भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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रखकर, उसके सुजा रूपी पञ्जरके बीचमें पड़ा हुआ, एक क्षण भी सोकर रात बिताता है, वह धन्य है ॥६॥

खुलासा—मैथुनके बाद पुरुष का बल क्षीण हो जाता है, मिनट दो मिनटके लिये उसमें उठनेको भी सामर्थ्य नहीं रहती ; तब वह खा को छातियों पर अपनी छाती रखे हुए, उसके दोनों हाथोंके बीचमें पड़ा हुआ, शान्ति की नींद-सी लेता या अपनी थकान दूर करता है । कवि महोदय कहते हैं, कि जो पुरुष क्षणभरके लिये भी, यह आनन्द उपभोग करता है वह भाग्यवान् है—उसने पूर्वजन्ममें पुण्य किये हैं ।

छप्पय ।

कुंकुम-कंदम-युक्त, मत्तगज कुम्भ बने मनु । कान्ता कुचतट माहिं सने, रस-खेद खिन्न जनु । तेहि भुज-पंजर मध्य, रहैं सुख सों लिपटाने । क्षण इक निद्रा लहै, क्षण बीतत नहि जानें । इमि निज वक्षस्थल ताहि सों, जोरि रहे जे शुभग नर । हैं तेई यहि संसारमें, धन्यवाद के योग्य वर ॥६॥

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सुधाभयोऽपि क्षयरोगशान्त्यै नासाध्रमुक्ताफलकच्छलेन । अरंगसञ्जीवनदृष्टिशक्तिमुखाभूतं ते प्रिवतीव चन्द्रः ॥६६॥