शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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सार—दो में से एक काम करो :—(१) या तो बनमें जा ईश्वर-भजन करो, अथवा (२) घरमें रह नव-बधुओंको भोगो ।
100. O people, you are either to feed the wild deer with Kush grass cut by the sharp edges of stone resembling bamboo sticks or to offer betel of slight yellow color torn by red nails to beautiful wives.
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यदासीद्धानं स्मरतिभिरसंचारजनितां तदा सर्वं नारीभयमिदमशेषं जगदभूत् । इदानीमस्माकं पठुरविवेकाञ्जनदृशां समीभूता दृष्टिस्त्रिभुवनमपि ब्रह्म मनुते ॥१०१॥
जब तक मुझमें कामका अज्ञान-अन्धकार था, तब तक मुझे सारा संसार क्षीण्य दीखता था ; लेकिन अब मैंने आँखोंमें विवेक-अञ्जन लगाया है, इसलिये मेरी समदृष्टि हो गई है, मुझे त्रिलोकी ब्रह्मय दीखती है ॥१०१॥
खुलासा—जब तक मेरे ऊपर कामदेवका प्रभाव था, जब तक मेरे हृदयमें अज्ञानका अंधेरा था, जब तक मुझे सत्-असत् का ज्ञान नहीं था, जब तक मुझे स्त्रियों की असलियत मालूम नहीं थी, जब तक मुझे स्त्रियों की मुहब्बत सच्ची मालूम होती थी, तब तक मुझे सारे जगत्में स्त्रियाँ-ही-स्त्रियाँ दीखती थीं,
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