शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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101. So long as I was laboring under ignorance due to the darkness caused by Cupid, I could see nothing but woman in this whole world. Now, by applying the collyrium of better reasoning, my eye-sight has become normal and I find Brahma pervading the three worlds,
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वैराग्ये सञ्चरत्येको; नीतौ भूपति चापरः ।
शृंगारे रमते कश्चिद् भुवि भेदः परस्परम् ॥१०२॥
कोई वैराग्यको पसन्द करता है, कोई नीतिमें मस्त रहता है और कोई शृंगारमें मग्न रहता है । इस भूतल पर, मनुष्योंमें परस्पर इच्छाओंका भेदाभेद है ॥१०२॥
इस दुनियामें सबकी रुचि एक नहीं । किसीको एक चीज अच्छी लगती है, तो दूसरे को दूसरी और तीसरे को तीसरी । सबके मन और रुचि एक नहीं ; किसीको यह संसार बुरा लगता है ; अतः वह इसे मिथ्या और असार समझ, सबको त्याग, परम परमात्माको भजता है । किसी को नीतिशास्त्रों का अध्ययन ही अच्छा लगता है ; अतः वह रात-दिन नीति-ग्रन्थों का ही कीड़ा बना रहता है । किसीको न वैराग्य पसन्द है और न नीति ; उसे एकमात्र विषयोंका भोगना ही अच्छा लगता है ; अत वह इन्हींमें आनन्द समझता है, दिन-रात विषय-सुखों में ही मतवाला रहता है, स्त्रियोंको ही अपनी आराध्य देवी समझता है और उनकी तारीफोंसे भरे हुए शृङ्गार रसके ग्रन्थ देखनेमें ही लगा रहता है । सबकी रुचि भिन्न-भिन्न है, इसीसे भर्तृहरि महाराजने “वैराग्य शतक” “शृङ्गार शतक” और