भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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own disease of phtisis and in order to cure himself of that disease, the moon has, as it were, transformed himself into a pearl pendant of your nose and is constantly tasting the nectar of your lips.

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दिश वनहरिणीभ्यो वंशकाण्डच्छवीनां

कवलमुपलकौटिच्छिन्नमूलं कुशानाम् ।

शुकयुवतिकपोलोपाण्डुतांबूलवल्ली-

यलमरुणनखायैः पाटितं वा वधूभ्यः ॥१००॥

हे पुरुषो ! या तो तुम वन-मृगियोंके लिये बाँसके दण्डेको समान छविवाली, पत्थरकी नोकसे कटी हुई मूलवाली, कुश नामक वासके प्राप्त दो अथवा सुन्दरी बहुओं के लिये लाल-लाल नाखुनोंसे तोड़े हुए सूई—तोतीके कपोलके समान, जरा-जरा पीले रंगके पान दो ॥१००॥

खुलासा—मनुष्यो ! दो में से एक काम करो :—(१) या तो घर-गृहस्थोंको मोह-ममता तोड़, बनमें जा, ईश्वराराधनमें मन लगाओ और पत्थरकी नोकसे कुश-वासकी जड़े काट-काट कर जड़ूली हिरनियोंको खुगाओ, अथवा घरमें रह कर सुन्दरी नवयुवतियोंको पके हुए पौले-पीले पानोंके बीड़े दो ।

दोहा ।

वन-मृगिनके देन को, हरे-हरे तृण लेहु ।

अथवा पीरे पान को, बीरा बूध्वन देहु ॥१००॥