भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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“नीतिशतक”—तीन शतक, तीनों प्रकारके लोगों' के लिये, लिखे हैं। जिसका दिल वैराग्यमें हो, वह “वैराग्य शतक” पढ़े; जिसे नीतिसे प्रेम हो, वह “नीति शतक” पढ़े और जिसे श्रद्धा से प्रेम हो, वह “श्रद्धा शतक” पढ़े।

दोहा।

काहूके वैराग्य-रुचि, काहूके रुचि नीति।

काहूके शृंगार रुचि, जुदी-जुदी परतीति ॥१०२॥

102. Some one feels pleasure in renunciation, some study morality and some take delight in love. So there is diversity of desires in this world.

—*—

यद्यस्य नास्ति रुचिरं तस्मिंस्तस्याप्रहा मनोवेऽपि।

रमणीयेऽपि सुधांशौ न मनः कामः सोरजिन्याः ॥१०३॥

जिस चीज़में जिसकी रुचि नहीं होती, वह चाहे जैसी सुन्दर क्यों न हो, उसे वह अच्छी नहीं लगती। चन्द्रमा सुन्दर है, पर कमलिनी उसे नहीं चाहती ॥१०३॥

दोहा।

जो जाके मन भावतौ, ताको तासों काम।

कमल न चाहत चाँदनी, विकसत परसत घाम ॥१०३॥

103. A man has no inclination for the thing which he does not like, though it may be a very good one. The moon is beautiful yet she is not liked by the lotus.

समाप्त।