भारतकोश
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शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

Devanagarihipublished544 पृष्ठ

( ४१६ )

101. So long as I was laboring under ignorance due to the darkness caused by Cupid, I could see nothing but woman in this whole world. Now, by applying the collyrium of better reasoning, my eye-sight has become normal and I find Brahma pervading the three worlds,

—*—

वैराग्ये सञ्चरत्येको; नीतौ भूपति चापरः ।

शृंगारे रमते कश्चिद् भुवि भेदः परस्परम् ॥१०२॥

कोई वैराग्यको पसन्द करता है, कोई नीतिमें मस्त रहता है और कोई शृंगारमें मग्न रहता है । इस भूतल पर, मनुष्योंमें परस्पर इच्छाओंका भेदाभेद है ॥१०२॥

इस दुनियामें सबकी रुचि एक नहीं । किसीको एक चीज अच्छी लगती है, तो दूसरे को दूसरी और तीसरे को तीसरी । सबके मन और रुचि एक नहीं ; किसीको यह संसार बुरा लगता है ; अतः वह इसे मिथ्या और असार समझ, सबको त्याग, परम परमात्माको भजता है । किसी को नीतिशास्त्रों का अध्ययन ही अच्छा लगता है ; अतः वह रात-दिन नीति-ग्रन्थों का ही कीड़ा बना रहता है । किसीको न वैराग्य पसन्द है और न नीति ; उसे एकमात्र विषयोंका भोगना ही अच्छा लगता है ; अत वह इन्हींमें आनन्द समझता है, दिन-रात विषय-सुखों में ही मतवाला रहता है, स्त्रियोंको ही अपनी आराध्य देवी समझता है और उनकी तारीफोंसे भरे हुए शृङ्गार रसके ग्रन्थ देखनेमें ही लगा रहता है । सबकी रुचि भिन्न-भिन्न है, इसीसे भर्तृहरि महाराजने “वैराग्य शतक” “शृङ्गार शतक” और

( ४२० )

“नीतिशतक”—तीन शतक, तीनों प्रकारके लोगों' के लिये, लिखे हैं। जिसका दिल वैराग्यमें हो, वह “वैराग्य शतक” पढ़े; जिसे नीतिसे प्रेम हो, वह “नीति शतक” पढ़े और जिसे श्रद्धा से प्रेम हो, वह “श्रद्धा शतक” पढ़े।

दोहा।

काहूके वैराग्य-रुचि, काहूके रुचि नीति।

काहूके शृंगार रुचि, जुदी-जुदी परतीति ॥१०२॥

102. Some one feels pleasure in renunciation, some study morality and some take delight in love. So there is diversity of desires in this world.

—*—

यद्यस्य नास्ति रुचिरं तस्मिंस्तस्याप्रहा मनोवेऽपि।

रमणीयेऽपि सुधांशौ न मनः कामः सोरजिन्याः ॥१०३॥

जिस चीज़में जिसकी रुचि नहीं होती, वह चाहे जैसी सुन्दर क्यों न हो, उसे वह अच्छी नहीं लगती। चन्द्रमा सुन्दर है, पर कमलिनी उसे नहीं चाहती ॥१०३॥

दोहा।

जो जाके मन भावतौ, ताको तासों काम।

कमल न चाहत चाँदनी, विकसत परसत घाम ॥१०३॥

103. A man has no inclination for the thing which he does not like, though it may be a very good one. The moon is beautiful yet she is not liked by the lotus.

समाप्त।

शुद्धिपत्रक

संसार में सबकी कवि पकसी नहीं होती । किसी को शुद्धि पसन्द है, कामितियों का स्वर्गाय आतन्त्र लुटना पसन्द है; किसी को सिद्धी विष से भी घुरी लगती है, उन्हें वैराग्य पसन्द है और किसी को नीति का अध्ययन पसन्द है । इसी से महाराज भक्तहरि ने तीन तरह के मनुष्यों के लिये शुद्धि, वैराग्य और नीति पर तीन शतक लिखे ।

(पृ० २०)

Popular Press—Calcutta.

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मनुष्य भावके पास रहने योग्य

तीन अनमोल ग्रन्थरत्न ।

१ स्वास्थयरक्षा ।

भारतमें ऐसे हिन्दी-पढ़े-लिखे मनुष्य बहुत कम होंगे, जोंने बाबू हरिदास वैद्य-लिखित “स्वास्थयरक्षा” की कम-से-तारीफ़ न सुनी हो । आज तक इस ग्रन्थके पाँच-पाँच और तीन हजारके आठ संस्करण हो चुके । राजा-महाराजा, सेठ-कार, जज-वकील, प्रोफेसर-माधुर और विद्यार्थी, स्त्री और ल, बालक, जवान और बूढ़े, अमीर-उमरा और गरीब किसान के यहाँ यह अमूल्य ग्रन्थ जा पहुँचा है । देशका इस ग्रन्थने ना उपकार किया है, कितने जीवोंकी प्राणरक्षा की है, जने नौजवान उठती उमरके पढ़ोंको इसने कुराहसे हटाकर ह पर लगाया है, इसको हम अपनी क़लमसे लिखना अच्छा समझते । आप जिस हिन्दी-पढ़े-लिखेसे पूछियेगा, वही गा कि, “स्वास्थयरक्षा” वास्तवमें “स्वास्थयरक्षा” ही है । उसका नाम है, वैसे ही उसमें गुण हैं । अगर आप सदा निरोग रहना चाहते हैं, अगर आप पूर्ण भोगते हुए सुखसे जिन्दगीका बेड़ा पार करना चाहते हैं,

४ हरिदास एण्ड कंपनी, २०१ हरिसन रोड, कलकत्ता।

मछली एक साथ खाना ) से उन्माद रोग हो जाता है। अत्यन्त शोका-चिन्ता, क्रोध और मोह लोभसे मनुष्य की स्मरण-शक्ति नाश होकर भयंकर मृगो रोग हो जाता है। अत्यन्त स्त्री-प्रसंग करनेसे, बहुत जागनेसे, बहुत ही व्रत-उपवास करनेसे, मल-मूत्रके वेग रोकनेसे और बहुत ज़ियादा मिहनत करनेसे वायु कुपित हो जाता है, जिससे भयंकर वात रोग उत्पन्न हो जाते हैं, वह इन मिथ्या आहार विहारोंसे कैसे बच सकता है ?

ज़ियादा नमकीन और गरम पदार्थ खानेसे, पत्तोंका साग खानेसे, नियम-विरुद्ध और अत्यधिक दही खानेसे, अजीर्णमें भोजन करनेसे, दिनमें सोनेसे ; उड़दकी दाल, माटा और बैंगन-वगैरह : ज़ियादा खानेसे “वातरक्त” रोग हो जाता है, खून दूषित होकर शरीर सड़ने लगता है। बहुत ज़ियादा मैथुन करनेसे, बहुत ही शीतल पानी पीनेसे, मिण्डो-नवारकी फलों वगैरह : सुखे साग खानेसे और बहुत ही हँसने-बोलने वगैरह : से भयंकर “शूल” रोग हो जाता है। जो इन बातोंको नहीं जानता, वह इन कामोंसे कैसे बच सकता है ? जो जानता है कि क्रूर में क्रूढ़नेसे मर जाऊँगा, वही क्रूर में न क्रूढ़ेगा। जो जानता है कि, साँपका फन पकड़नेसे साँप डस लेगा और मेरी मौत हो जायगी, वही साँप से दूर रहेगा ; अनजान तो उसे मामूली जानवर या खिलौना सम्भ्रम कर पकड़ेगा और मरेगा। इस लिये जो निरोग रहना चाहें—और परमायु भोगना चाहें, उन्हें रोग होनेके कारण अवश्य जानने चाहिये। कारण

हरिदास एण्ड कम्पनी, २०१ हरिसन रोड, कलकत्ता। ५

जाननेसे ही वे गलतियाँ नहीं करेंगे और रोगोंके पञ्चोंमें भी न फँसेंगे।

रोगोंसे बचने और आरोग्य रहनेके तरीके कैसे मालूम हों ?

रोगोंसे बचने, आरोग्य रहने, अकाल मृत्युसे छुटकारा पाने और पूरी आयु भोगनेके तरीके “आयुर्वेद” में लिखे हैं। आयुर्वेद पढ़नेसे ही हरेक आदमी उपरोक्त बातोंको जान सकता है ; पर हमारा आयुर्वेद संस्कृत भाषामें है। आज-कल सभी भारतवासों संस्कृत नहीं जानते, इसलिए वे आयुर्वेद पढ़ नहीं सकते। बम्बई प्रभृतिमें आयुर्वेदका हिन्दी अनुवाद भी छप गया है, पर वह ऐसा कठिन है, कि वह बिना किसी गुरुके पढ़ाये समझमें नहीं आता। अब जो लोग वैद्यके धन्धेके सिवा और धन्धे करते हैं, जिनकी उम्र अब विद्या-योग्य पढ़ने नहीं रही है, अथवा जिनके बिना कमाये गुहस्थीका पालन नहीं हो सकता, वे अब आयुर्वेद कैसे पढ़ सकते हैं और गुरुकी फीस कहाँसे दे सकते हैं ?

लाखों आदमी नौकरी-चाकरी या दूसरा धन्धा करते हुए भी आयुर्वेद पढ़ना चाहते हैं, पर हिन्दीमें—बोलचालकी सरल हिन्दीमें—आयुर्वेद न होनेसे, इच्छा रहने पर भी, मन मार कर रह जाते हैं। इसीलिए हमारी कम्पनीके मुख्य सञ्चालक वयोवृद्ध, पूर्ण अनुभवी वैद्य बाबू हरिदासजीने, लोकोपकारार्थ, पहले “स्वास्थ्यरक्षा” नामक ग्रन्थ लिखा था। वह भारतके हर हिन्दी

६ हरिदास एण्ड कम्पनी, २०१ हरिसन रोड, कलकत्ता ।

भाषाभाषी मनुष्यको इतना पसन्द आया, कि उसके पाँच २ और छे-छे हजारों आठ संस्करण हो गये । हजारों लोगोंने उससे लाभ उठाया और जीवनका सुधार किया । लेकिन “स्वास्थ्यरक्षा” पूर्ण आयुर्वेद नहीं है । वह तो आयुर्वेदका एक छोटासा अंश है । इसलिए बाबू साहबने इस बुढ़ापेमें, सब सुखोंको तिला-अलि-देकर, अपने स्वास्थ्यका बलिदान करके, चार हजार सफोंका “चिकित्साचन्द्रोदय” नामक ग्रन्थ लिखा है और उसे सात भागोंमें तकुसीम किया है, ताकि लोगोंको उठा कर पढ़नेमें ग्रन्थ भारी न मालूम हो और खरीदनेमें भी भारी न जान पड़े ।

बाबू साहबको लिखी “स्वास्थ्यरक्षा” का जैसा आदर हुआ, वैसा ही बलिक उससे भी बढ़ कर आदर पबलिकने इस “चिकित्साचन्द्रोदय”का किया है । काश्मीरसे कन्या कुमारी और अटकसे कटक या सिन्धसे आसाम तक इसका प्रचार दिन-दूना रात-चौगुना बढ़ रहा है । हरेक सेठ-साहूकार, मुनीम-गुमाश्वते, वकील-मुहरिरे, बैरिष्टर-जज, तहसीलदार-डिप्टी कलेक्टर, रेलबाबू-तारबाबू, हिन्दू और मुसलमान, जौनी और ईसाई, आर्यसमाजी और ब्राह्मसमाजी—सभी इसे खरीद-खरीद कर पढ़ने लगे हैं । यह बड़ी ही खुशीकी बात है, पर अभी हरेक हिन्दी भाषाभाषीको इस ग्रन्थको खबर नहीं—क्योंकि भारत बहुत बड़ा देश है—जब सभीको इस महाग्रन्थकी खबर हो जायगी, सभी इसे पढ़ने लगेगे, तब

हरिदास एण्ड कम्पनी, २०१ हरिसन रोड, कलकत्ता। ७

आजके भारतमें और उस समयके भारतमें बड़ा फ़र्क हो जायगा। उस समयके स्त्री-पुरुष प्राचीन कालके स्त्री-पुरुषों-की तरह हृष्ट-पुष्ट बलवान और दीर्घजीवी होने लगेगे और देशमें बहुत कम रोगी नज़र आवेगे। बहुत क्या—हम प्रत्येक हिन्दी भाषा जानने वालेसे जोरके साथ सिफ़ारिश करते हैं, कि वह हजार जगहसे रुपये बचाकर अथवा दूसरोंसे उधार लेकर भी इस ग्रन्थ-रत्नको खरीदे और नित्य-प्रति नियमसे घण्टे-दो घण्टे नित्य पढ़े।

दो वरसमें घर बैठे पूर्ण वैद्य।

इस ग्रन्थमें ४००० सफे हैं। मन्दसे-मन्दा हिन्दी पढ़नेवाला दो घण्टेमें पाँच सफे अच्छी तरह समझ-समझकर पढ़ और याद कर सकता है। इस हिसाबसे ५×३० = १५० सफे वह हर महीने ख़तम कर सकता है और एक वरसमें ५×३०×१२ = १८०० सफे ख़तम कर सकता है और २ सालमें ३६०० सफे शेष कर सकता है। ऐसा कौन आदमी है, जो नित्य दो घण्टे का समय न निकाल सके ? ज़ियादा-से-ज़ियादा काम करनेवाले को भी २४ घण्टेमें २ घण्टे बच सकते हैं। समय या अवकाश न मिलनेकी शिकायत मूर्ख ही किया करते हैं। अमेरिकाके वे धनकुवेर जिनकी आमदनी हर दिन १ लाखसे भी ज़ियादा है, जिनकी दुनियामें चार-चार और पाँच-पाँच सौ दूकाने हैं,

८ हरिदास एण्ड कम्पनी, २०१ हरिसन रोड, कलकत्ता।

प्रत्येक दिन दो तीन घण्टे दुनियाके अखबार और ग्रन्थ देखते हैं। हमारे देशके लाख दो लाखकी सालाना आमदनी वाले जब कहते हैं—“अजी समय तो मिलता ही नहीं”—तब हमें हँसी आ जाती है? हमें उनकी मूर्खता और टाइमकी पाबन्दी न जानने पर दया भी आने लगती है।

आप उपन्यास पढ़ना त्यागिये, पूरन मलके ख्याल, ढोला-मारू, निहालदे और लण्डन रहस्य प्रभृतिको दूर फेंकिये। इनके पढ़नेसे कोई लाभ नहीं। इनके पढ़नेसे विषयवासना जागती और आयु क्षीण होती है। “चिकित्सा-चन्द्रोदय”का पाठ बिछा नागा दो घण्टे या एक ही घण्टे रोज करनेसे रोग दूर भागते और उग्र बढ़ती है। इतना ही नहीं—लोक-परलोक भी बनते हैं। बिना शरीरके नीरोग रहे, आप न तो धनही कमा सकते हैं, न ईश्वर-भजन ही कर सकते हैं और न कामिनीको ही भोग सकते हैं। इससे मालूम होता है कि,

“चिकित्साचन्द्रोदय”

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों ही पदार्थोंकी मूल है। जो लोग निर्धन हैं, १०) २०) २५ की नौकरी करके, जने-जनेकी गालियाँ सुनकर और ठोकरे खाकर जीवनको बर्बाद करते हैं, अथवा नौकरीके लिए मारे-मारे फिरते हैं, वे दो बरसमें इस ग्रन्थको पढ़कर और एक साल किसी सदुद्देश्यके हाथके नीचे काम करके अपने गाँवमें ही—अपनी बुद्धि-अनुसार

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कम-से-कम २००) रु० महीना और ऊपरमें १०००) रु० महीना तक कमा सकते हैं। कम और ज़ियादा कमाना अकू पर निर्भर है। पर १००) २००) महीना तो एक साधारण बुद्धिवालाभी पैदा कर सकता है और अपने ही गाँवमें देवताकी तरह पुज सकता है। इस तरह इस ग्रन्थसे अर्थ या धनकी प्राप्ति हो सकती है।

इसके पढ़नेवाला अगर अपने गाँववालोंको उनके रोग होनेपर, इस ग्रन्थसे रोगका निदान करके, कोई जड़लकी जड़ी या सस्तीसी एसारोकी दवा बता दे, तो रोगीकी जान बच सकता है। गरीबोंके लिए, इस ग्रन्थमें, हरेक रोगके नाश करने-को ऐसे-ऐसे नुसखे लिखे हैं, जिनसे भयंकर रोग आराम हो जायँ और पैसा भी खर्च न हो; और हो तो उतना हो, जितना एक गरीबसे गरीब भी खर्चकर सके। जैसे—

(१) श्रीठेके पिसे-छने चूर्णाकी नास लेनेसे मृगी आराम हो जाती है। कड़वी तोरई' को पानीमें पीसकर, एक कपड़ेमें रख लेने और वेहोश मृगी-रोगीकी नाकमें दो चार बूँद टपकानेसे फौरन ही रोगी होशमें आ जाता है। सफेद प्याज़का रस नाकमें टपकाने से मृगी रोग जाता रहता है। (चिकित्साचन्द्रोदय-सातवाँ भाग)

(२) तुलसीके स्वरसमें “घी और कालीमिर्च” मिलाकर सेवन करनेसे वायु रोग नाश हो जाते हैं।

(३) त्रिभलेका-चूर्ण १ तोले, शुद्ध शिलाजीत २ माशे और शहद १ तोले मिलाकर चाटनेसे समस्त प्रमेह नाश हो जाते हैं।

(४) एक तोले विदारीफन्द, एक तोले घी और दो तोले मिर्ची

१० हरिदास पण्ड कम्पनी, २०१ हरिसन रोड, कलकत्ता ।

मिलाकर चार महीने खानेसे बूढ़ा भी जवानकी तरह स्त्री-भोग कर सकता है ।

(५) विच्छूके काटे स्थान पर आकका दूध मलनेसे विच्छूका जहर उतर जाता है ।

(६) नीबूके रसमें जमालगोटा विसकर, आँखोंमें आँजनेसे साँपका जहर उतरे जाता है ।

पेसे-पेसे हज़ारों अमीरी और गरीबी नुसखे “चिकित्सा-चन्द्रोदय”में लिखे हैं । दूसरोंका भला करनेसे पुण्य होता है । “चिकित्साचन्द्रोदय” पढ़ने वाला निश्चय ही परोपकार करके पुण्य सञ्चय कर सकता है ।

जो पुरुष हर शीतकालमें बाजीकरण औषधियाँ सेवन करता है, उसमें स्त्री-भोगकी सामर्थ्य घोट्टेके समान हो जाती है । जो बाजीकरण औषधियाँ सेवन नहीं करता, केवल रोटी-दालके बल पर स्त्री भोगना चाहता है, वह तो भारी ग़लती करता है । “चिकित्साचन्द्रोदय”के चौथे भागमें बाजीकरण औषधियोंका खज़ाना है ।

यद्यपि स्त्रीमें पुरुषसे अठगुना काम रहता है, तो भी वह पुरुषके बाद.....होती है । जब तक स्त्री.....नहीं होती, वह सन्तुष्ट नहीं होती ; इसलिये पहले बाजीकरण औषधियाँ खाकर बल-बीर्य बढ़ाना चाहिये । फिर समय पर स्तम्भनकारक औषधियाँ की सहायता लेनी चाहिये, तभी स्त्री-भोगका आनन्द मिलता है । “चिकित्सा चन्द्रोदय”में अनेक तरहके लेप, गोली, तिले,

हरिदास एण्ड कम्पनी, २०१ हरिसन रोड, कलकत्ता । ११

और मोदक प्रभृति लिखे हैं। जिन दवाओंको खाकर श्रोत्रुण भगवान् १६१०८ रानियोंको राजी करते थे, वे भी इस ग्रन्थमें लिखी हैं। बहुत क्या—काम की प्राप्ति भी “चिकित्सा-चन्द्रोदय”से ही हो सकती है।

अब रही मोक्ष ; बिना शरीरके निरोग रहे, ईश्वरका नाम भी लेना कठिन है। जो रोगार्स है, रोग-पीड़ित है, उसका मन ईश्वर में नहीं लगता। लेकिन “चिकित्साचन्द्रोदय”का पाठ करने वाले और उसमें लिखी बातों पर अमल करने वालेको रोग सता नहीं सकते ; अतः वह मन लगाकर भगवान्का भजन कर सकता और स्वर्ग या मोक्ष लाभ कर सकता है।

जो ग्रन्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पदार्थोंका देने वाला है, उसे कौन खरीदना न चाहेगा ?

चिकित्साचन्द्रोदयका मूल्य ।

भागसजिल्दका दामअजिल्दका दाम
पहला भाग३॥॥३)
दूसरा भाग५॥॥५)
तीसरा भाग५)४॥
चौथा भाग४॥३॥॥
पाँचवाँ भाग५॥॥५)
छठा भाग४)३॥
सातवाँ भाग१११॥१०॥

४०) |


३५)

१२ हरिदास एण्ड कम्पनी, २०१ हरिसन रोड, कलकत्ता ।

किफ़ायत ।

जो सज़्जन सातों भाग एक साथ ख़रीदेंगे, उन्हें सज़िल्द ३३॥ में और अज़िल्द सात भाग २६॥ में मिलेंगे । डाक या रेल-ख़र्चे जिम्मे ख़रीदारान । ५) से नीचे की ख़रीद पर कुछ भी कमीशन नहीं मिलेगा । ६) से ११॥ तक एक आना रुपया और १०) से २४) तक दो आना रुपया तथा २५) से ५०) तक अर्द्धा आना रुपया कमीशन मिलेगा ।

जिन्हें विश्वास न हो

और जिनका काम कभी इस कम्पनीसे न पड़ा हो, वे कोई-सा एक भाग मँगाकर अपनी तसल्ली करलें । हाँडोंमें एक चाँवल देखा जाता है । अगर वह पका हुआ होता है, तो सभी पके होते हैं ।

रोगियोंके लिए सलाह ।

— * —

जिन रोगियोंने बचपनमें नासमभीसे हस्तमैथुन वर्गैः से अपने तर्ह निकम्मा बना लिया है, जिनका वीर्य दूषित हो गया है, जिनका वीर्य क्षीण हो गया है, अथवा पेशाब-पाषाणके समय जाता है या स्वप्नद्रोष होते हैं, उन्हें विद्यापनवाज़ों की लच्छेदार बातोंमें आकर अपना धन और स्वास्थ्य नष्ट न करना चाहिये । जिन्होंने वैद्यकका एक अक्षर भी नहीं सीखा, वे

हरिदास एण्ड कम्पनी, २०१ हरिसन रोड, कलकत्ता। १३

सौ-सौ रोग की एक-एक दवा बेचकर लोगोंको बेमौत मार रहे हैं; पर दुःख है, कि लोग ज़रा भी नहीं समझते। हमारे यहां “विक्रितसावन्द्रोदय”के लेखक, वयोवृद्ध बाबू हरिदास जी की बनाई हुई, निश्चय ही फल दिखाने वाली दवाएँ तैयार रहती हैं। आप उन्हें जाड़ेमें सेवन कीजिये और स्त्री-भोगका सच्चा आनन्द लूटिये। नीचे लिखी हुई दवाएँ परमोत्तम हैं :-

१-अम्रक भस्म १००० पुटी ४०) रु० तोले।

२-वंगेश्वर १० आँचकी ८) रु० तोले।

३-मृगनाभ्यादि बटी ८० गोली १०) रु०।

४-धातु पुष्टिकर चूर्ण ८० मात्रा १५) रु०।

५-कामदेव चूर्ण ८० मात्रा २०) रु०।

६-चन्द्रनादि तैल १ सेर १६) रु०।

७-तिला नं० १—एक शीशी ५)

सेवन-विधि

ऐसी चीज़ें बहुत करके, जाड़ेमें, सेवन करनी चाहिये। पहले ४० दिन धातुपुष्टिकर चूर्ण, फिर ४० दिन कामदेव चूर्ण, फिर ४० दिन वंगेश्वर या मृगनाभ्यादि बटी और फिर ४० दिन १००० आँचको अम्रक सेवन करनी चाहिये। जितने दिन ये दवाएँ खाई जायँ, उतने दिन “चन्द्रनादि तैल” शरीरमें लगाना चाहिये और जननेन्द्रिय की नसोंका दोष दूर करनेको कम-से-कम १ शीशी तिला लगाना चाहिये। इसो तरह ५ महीना हमारी दवा

१४ हरिदास एण्ड कम्पनी, २०१ हरिसन रोड, कलकत्ता।

खानेसे मनुष्य पूर्ण बलवान, वीर्यवान और पुष्ट हो सकता है। उसका वीर्य कपूरके समान सफेद, पत्थरके समान वजनी और प्रसंगमें देर तक ठहरने और आनन्द देने वाला हो जाता है। हमने इन दवाओंसे ३० वर्षमें हजारों रोगी आराम किये हैं। जबदी करनेसे इतना बल आ नहीं सकता। जो दस बीस दिनोंमें धातु रोग आराम करनेका दावा करते हैं, वे लोगोंको फुसला कर ठगते हैं। हमें भगवान्का भय है , इसलिए मिथ्या लिखना और कहना पसन्द नहीं। यश-अपयश तो भगवानके हाथ है।

कितना खर्च पड़ेगा ?

पहले ४० दिनमें १५) का धातु पुष्टिकर, ॥८) का उदरशोधन (दवा शुद्ध करनेसे पहले पेट साफ कर लेना परमावश्यक है) और ३२) रु० का दो सेर “चन्दनादि तेल”। इस तरह ४७॥८) खर्च होगा।

दूसरे ४० दिनमें २०) का कामदेव चूर्ण और ३२) का चन्दनादि तेल, इस तरह ५२) खर्च होगा।

तीसरे ४० दिनमें १५) की बंगेश्वर या १५) की मृगनाभ्यादि बट्टी और ३२) का चन्दनादि तेल खर्च होगा, इस तरह ४७) रु० खर्च होगा।

चौथे ४० दिनमें ५०) अम्रक भस्म और ३२) का चन्दनादि तेल, इस तरह ८२) खर्च होगा।

कुल मिलाकर ४७॥८)+५२)+४७)+८२)=२२८॥८) खर्च

हरिदास एण्ड कम्पनी, २०१ हरिसन रोड, कलकत्ता । १५

होगा । जो धनी हैं, जिन्हें रुपयोंका मोह नहीं है, वे ऊपर लिखी चीजें सेवन करके खी-भोगका सुख लूटें । सूरज पुरबका पच्छममें उदय हो, तभी यह दवाएँ फेल हो सकती हैं । ५० की खरीद पर २०) सैकड़ा और २२८) की खरीद पर ३०) सैकड़ा कमीशन मिलेगा ; यानी २२८) की दवा लेने वालेको प्रायः १६०) रु० देने होंगे । लेकिन १६०) रुपये पहले भेज देनेसे ही यह रियायत होगी ।

गरीबोंके लिए ।

हमारा धातुपुष्टिकर चूर्ण २ महीने और कामदेव चूर्ण २ महीने खाना । चाहिये, इसके बाद हो सके तो ८० गोली मुग्नाभ्यादि बटी खा लेनी चाहिये । शरीरमें काली तिलोंका तेल लगा कर नहाना चाहिये । २ महीनेके धातुपुष्टिकरका दाम प्रायः २०), कामदेवका २८) और मुग्नाभ्यादि बटीका १५) खर्च होगा । यद्यपि ऊपरके इलाजकी बराबरी तो यह इलाज कर न सकेगा, पर इसमें शक नहीं कि, जिन्दगीका मजा आजायगा ।

किफायत ।

जो सज्जन ६०) से ऊपर की दवा खरीदेंगे, उन्हें ६०) की जगह ४५) रु० देना होगा । जो सज्जन २००) से ऊपरकी दवा इकट्ठी लेंगे उन्हें २००) की दवा १४०) में मिलेगी, डाक या रेल-खर्च खरीदारोंको देना होगा ।

१६ हरिदास पण्ड कम्पनी, २०१ हरिसन रोड, कलकत्ता।

पत्र व्यवहार गुप्त।

सभो रोगियोंको चिड़ियाँ गुप्त रखो जाती हैं। कोई किसीकी भोतरी बात जान नहीं सकता; इसलिए अपना हाल दिल खोलकर, साफ हिन्दीभाषा और नागरी अक्षरोंमें लिखना चाहिये।

हमारी अठ्यर्थ महौषधियाँ।

हमारी नीचे लिखी दवाएं आज तक कभी फेल नहीं हुईं और न होंगी, वशर्त्त कि रोगका ठीक निदान करके सेवनकी जायँ। हम हर एक भाईसे प्रार्थना करते हैं कि, वह हमारी नीचे लिखी हुई चीजोंको परीक्षा करे और सदा इनसे काम ले। ग्रहस्थीमें इनकी रोज दरकार रहती ही है। इससे देशका धन देशमें रहेगा और ५) रु० का काम २) रु० में होगा। विश्वास कीजिये, हमने आज तक, अपने जीवनमें, किसीकी १ पाई भी धोखा देकर नहीं ली और न आगे वैसी इच्छा है। जीवन क्षण-भंगुर है, ईश्वरके पास जाना है, उसे अपने कर्मोंका जवाब देना है। अपनी १ पैसेकी चीज़का दाम १) रु० रखनेमें पाप नहीं—पर फूटो और बेकाम चीज़ देकर पैसा लेनेमें घोर पाप है। पाठक, हमारे इन शब्दोंपर विश्वास करके नीचे लिखा चीज़ अवश्य मँगावें और आज्ञावें—

नारायण तेल।

यह तेल अस्सी वायु रोग नाश करनेमें समवाण है। हम इसे अपनी युक्तिसे दवाएं घटा-बढ़ाकर बनाते हैं , इसको

हरिदास एण्ड कम्पनी, २०१ हरिसन रोड, कलकत्ता । १७

तैयारीमें लालचसे काम नहीं लेते और मिहनतसे जी नहीं चुपते ; इसलिये यह वायु रोगोंमें जादूका सा काम करता है । इसके सारे शरीरमें मलबाने, नाक और कानमें छोड़ने एवं गुदा में पिचकारी देनेसे सिरका जकड़ जाना, गर्दनका रहजाना— न फिरना, ठोड़ोका जकड़ जाना, बाँहका सूखना, लँगड़ापन, लूलापन, पैर जलना, पैर सोजाना, पसलीमें दर्द होना, पीठ के बाँसेमें पोड़ा होना, कमरमें वेदना होना, मुँहका टेढ़ा हो जाना, आधे शरीर या सारे शरीरका सूता हो जाना, दण्डेकी तरह हो जाना, धनुषकी तरह झुकजाना, फोर्तोंका फूलना और दर्द करना वगैरः लकवा, फालिज, हनुमह, शिरोमह, मन्था-स्तंभ, दण्डापतानक, धनुर्वात, पंगुता और खंजता प्रभृति सभी रोग आराम हो जाते हैं ।

जब आप वात रोग में सब दवाएँ करते-करते थक जावें, किसीकी दवासे आराम न हो, तब आप हमारा “नारायण” तैल और “योगराज गूगल” सेवन कीजिये ; अवश्य लाभ होगा । जिन रोगियोंको सिविल सर्जनोंने असाध्य कहकर त्याग दिया था, उन रोगियोंको हमने इन्हीं दो दवाओंसे आराम कर दिया । अगर रोगके उठते ही तार देकर हमारा “नारायण तेल” आधसेर और २५ गोली “योगराज गूगल” मँगाकर, रोगी शुद्ध करदे, तो हम दवाके साथ कहते हैं, कि उसका रोग नहीं बढ़ेगा और चन्द्र रोज़में आराम हो जायगा । भारी वातरोगोंमें आध पाव तेल तो एक दिनमें मल्लग जाता है, तब कहीं रोग दबता है,

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१८ हरिदास एण्ड कम्पनी, २०१ हरिसन रोड, कलकत्ता ।

इसीसे आध सेर तेलकी बात लिखी है । एक दिन हमारे एक आत्मीयकी छाती, पीठ और कमरमें, रातके २ बजे, ऐसा दर्द उठा, कि रोगी तड़फने लगा । जान पड़ता था, रोगी दिन निकलनेसे पहले ही ख़तम हो जायगा । हमने पूछा—“नारायण तेल है ?” जवाब मिला—“हाँ—!” हमने कहा—“चार आदमी सारे शरीरमें मालिश करो ।” एक पीठमें, एक छातीमें, एक हाथोंमें और एक पैरोंमें नारायण तेल मलने लगा । एक आदमी आगपर रुई गरम करता और दूसरा सेक करता था । परमात्माकी दयासे दो घण्टेमें रोगी एक-दम आराम होकर सो गया । देखनेसे मालूम हुआ कि, दो घण्टेमें तीन छटाँक तेल शरीरमें पेवस्त हो गया । अगर हम उस समय तेलका ढालच करते—कोरी चुपड़ा-चुपड़ी करते, तो रोगीको आराम न होता और रोगीके घरवालोंकी श्रद्धा “नारायणतेल”से उठ जाती । भयङ्कर रोगोंमें हर दिन कम-से-कम एक छटाँक “नारायण तेल” सारे शरीरमें रमाना चाहिये, तब तत्काल चमत्कार दीखता है ।

बरसात और शीतकालमें शरीरमें यकायक तकलीफ़ बढ़ी हो जाती है । लोगोंको अचानक लकवा या फालिज मारना है । जबतक डाक्टर वैद्य आते हैं, रोग डाकगाड़ीकी चालसे बढ़ जाता है । पीछे आराम करनेमें बड़ी कठिनाई होती है । अगर घरमें आध सेर “नारायण तेल” और “योगराज गुगल” या “सतीरगजकेसरी बटो” मौजूद हों तो, रोग फौरन दब जावे ।