बाल्यमास्या बनान्ते

जीणो मोहस्तृणमिव जगज्जालमालोकयामः ॥६३॥

( ४०६ )

धन्यास्त एव चपलायतलोचनानां ताख्ययदर्पवनपीनपयोधराणाम् ॥ त्रामोदरोपरिलसत्त्रिवलीलतानां

हृष्ट्वाऽकृतिं विठ्ठतिमेति मनो न येषाम् ॥६२॥

चञ्चल और बड़ी-बड़ी आँखों वाली, यौवनके अभिमानसे पूर्ण, हृद् और पुष्ट स्तनों वाली एवं क्षीण उदर-भाग पर त्रिवलीसे सुशोभित युवती स्त्रियोंकी सूत्र देखकर, जिन पुरुषोंके मनमें विकार उत्पन्न नहीं होता, वे पुरुष धन्य हैं ।

खुलासा—बड़ी-बड़ी चञ्चल आँखों वाली, नारङ्गियोंके समान गोल और कठोर स्तनों वाली तथा पेटके अधोभाग पर तीन रेखाओं वाली जवान स्त्री को देखकर किसी विरले ही माईके लालके मनमें अनुराग उत्पन्न नहीं होता । जिसके मनमें ऐसी सुन्दरीको देखकर उथल-पुथल नहीं मचती, जिसका मन ऐसी नारीको देखकर विचलित नहीं होता, वह पुरुष निश्चयः ही क्राबिल-तारीफ़ है । उसने संसारको जीत लिया है । उससे बढ़कर और शूरवीर नहीं । वह चेष्टा करनेसे सहजमें परमपद पा सकता है । जिसका मन ऐसी सुन्दरी पर नहीं चलता, उसका मन और किसी भी संसारी पदार्थ पर चल नहीं सकता । जिसे ऐसी तहसीसे विराग है, उसे संसारसे विराग है । जिसे ऐसी नारीसे विरक्ति है, वह निश्चय ही महात्मा है । किसीने ठीक ही कहा है :—

( ४०७ )

सानुरागां खिंये दृष्ट्वा, मृत्युं वा समुपस्थितम् ।

अविकलमनाः स्वस्थो, मुक्त एव महाशयः ॥

अनुराग-पूर्णं स्त्री और मौतको सामने देखकर भी, जिसका मन व्याकुल नहीं होता, वह महाशय मुक्त-रूप है ।

दोहा ।

जीए लंक अरु पीन कुच, लखि तियके हगतीर ।

जे अधीर नहिं करत मन, धन्य-धन्य ते धीर ॥६२॥

सार—परमा रूपवती नवीना नारी पर जिस का मन नहीं चलता, वह मनुष्य नहीं देवता है ।

92. Blessed are those whose minds are not disturbed on looking at the woman who has restless big eyes, is young and handsome, has full grown and high breasts and on whose thin belly are the elegant lines.

—*—

बाले लीलामुकुलितमभी सुन्दरा दधिघाताः

किं चिप्पन्ते विरम विरम व्यर्थ एष भ्रमन्ते ॥

सम्पत्यन्ये वयमुपरतं बाल्यमास्या बनान्ते

जीणो मोहस्तृष्णामिव जगज्जालमालोकयामः ॥६३॥

( ४०८ )

हे बाले ! लीलासे ज़रा-ज़रा खुले हुए नेत्रोंसे सुन्दर कटाक्ष हम पर क्यों फैकती है ? विश्राम ले ! विश्राम ले ! हमारे लिये तेरा यह श्रम व्यर्थ है । क्योंकि अब हम पहले जैसे नहीं रहे ; अब हमारा छल्लोरपन चला गया, अज्ञान दूर हो गया । हम बनमें रहते हैं और जगज्जालको तिनकेके समान समझते हैं ।

93. Maiden ! why are you casting your sweet and sportful glances at me ? Pray, stop there. Your efforts in this connection are useless. I am a changed man now. Youth has passed away. I long to live in the woods now. My illusion is gone. I consider the worldly bondage as that of straw.

—*—

इयं बाला मां प्रत्यनवरतभिन्दीवरदल—

प्रभाचेरं चक्षुः क्षिपति किमभिप्रेतमनया ॥

गता मोहोऽस्माकं स्मरशबरबाणव्यतिकर—

ज्वलज्ज्वालाः शान्तास्तदपि न वराकी विरमति ॥६४॥

इस बालाका क्या मतलब है, जो यह अपने कमल-दलकी शोभाको तिरस्कार करनेवाले नेत्रोंको मेरी ओर चलाती है ? मेरा अज्ञान नाश हो गया और कामदेव रूपी भीलके बाणोंसे उत्पन्न हुई अग्नि भी शान्त हो गई, तथापि यह मूर्खा बाला विश्राम नहीं लेती ! ॥६४॥

94. What does this young woman mean by casting her eyes, which surpass the beauty of the lotuses, constantly on me ? I

( ४०६ )

am no longer under the charm of illusions. The fire of passion kindled by the arrows of Cupid, have subsided in me and yet this foolish girl would not desist

—**—

शुभ्रं सच्च सविश्रमा युवतयः श्वेतातपनोज्ज्वला

लक्ष्मीरित्यनुभूयते स्थिरभिवस्फूतिं शुभे कर्मणि ॥

विच्छिन्नने नितरामनङ्गकलहकीडावुटतन्तुक्

मुक्ताजालमिव प्रायाति क्षतिंति अशयदिशो दृश्यतामर् ॥१६५॥

जब तक मनुष्यके पूर्वजन्मके शुभ कर्मोंका प्रभाव रहता है, तब तक उज्ज्वल भवन, हाव-भाव-युक्त सुन्दरी नारियों और सफेद छत्र चँवर प्रभृतिसे शोभायमान लक्ष्मी—ये सब स्थिर भावसे भोगने में आते हैं ; किन्तु पूर्वजन्मके पुण्योंका क्षय होते ही, ये सब सुखेच्छय्यके सामान—कामदेवकी क्रीडोंके कलहमें टूटे हुए हारके मोतियोंके समान—शीघ्र ही जहाँ-तहाँ लुप्त हो जाते हैं ॥१६५॥

खुलासा—जब तक मनुष्यके पहले जन्ममें किये हुए शुभ कर्म अथवा पुण्य कर्मोंका ओर-छोर नहीं आता, तभी तक सुन्दर-सुन्दर आलीशान महल, अपने हाव-भावों—नात्रो-अदाओंसे पुरुषका मन हरने वाली सुन्दरी ललनाये तथा छत्र, चँवर, रथ, घोड़े, हाथी, पालकी, जोड़ी, बगूची प्रभृति सुख-पेशव्य्यके सामान बने रहते हैं और पुरुष उन्हें स्थिरताके साथ भोगता है ; किन्तु ज्योंही उसके पूर्वजन्मके पुण्य-कर्मोंका अन्त

( ४१० )

हो जाता है, ईश्वरीय खातेमें पुण्य-कर्म नहीं रहते ; त्योंही उपरोक्त महल-मकान, जमीन-जायदाद, बाग-बगीचे, मनमोहिनी चन्द्रवदनी स्त्रियाँ और लक्ष्मी एवं क्षमता प्रभृति इस तरह विलाप जाते हैं ; जिस तरह रत-केलिके समय—स्त्री-पुरुषोंमें बीजातानी और भगड़ा-भगड़ी होनेसे—हारके मोती दूर-दूर कर चारों ओर लुप्त हो जाते हैं ।

दोहा ।

ॐ कर्मनके उदयमें, यह तिय चित सब ठोर ।

अस्त भये तीनों नहीं, ज्यों सुक्ता बिन-डोर ॥६५॥

सा०—जबतक मनुष्यके पूर्वजन्मके पुण्यों का चय नहीं होता, तब तक सारे संसारी सुखैश्वर्य्य बने रहते हैं ; पुण्य चय होने पर, वे क्षणभर भी नहीं रहते ।

95. A white palace, a good and loving young woman and the wealth with the ( royal ) symbol of white umbrella, are enjoyed only so long as there is the growth of good virtuous acts, but when they ( virtuous acts ) diminish then all the enjoyments run away from the man to different directions like the pearls of a garland broken in the quarrel of amorous plays.

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सदा योगाभ्यासव्यसनवश्योरात्ममत्तसो

रविच्छिन्ना मैत्री स्फुरति यमिनस्तस्यकिमु तैः ॥

( ४११ )

प्रियायामालापैरभरमधुर्भिवनत्रविधुभिः

सनरिवासामोदैः सकुचकलशारलेषुरैतैः ॥६६॥

जो अपने मनको वशमें करके, आत्माको सदा योगाभ्यास-साधनमें लगाये रहना ही पसन्द करते हैं—उन्हें प्यारी-प्यारी स्त्रियोंकी बात-चीत, अधराभूत, श्वासोंकी सुगन्धि सहित मुखचन्द्र और कुचकलशोंको हृदयसे लगाकर काम-क्रीडासे क्या मतलब ! ॥६६॥

खुलासा—जिनको अपनी इन्द्रियाँ और मनको वशमें रखने तथा योग-साधनका अभ्यास करनेके लाभ नहीं मालूम, वह विषय-भोग भोगना ही अच्छा समझते हैं और सदा भोग भोगनेमें ही मस्त रहते हैं। ऐसे कामियोंको एकान्तमें स्त्रियोंसे बातचीत या गुप्तगु कराना, उनके ओठ चूसना, उनके श्वाससे निकली मृगमद-कस्तूरीको लजानेवाली सुगन्धि सूर्यना, चन्द्र-माके समान मुखको चूमना और सोनेके दो कलशों या नार-द्वियों अथवा कच्चे-कच्चे सेबोंके समान कुचोंको छातीसे लगा कर उनसे संगम करना ही अच्छा लगता है ; किन्तु जिन्हें मन और इन्द्रियोंको क्राबूमें करके सदा योगाभ्यासका व्यसन रखना ही अच्छा लगता है, उन्हें सुन्दरियों की मीठी-मीठी बातें सुनना, उनके निचले होठको चूसना, उनके मुख की सुगन्धिका आस्वादन करना, उनके चन्द्राननको देखना, उनके गुलाबी गाल चूमना और दो कलशोंके समान ऊँचे उठे हुए कठोर कुचोंको हृदयसे लगा कर, उनके साथ संगम करना अच्छा नहीं लगता। वे

( ४१२ )

इन सबको वृथा समझते हैं। उन्हें इनमें जरा भी आनन्द नहीं मालूम होता।

सार—विषयासक्त कामियोंको स्त्रियाँ अच्छी लगती हैं ; पर इन्द्रिय-विजयी ज्ञानियों को निरन्तर योगाभ्यासमें लगे रहना ही अच्छा मालूम होता है।

9१. Of what use are the sweet conversation with a lovely woman, the nectar of her lips, her moon-like face with scented breath and the sweet enjoyment of sexual intercourse while pressing her pot-like breasts to the bosom, to those whose mind and soul are constant friends and take delight in the practice of concentration.

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त्रजितात्मसु सम्बद्धः समाधिकृतचापलः ।

मुजंगकुटिलः स्तब्धो श्रूविनेषः खलायते ॥१७॥

अजितेन्द्रिय मनुष्योसे सम्बन्ध रखनेवाला, चित्तकी एकाग्रता या समाधिमें अतीव चञ्चलता करनेवाला, सपके समान कुटिल और स्तब्ध स्त्रियोंका भूक्षेप या कटाक्ष खलके समान आचरण करता है ॥१७॥

खुलासा—स्त्रियोंका कटाक्ष (चतुरार्द्ध से भौंह चलाना) अजितेन्द्रियोंसे सम्बन्ध रखता है, चित्तकी एकाग्र रहने नहीं देता और समाधिको भङ्ग करता है, अतएव वह सपके समान कुटिल

भूतानिक

सुधासय चन्द्रमा अपने त्रय रोग की शान्ति के लिये, सीसी का रूप धारण कर, कसिनी के कोठों का अस्वत पी रहा है। मतलब यह है कि, खों के हाठों में ऐसा उत्तम अमृत है कि, उसे पाने के लिए, सुधा-कर—चन्द्रमा ने भी सीसी का रूप धारण किया है। (पृ० २५७)

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( ४३ )

और दुष्टोंका सा काम करने वाला है ; पर ध्यान रहे कि, वही कटाक्ष जितेन्द्रियों से सम्बन्ध नहीं रखता। वह उनका कुछ भी नहीं कर सकता। न वह उनकी चित्तकी एकाग्रतामें खल-बली डाल सकता है और न उनकी समाधि ही भंग कर सकता है।

दोहा ।

तिय-कटाक्ष खल-सरिस है, करत समाधिहि भंग ।

श्राकृत जन संसर्ग रत, शठ-इव कुटिल भुजंग ॥६७॥

सार—खलोंके समान आचरण करनेवाले स्त्रियोंके कटाक्षका जोर केवल कामियों पर ही चलता है; जितेन्द्रियोंका वह कुछ भी नहीं कर सकता।

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मतेभकुम्भपरिणहिनि कुंकुमाई

कान्तापयोधरतटे रसखेदखिलः ।

वन्नोनिधाय भुजप जरमव्यवर्ती

धन्यः ज्पां ज्ञपयति ज्गलव्यनिद्रः ॥६८॥

जो पुरुष मैथुनके श्रमसे थककर, मतवाले हाथीके कुम्भोंके समान वित्तीर्थ और केशद्रसे भोंगे हुए स्त्रीके स्तनों पर अपनी छाती

( ४१४ )

रखकर, उसके सुजा रूपी पञ्जरके बीचमें पड़ा हुआ, एक क्षण भी सोकर रात बिताता है, वह धन्य है ॥६॥

खुलासा—मैथुनके बाद पुरुष का बल क्षीण हो जाता है, मिनट दो मिनटके लिये उसमें उठनेको भी सामर्थ्य नहीं रहती ; तब वह खा को छातियों पर अपनी छाती रखे हुए, उसके दोनों हाथोंके बीचमें पड़ा हुआ, शान्ति की नींद-सी लेता या अपनी थकान दूर करता है । कवि महोदय कहते हैं, कि जो पुरुष क्षणभरके लिये भी, यह आनन्द उपभोग करता है वह भाग्यवान् है—उसने पूर्वजन्ममें पुण्य किये हैं ।

छप्पय ।

कुंकुम-कंदम-युक्त, मत्तगज कुम्भ बने मनु । कान्ता कुचतट माहिं सने, रस-खेद खिन्न जनु । तेहि भुज-पंजर मध्य, रहैं सुख सों लिपटाने । क्षण इक निद्रा लहै, क्षण बीतत नहि जानें । इमि निज वक्षस्थल ताहि सों, जोरि रहे जे शुभग नर । हैं तेई यहि संसारमें, धन्यवाद के योग्य वर ॥६॥

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सुधाभयोऽपि क्षयरोगशान्त्यै नासाध्रमुक्ताफलकच्छलेन । अरंगसञ्जीवनदृष्टिशक्तिमुखाभूतं ते प्रिवतीव चन्द्रः ॥६६॥

( ४१५ )

हे प्यारी ! यह चंद्रमा अमृतमय, अतएव काम चेतन्य करने वाला होनेपर भी, अपने द्वाय रोगकी शान्तिके लिये, नाकके अगले हिस्सेमें लटकते हुए मोतीके मिससे, तेरे अधरामृतको पी रहा है ॥६६

कवि महोदय स्त्री को नाकके अग्रभागमें लटकते हुए मोती को पूर्ण चन्द्रमा मान कर कहते हैं, कि हे सुन्दरि ! यद्यपि चन्द्रमा स्वयं अमृतमय है और वह पुरुषोंके हृदयोंमें कामोद्दीपन करने की शक्ति और सामर्थ्य रखता है ; तथापि वह, अपने राज-रोग या क्षयके आराम करनेके लिये, बड़ेसे मोतीका रूप धरके, तेरी नाककी बुलाक या नथमें लटका हुआ, तेरे हाथोंके अमृत को पान कर रहा है । रसिक कवि कहते हैं :—

दोहा ।

प्रिये ! सुधाकर रोग निज, क्षयी-निवृत्ति-उपाय । चन्द पिवत मधु अधरको, नथ-मोती-मिस आय ॥

दोहा ।

मनसिज-नर्दक अमृतमय, क्षयी-हरण शशि जान । नाशा-मोती मिस किये, करे अधरामृत पान ॥६६॥

सार—स्त्रीका अधरामृत सुधाकरके अमृत से भी अच्छा है ।

99. O lady ! although the moon is full of nectar and the sight of moon gives rise to sexual desires yet he is unable to cure his

( ४१६ )

own disease of phtisis and in order to cure himself of that disease, the moon has, as it were, transformed himself into a pearl pendant of your nose and is constantly tasting the nectar of your lips.

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दिश वनहरिणीभ्यो वंशकाण्डच्छवीनां

कवलमुपलकौटिच्छिन्नमूलं कुशानाम् ।

शुकयुवतिकपोलोपाण्डुतांबूलवल्ली-

यलमरुणनखायैः पाटितं वा वधूभ्यः ॥१००॥

हे पुरुषो ! या तो तुम वन-मृगियोंके लिये बाँसके दण्डेको समान छविवाली, पत्थरकी नोकसे कटी हुई मूलवाली, कुश नामक वासके प्राप्त दो अथवा सुन्दरी बहुओं के लिये लाल-लाल नाखुनोंसे तोड़े हुए सूई—तोतीके कपोलके समान, जरा-जरा पीले रंगके पान दो ॥१००॥

खुलासा—मनुष्यो ! दो में से एक काम करो :—(१) या तो घर-गृहस्थोंको मोह-ममता तोड़, बनमें जा, ईश्वराराधनमें मन लगाओ और पत्थरकी नोकसे कुश-वासकी जड़े काट-काट कर जड़ूली हिरनियोंको खुगाओ, अथवा घरमें रह कर सुन्दरी नवयुवतियोंको पके हुए पौले-पीले पानोंके बीड़े दो ।

दोहा ।

वन-मृगिनके देन को, हरे-हरे तृण लेहु ।

अथवा पीरे पान को, बीरा बूध्वन देहु ॥१००॥