भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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हरिदास एण्ड कम्पनी, २०१ हरिसन रोड, कलकत्ता । १७

तैयारीमें लालचसे काम नहीं लेते और मिहनतसे जी नहीं चुपते ; इसलिये यह वायु रोगोंमें जादूका सा काम करता है । इसके सारे शरीरमें मलबाने, नाक और कानमें छोड़ने एवं गुदा में पिचकारी देनेसे सिरका जकड़ जाना, गर्दनका रहजाना— न फिरना, ठोड़ोका जकड़ जाना, बाँहका सूखना, लँगड़ापन, लूलापन, पैर जलना, पैर सोजाना, पसलीमें दर्द होना, पीठ के बाँसेमें पोड़ा होना, कमरमें वेदना होना, मुँहका टेढ़ा हो जाना, आधे शरीर या सारे शरीरका सूता हो जाना, दण्डेकी तरह हो जाना, धनुषकी तरह झुकजाना, फोर्तोंका फूलना और दर्द करना वगैरः लकवा, फालिज, हनुमह, शिरोमह, मन्था-स्तंभ, दण्डापतानक, धनुर्वात, पंगुता और खंजता प्रभृति सभी रोग आराम हो जाते हैं ।

जब आप वात रोग में सब दवाएँ करते-करते थक जावें, किसीकी दवासे आराम न हो, तब आप हमारा “नारायण” तैल और “योगराज गूगल” सेवन कीजिये ; अवश्य लाभ होगा । जिन रोगियोंको सिविल सर्जनोंने असाध्य कहकर त्याग दिया था, उन रोगियोंको हमने इन्हीं दो दवाओंसे आराम कर दिया । अगर रोगके उठते ही तार देकर हमारा “नारायण तेल” आधसेर और २५ गोली “योगराज गूगल” मँगाकर, रोगी शुद्ध करदे, तो हम दवाके साथ कहते हैं, कि उसका रोग नहीं बढ़ेगा और चन्द्र रोज़में आराम हो जायगा । भारी वातरोगोंमें आध पाव तेल तो एक दिनमें मल्लग जाता है, तब कहीं रोग दबता है,

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