शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४ हरिदास एण्ड कंपनी, २०१ हरिसन रोड, कलकत्ता।
मछली एक साथ खाना ) से उन्माद रोग हो जाता है। अत्यन्त शोका-चिन्ता, क्रोध और मोह लोभसे मनुष्य की स्मरण-शक्ति नाश होकर भयंकर मृगो रोग हो जाता है। अत्यन्त स्त्री-प्रसंग करनेसे, बहुत जागनेसे, बहुत ही व्रत-उपवास करनेसे, मल-मूत्रके वेग रोकनेसे और बहुत ज़ियादा मिहनत करनेसे वायु कुपित हो जाता है, जिससे भयंकर वात रोग उत्पन्न हो जाते हैं, वह इन मिथ्या आहार विहारोंसे कैसे बच सकता है ?
ज़ियादा नमकीन और गरम पदार्थ खानेसे, पत्तोंका साग खानेसे, नियम-विरुद्ध और अत्यधिक दही खानेसे, अजीर्णमें भोजन करनेसे, दिनमें सोनेसे ; उड़दकी दाल, माटा और बैंगन-वगैरह : ज़ियादा खानेसे “वातरक्त” रोग हो जाता है, खून दूषित होकर शरीर सड़ने लगता है। बहुत ज़ियादा मैथुन करनेसे, बहुत ही शीतल पानी पीनेसे, मिण्डो-नवारकी फलों वगैरह : सुखे साग खानेसे और बहुत ही हँसने-बोलने वगैरह : से भयंकर “शूल” रोग हो जाता है। जो इन बातोंको नहीं जानता, वह इन कामोंसे कैसे बच सकता है ? जो जानता है कि क्रूर में क्रूढ़नेसे मर जाऊँगा, वही क्रूर में न क्रूढ़ेगा। जो जानता है कि, साँपका फन पकड़नेसे साँप डस लेगा और मेरी मौत हो जायगी, वही साँप से दूर रहेगा ; अनजान तो उसे मामूली जानवर या खिलौना सम्भ्रम कर पकड़ेगा और मरेगा। इस लिये जो निरोग रहना चाहें—और परमायु भोगना चाहें, उन्हें रोग होनेके कारण अवश्य जानने चाहिये। कारण