शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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प्रियायामालापैरभरमधुर्भिवनत्रविधुभिः
सनरिवासामोदैः सकुचकलशारलेषुरैतैः ॥६६॥
जो अपने मनको वशमें करके, आत्माको सदा योगाभ्यास-साधनमें लगाये रहना ही पसन्द करते हैं—उन्हें प्यारी-प्यारी स्त्रियोंकी बात-चीत, अधराभूत, श्वासोंकी सुगन्धि सहित मुखचन्द्र और कुचकलशोंको हृदयसे लगाकर काम-क्रीडासे क्या मतलब ! ॥६६॥
खुलासा—जिनको अपनी इन्द्रियाँ और मनको वशमें रखने तथा योग-साधनका अभ्यास करनेके लाभ नहीं मालूम, वह विषय-भोग भोगना ही अच्छा समझते हैं और सदा भोग भोगनेमें ही मस्त रहते हैं। ऐसे कामियोंको एकान्तमें स्त्रियोंसे बातचीत या गुप्तगु कराना, उनके ओठ चूसना, उनके श्वाससे निकली मृगमद-कस्तूरीको लजानेवाली सुगन्धि सूर्यना, चन्द्र-माके समान मुखको चूमना और सोनेके दो कलशों या नार-द्वियों अथवा कच्चे-कच्चे सेबोंके समान कुचोंको छातीसे लगा कर उनसे संगम करना ही अच्छा लगता है ; किन्तु जिन्हें मन और इन्द्रियोंको क्राबूमें करके सदा योगाभ्यासका व्यसन रखना ही अच्छा लगता है, उन्हें सुन्दरियों की मीठी-मीठी बातें सुनना, उनके निचले होठको चूसना, उनके मुख की सुगन्धिका आस्वादन करना, उनके चन्द्राननको देखना, उनके गुलाबी गाल चूमना और दो कलशोंके समान ऊँचे उठे हुए कठोर कुचोंको हृदयसे लगा कर, उनके साथ संगम करना अच्छा नहीं लगता। वे