भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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हे प्यारी ! यह चंद्रमा अमृतमय, अतएव काम चेतन्य करने वाला होनेपर भी, अपने द्वाय रोगकी शान्तिके लिये, नाकके अगले हिस्सेमें लटकते हुए मोतीके मिससे, तेरे अधरामृतको पी रहा है ॥६६

कवि महोदय स्त्री को नाकके अग्रभागमें लटकते हुए मोती को पूर्ण चन्द्रमा मान कर कहते हैं, कि हे सुन्दरि ! यद्यपि चन्द्रमा स्वयं अमृतमय है और वह पुरुषोंके हृदयोंमें कामोद्दीपन करने की शक्ति और सामर्थ्य रखता है ; तथापि वह, अपने राज-रोग या क्षयके आराम करनेके लिये, बड़ेसे मोतीका रूप धरके, तेरी नाककी बुलाक या नथमें लटका हुआ, तेरे हाथोंके अमृत को पान कर रहा है । रसिक कवि कहते हैं :—

दोहा ।

प्रिये ! सुधाकर रोग निज, क्षयी-निवृत्ति-उपाय । चन्द पिवत मधु अधरको, नथ-मोती-मिस आय ॥

दोहा ।

मनसिज-नर्दक अमृतमय, क्षयी-हरण शशि जान । नाशा-मोती मिस किये, करे अधरामृत पान ॥६६॥

सार—स्त्रीका अधरामृत सुधाकरके अमृत से भी अच्छा है ।

99. O lady ! although the moon is full of nectar and the sight of moon gives rise to sexual desires yet he is unable to cure his