भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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और दुष्टोंका सा काम करने वाला है ; पर ध्यान रहे कि, वही कटाक्ष जितेन्द्रियों से सम्बन्ध नहीं रखता। वह उनका कुछ भी नहीं कर सकता। न वह उनकी चित्तकी एकाग्रतामें खल-बली डाल सकता है और न उनकी समाधि ही भंग कर सकता है।

दोहा ।

तिय-कटाक्ष खल-सरिस है, करत समाधिहि भंग ।

श्राकृत जन संसर्ग रत, शठ-इव कुटिल भुजंग ॥६७॥

सार—खलोंके समान आचरण करनेवाले स्त्रियोंके कटाक्षका जोर केवल कामियों पर ही चलता है; जितेन्द्रियोंका वह कुछ भी नहीं कर सकता।

—*—

मतेभकुम्भपरिणहिनि कुंकुमाई

कान्तापयोधरतटे रसखेदखिलः ।

वन्नोनिधाय भुजप जरमव्यवर्ती

धन्यः ज्पां ज्ञपयति ज्गलव्यनिद्रः ॥६८॥

जो पुरुष मैथुनके श्रमसे थककर, मतवाले हाथीके कुम्भोंके समान वित्तीर्थ और केशद्रसे भोंगे हुए स्त्रीके स्तनों पर अपनी छाती