भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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हो जाता है, ईश्वरीय खातेमें पुण्य-कर्म नहीं रहते ; त्योंही उपरोक्त महल-मकान, जमीन-जायदाद, बाग-बगीचे, मनमोहिनी चन्द्रवदनी स्त्रियाँ और लक्ष्मी एवं क्षमता प्रभृति इस तरह विलाप जाते हैं ; जिस तरह रत-केलिके समय—स्त्री-पुरुषोंमें बीजातानी और भगड़ा-भगड़ी होनेसे—हारके मोती दूर-दूर कर चारों ओर लुप्त हो जाते हैं ।

दोहा ।

ॐ कर्मनके उदयमें, यह तिय चित सब ठोर ।

अस्त भये तीनों नहीं, ज्यों सुक्ता बिन-डोर ॥६५॥

सा०—जबतक मनुष्यके पूर्वजन्मके पुण्यों का चय नहीं होता, तब तक सारे संसारी सुखैश्वर्य्य बने रहते हैं ; पुण्य चय होने पर, वे क्षणभर भी नहीं रहते ।

95. A white palace, a good and loving young woman and the wealth with the ( royal ) symbol of white umbrella, are enjoyed only so long as there is the growth of good virtuous acts, but when they ( virtuous acts ) diminish then all the enjoyments run away from the man to different directions like the pearls of a garland broken in the quarrel of amorous plays.

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सदा योगाभ्यासव्यसनवश्योरात्ममत्तसो

रविच्छिन्ना मैत्री स्फुरति यमिनस्तस्यकिमु तैः ॥