शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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मेरा मन हर समय उन्हींमें लगा रहता था और उनके साथ रमण करना ही मुझे अच्छा लगता था। मैं समझता था, कि इस जगत्में जन्म लेकर कामिनियोंको भोगना ही—पुरुष का परम कर्तव्य है। इसीसे उन दिनों स्त्रियोंके सिवा मुझे और किसी भी काममें आनन्द नहीं आता था ; लेकिन ज्योंही मैंने आँखोंमें विवेक-विचारका अज्ञान आँजा, मेरी आँखोंका अंधेरा दूर हो गया, मेरा अज्ञान नाश हो गया, मुझे सत्-असत् का ज्ञान हो गया, मुझे मालूम हो गया कि जगत् सारहीन है, संसार असार और मिथ्या तथा नाशमान् है, स्त्रियोंका रूप-यौवन और उनकी प्रीति अतित्य एवं सदा रहनेवाली नहीं है, इस जगत्में कोई किसीका नहीं है, सभी एक दूसरेको थोड़ा देकर अपना-अपना मतलब साध रहे हैं, सभी स्वार्थकी जड़ियोंमें बँधे हुए हैं, स्वार्थ बिना कोई किसीसे बात भी नहीं करता ; जिस में स्त्रियोंकी प्रीति तो बिल्कुल ही भूटी है। वे किसी काल और किसी दशामें भी विश्वास-योग्य नहीं। एकमात्र ब्रह्म—अपना आत्मा—ही सच्चा है। उसी की चिन्तामें कल्याण है। उस ब्रह्मके सुखके सामने त्रिलोकी के सभी सुख-भोग तुच्छ हैं। सब जगत्में, जगत्के प्राणिमात्रमें, एक पूर्ण ब्रह्म व्यापक है। इस ज्ञानके कारणसे, अब मुझे न कहीं स्त्री दीखती है, न पुरुष, न और ही कुछ ; सर्वत्र एक ब्रह्म ही दीखता है। अतः अब मैं उसी के ध्यानमें लौलीन रहता हूँ ; क्योंकि वेरायकी अग्निने संसारी भोग-विषयोंके खयालात जड़ले ही भस्म कर दिये हैं।