भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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am no longer under the charm of illusions. The fire of passion kindled by the arrows of Cupid, have subsided in me and yet this foolish girl would not desist

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शुभ्रं सच्च सविश्रमा युवतयः श्वेतातपनोज्ज्वला

लक्ष्मीरित्यनुभूयते स्थिरभिवस्फूतिं शुभे कर्मणि ॥

विच्छिन्नने नितरामनङ्गकलहकीडावुटतन्तुक्

मुक्ताजालमिव प्रायाति क्षतिंति अशयदिशो दृश्यतामर् ॥१६५॥

जब तक मनुष्यके पूर्वजन्मके शुभ कर्मोंका प्रभाव रहता है, तब तक उज्ज्वल भवन, हाव-भाव-युक्त सुन्दरी नारियों और सफेद छत्र चँवर प्रभृतिसे शोभायमान लक्ष्मी—ये सब स्थिर भावसे भोगने में आते हैं ; किन्तु पूर्वजन्मके पुण्योंका क्षय होते ही, ये सब सुखेच्छय्यके सामान—कामदेवकी क्रीडोंके कलहमें टूटे हुए हारके मोतियोंके समान—शीघ्र ही जहाँ-तहाँ लुप्त हो जाते हैं ॥१६५॥

खुलासा—जब तक मनुष्यके पहले जन्ममें किये हुए शुभ कर्म अथवा पुण्य कर्मोंका ओर-छोर नहीं आता, तभी तक सुन्दर-सुन्दर आलीशान महल, अपने हाव-भावों—नात्रो-अदाओंसे पुरुषका मन हरने वाली सुन्दरी ललनाये तथा छत्र, चँवर, रथ, घोड़े, हाथी, पालकी, जोड़ी, बगूची प्रभृति सुख-पेशव्य्यके सामान बने रहते हैं और पुरुष उन्हें स्थिरताके साथ भोगता है ; किन्तु ज्योंही उसके पूर्वजन्मके पुण्य-कर्मोंका अन्त

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