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शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

Devanagarihipublished544 पृष्ठ

हरिदास पण्ड कम्पनी, २०१ हरिसन रोड, कलकत्ता । १६

इसलिये हर गृहस्थको काम-से-कम आध सेर “नारायण तेल”, १शीशो “योगराज गुटो” और १शीशो “समीरगजकेसरी बटो” हरवक अपने पास रखनी चाहियें । ये तीनों ८) आठ रुपये की चीजेंकरूप ८०) रु० का काम कर जाती हैं। “नारायण तेल”का दाम १२) रु० सेर है और आध पावसे कम कम नहीं मिलता ।

योगराज गुटी

योगराज गूगल नामी चीज है ; पर सभी वेध लालवके मारे उतनी अच्छा नहीं बनाते । अगर यह गूगल अच्छो तरहसे बनाई जाती है, तो बात रोगोंको तो जड़से आराम कर ही देती है ; बात रोगोंके अलावः प्रमेह, वातरक्त, पाण्डुरोग, मेद-वृद्धि-कोढ़, आमवात, उष नेत्ररोग, उदररोग, और शूलरोग वगैरः अनेक रोग इस एक ही दवासे निश्चय ही नाश हो जाते हैं । हम इसे परमोत्तम विधिसे बनाते हैं । हर गृहस्थको एक १शीशो पास रखनी चाहिये । २५ गोलीका दाम १) मात्र ।

नोट—नारायण तेल और योगराज गुटीका मेल है । आप हमारे कहनेसे, हमारे यहाँ की बनी दोनों चीजें १ बरस घरमें रख लीजिये । फिर देखिये, आपको कितना छव मिला और कितना रुपया आपका डाक्टरोंके घरमें जानेसे बचा । आपसेतर तेलका दाम ६) और २५ गोलीका १) कुल ७) सात ही रुपयेकी तो बात है ।

महाविष्णु तेल

इस तेल की मर्मलिशसे वायु रोग फौरन ही भागता है, शरीर वज्रवत् मजबूत होता और दूटी हुई हड्डी भी जुड़ जाती

२० हरिदास एण्ड कम्पनी, २०१ हरिसन रोड, कलकत्ता।

है, जो लोग वातरोगामें अनेक दवाएं करके हार गये हों और निराश होकर दवा करना छोड़ दिया हो, वह हमारा “महाविष्णु तेल” व्यवहार कर देखें। ईश्वर आरोग्य प्रदान करेगा। इस तेलसे आदमी तो आदमी जानवरों की भी वातव्याधि नष्ट हो जाती है। (दाम १६) रुपया सेर।

महामाषादि तैल।

“इस तेलसे आक्षेपक, पक्षाघात, उरुस्तंभ, अपबाहुक, हाथ काँपना, सिर काँपना, एकांग वात, हनुग्रह—ठोड़ी का जकड़ जाना, मन्यास्तंभ,—गर्द नका रह जाना, कानका दर्द, सिर और कानों की मन्दता, लंगड़ापन और गुब्रसी वात आदि समस्त वायु रोग नाश होते हैं। यह तेल वात रोगों का दुश्मन है। अनेक गठियाके रोगी, जो “नारायण तेल”से भी आराम न हुए इस “महामाषादि तेल”से आराम हो गये। एक ही दवा सभी रोगियों को आराम कर देती, तो महर्षि लोग एक-एक रोगकी सैकड़ों दवाएं नहीं निकालते। फिर भी हम जोरसे कहते हैं कि, अब्बल तो हमारा “नारायण तेल” ही वात रोगोंमें फेल नहीं होता, यदि देवात कभी “नारायण तेल” “काम न दे, तो “महा-विष्णु तेल” या “महामाषादि तेल”से तो रोग को भगना होगा ही। (मूल्य १६) रुपया सेर। आध पाव का दाम २)

प्रसारिणी तैल।

इस तेलका जैसा नाम है वैसा ही गुण है। यह सुकड़ी हुई खाद्यओंके फैलानेमें रामवाण है। इसको मालिशसे कफके

हरिदास पण्ड कम्पनी, २०१ हरिसन रोड, कलकत्ता । २१

रोग, कुबड़ा करनेवाली वायु, पाँगला करनेवाली वायु, गुप्तसी वायु, अर्दिंत—लकवा, पश्चाघात—फालिज, हनुग्रह—जबाड़े बन्द होना, पीठ, कमर और गर्दनकी जकड़न तथा विषम बात ये सब निश्चय ही आराम हो जाते हैं। यह तेल भी गुड़श्यों और वैद्योंके पास रहने योग्य है। (दाम १६) रुपया सेर ; आध पावका दाम २)

बला तेल ।

यह तेल गर्भ चाहनेवाली स्त्रियों, धातुक्षीण पुरुषों, राह चलनेसे थके हुए मनुष्यों और प्रसूता—बच्चा जननेवाली औरतोंके लिये अमृत है। यह तेल वायु रोगोंको भी नाश करता है। जिनके गर्भ न रहता हो, जिनकी धातु क्षीण होती हो और जिन्होंने बच्चा जना हो, वे इस बला तेलको अवश्य व्यवहार करें। यह तेल राजा-महाराजाओं और अमीरोंके घरोंमें ज़रूर रहना चाहिये। अगर कोई इसे अच्छी हालतमें लगाता रहे, तो कभी भी धातुक्षीण न हो। (मूल्य १६) रुपया सेर। आधपावका दाम २)

विषगर्भ तेल ।

यह तेल बहुत गर्भ है। इस तेलके लगानेसे बात रोग निश्चय ही नाश हो जाता है। जब किसी तेलसे बात रोग न जाय, इस तेलको सेवन कीजिये। (दाम १२) रु० सेर। आधपाव का दाम १॥)

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वातगजकेशरी अर्क ।

इस अर्कके पीनेसे समस्त वात रोग, बदनका दर्द और सूजन फौरन ही आराम होते हैं । आमवात, लकवा-अद्वित, पक्षाघात-फालिज, हाथी-पाँव, वीर्य दोष और रजके दोषों पर यह अर्क रामवाण है । गठिया वगैरः रोग तो चार दिनोंमें ही हूमन्तरको तरह उड़ जाते हैं । दाम १ बोतलका २)

हिमसागर तैल ।

इस तैलसे उष्णवात या गरमबादीके समस्त रोग, हाथ-पैर के तलवे जलना, शरीरसे चिनगियाँ सौ उठना, शरीरका सूखना, लकवा और गठिया आदि वात रोग निश्चय ही आराम होते हैं । उष्णवात रोगकी तो यह एक ही दवा है । दाम १६) रु० सेर । आधपावका दाम २)

धातुपुष्किर चूर्ण ।

जिनकी धातु पतली है, जिनकी धातु पेशाबके आगे पीछे या पाखाना फिरते समय कौंखनेसे गिर जाती है, जिनको स्तन-दोष होते हैं, जिनको स्त्री-प्रसंगमें रुकावट न होनेसे आनन्द नहीं आता,—जिनको बाते याद नहीं रहती ; जिनका चित्त डाँवाडोल रहता है,—उनके लिये यह चूर्ण मन लगाकर पशु-परहंतेके साथ कम-से-कम ४० या ६० दिन खाना चाहिये । इसीसे उनका धातु रोग आराम होकर, वीर्य पत्थरके समान स्फेद हो जायगा । चेहरे पर तेज और कान्ति आवेगी ; बल-

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वीर्य और मांस बढ़ेगा । यह दवा ३० सालकी आज्माई हुई है । हजारों रोगों बंगे हुए हैं ; पर फ़ायदा उन्हें ही करता है, जो दो या तीन महीने तक खाते हैं । जो वैद्य १०१२० दिनमें धातु रोग आराम करनेकी बात कहते हैं, वे भगवान् से न डरकर झूठ बोलते हैं । हमें झूठ बोलकर पैसा नहीं ठगना । दाम ४० दिनके खाने योग्य ८० मात्राका दाम १५)

कामदेव चूर्ण ।

यह चूर्ण यथा नाम तथा गुण है । इसके २३ महीने खानेसे खा-प्रसंगकी इच्छा खूब ज़ियादा होती है । इससे धातु-क्षीणता जाती और स्मरन-शक्ति बढ़ती है । यह कामदेवको उत्तेजित करनेमें रामवाण है । थोड़े दिनोंकी नामदी भी इससे अवश्य जाती रहती है ।

अगर ४० दिन धातुपुष्टिकर खाकर, ८० दिन या ६० दिन यह कामदेव चूर्ण सेवन किया जाय, तो सोनेमें सुगन्ध हो जाय । यह चूर्ण भी ३० सालका परीक्षित है । कभी फेल नहीं होता, पर देरमें लाभ दिखाता है । हाँ, आराम शक्तिया और पक्का करता है । दाम ४० दिन योग्य चूर्णका २०)

कान्ता गर्वहारि चूर्ण । (Banar)

इस चूर्णसे बरस दो बरसका प्रमेह या धातुक्षीणता नाश होकर, वीर्य खूब मुष्ट होता है । वीर्यको गाढ़ा और बलवान बनानेमें यह चूर्ण रामवाण है । खूब परीक्षा हो चुकी है ।

२२ हरिदास एण्ड कम्पनी, २०१ हरिसन रोड, कलकत्ता।

वातगजकेशरी शर्क ।

इस शर्कके पीनेसे समस्त वात रोग, बदनका दर्द और सूजन फौरन ही आराम होते हैं । आमवात, लकवा-अर्द्धित, पक्षाघात-फालिज, हाथी-पाँव, वीर्य दोष और रजके दोषों पर यह शर्क रामवाण है । गठिया वगैरः रोग तो चार दिनमें ही छूमत्तरकी तरह उड़ जाते हैं । दाम १ बोतलका २)

हिमसागर तैल ।

इस तेलसे उष्णवात या गरमबादोके समस्त रोग, हाथ-पैर के तलवे जलना, शरीरसे चिनगियाँ सी उठना, शरीरका सूखना, लकवा और गठिया आदि वात रोग निश्चय ही आराम होते हैं । उष्णवात रोगकी तो यह एक ही दवा है । दाम १६) २० सेर । आधपावका दाम २)

धातुपुष्टिकर चूर्ण ।

जिनकी धातु पतली है, जिनकी धातु पेशाबके आगे पीछे या पाखाना फिरते समय काँखनेसे गिर जाती है, जिनको खम-दोष होते हैं, जिनको स्त्री-प्रसंगमें रुकावट न होनेसे आनन्द नहीं आता,—जिनको बाते याद नहीं रहती ; जिनका जित डाँवाडोल रहता है,—उनके लिये यह चूर्ण मन लगाकर प्रथम-पहलूके साथ कम-से-कम ४० या ६० दिन खाना चाहिए । इसीसे उनका धातु रोग आराम होकर, वीर्य पत्थरके समान समेद हो जायगा । चेहरे पर तेज और कान्ति आवेगा ; बल-

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वीर्य और मांस बढ़ेगा। यह दवा ३० सालकी आजुमाई हुई है। हज़ारों रोगों बंगे हुए हैं; पर फ़ायदा उन्हें ही करता है, जो दो या तीन महीने तक खाते हैं। जो वैद्य १०।२० दिनोंमें धातु रोग आराम करनेकी बात कहते हैं, वे भगवान् से न डरकर झूठ बोलते हैं। हमें झूठ बोलकर पैसा नहीं उठाना। दाम ४० दिनेके खाने योग्य ८० मात्राका दाम १५)

कामदेव चूर्ण।

यह चूर्ण यथा नाम तथा गुण है। इसके २३ महीने खानेसे खा-प्रसंगकी इच्छा खूब ज़ियादा होती है। इससे धातु-क्षीणता जाती और स्तम्भन-शक्ति बढ़ती है। यह कामदेवको उत्तेजित करनेमें रामवाण है। थोड़े दिनोंकी नामदीं भी इससे अवश्य जाती रहती है।

अगर ४० दिन धातुपुष्टिकर खाकर, ८० दिन या ६० दिन यह कामदेव चूर्ण सेवन किया जाय, तो सोनेमें सुगन्ध हो जाय। यह चूर्ण भी ३० सालका परीक्षित है। कभी फैल नहीं होता, पर देरमें लाभ दिखाता है। हाँ, आराम शक्तिया और पक्का करता है। दाम ४० दिन योग्य चूर्णका २०)

कान्ता गर्वहारि चूर्ण। (Banar)

इस चूर्णसे बरस दो बरसका प्रमेह या धातुक्षीणतः नाश होकर, वीर्य खूब मुष्ट होता है। वीर्यको गाढ़ा और बलवान बनानेमें यह चूर्ण शैमन्त्राण है। खूब परीक्षा हो चुकी है।

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कभी फैल नहीं होता। जाड़ेमें अगर यह चूर्ण निरोग पुरुष खावे, तो उनको वह आनन्द आवे, जिसकी तारीफ नहीं। सबसे बड़ी बात यह है कि, इसके खानेवाला चाहे तो स्त्री-प्रसंग भी कर सकता है, उसका बल कभी न घटेगा। हम हरेक नौजवानसे, जो धातु-भस्म या रस खाना नहीं चाहते, जाड़ेमें ४ महीने लगातार इस चूर्णको खानेकी जोरसे विफारिश करते हैं। 'दाम ४० दिन योग्य दवाका २०।

कामिनीद्रावक चूर्ण (Harshash)

इस चूर्ण की एक-एक गोला सवेरे-शाम दूधके साथ खानेसे, चार महीनेमें, वह बल-पुरुषार्थ आता और स्त्री-प्रसंगकी ऐसी शक्ति आती है कि, तारीफ नहीं कर सकते। अगर कोई इसे बारह महीने लगातार खाले तब तो...के समान हो प्रसंग करने लगे। इससे प्रमेह, धातु-क्षीणता, पेशाब का तेल-सा होना वगैरः रोग भी जाते हैं। मूल्य ४० दिन-योग्य चूर्णका १०। जो बहुत खर्च कर नहीं सकते, वे इसे सेवन करके हमारी आजमूदा दवाका चमत्कार देखें।

शतावरी धृत।

इस घीसे बीयें खूब बढ़ता और धातु पुष्ट होती है। अरुठपित्त नाश करनेमें भा यह घी रामवाण है। अगर हमारे "कामदेव चूर्ण" या "कामिनीद्रावक चूर्ण" के साथ-साथ, किसी

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समय, इसकी भी एक मात्रा चाटी जाय, तब तो सोनेमें सुगन्ध हो जाय । मूल्य आध पाव घी का २॥

मृगनाभ्यादि वटी ।

कैसी ही धातु कम होगई हो या सूख गई हो, धातु की कमीसे खी-इच्छा न होती हो, अथवा वीर्य की कमीसे नामदीं होगई हो—इन गोळियोंसे अवश्य मरी हुई धातु भी जी उठेगी । अगर जाड़ेमें ये गोळियाँ कम-से-कम १६० भी सेवन कर ली जायँ, तो हम छाती ठोक कर कहते हैं, कि बहुत ही कम प्रसंग की इच्छा होनेवाले को भी प्रबल इच्छा होने लगेगी । आजमूदा दवा है । मूल्य ८० गोली का १०)

नपुंसक सज्जीवन वटी

ये गोळियाँ जैसा इन का नाम है वैसी ही हैं । नामदेके लिए जिन्दा करनेवाली हैं । इनके जाड़ेमें ३४ महीने लगा-तार खानेसे बेतहाशा प्रसंगेच्छा होती है । शामको दो या चार गोळियाँ खाठेनेसे अपूर्ण स्वर्गीय आनन्द आता है और प्रसंगमें डबल स्तम्भन होता है । शरीरमें कुर्ती और दूनी ताकत मल्लूम होती है । ये गोळियाँ कभी फेल नहीं होतीं । जिन्हें कोई रोग नहीं है, उन्हें भी जाड़ेमें ये गोळियाँ खानो चाहियँ । उप-रोक्त रोग नाश करनेके सिवा, ये गोळियाँ प्रमेह, शरीर का दर्द, जकड़न, गठिया, लकवा, बहुमूत्र, खाँसो और श्वासमें भी खूब लाभ दिखाती हैं । जिन लोगोंको प्रमेह, बहुमूत्र, खाँसो, श्वास

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और गठिया प्रभृति की शिकायत हो, उन्हें ये गोलियाँ सवैरे-शाम खाकर मिश्री-मिला गरम दूध पीना चाहिये। भगवत् की दयासे अपूर्व चमत्कार दोखेगा। ये गोलियाँ अवीष मोती, कस्तूरी और केशर आदि कीमती चीजोंसे बनती हैं। ध्यान रहे, ये गोलियाँ गरम मिज्ज ज वालोंको फायदा नहीं करतीं ; जिनका मिज्ज सदा या बादीका है, उन्हें रामवाण है। जिन्हें गरम चीजे हानि करती हों और शीतल चीजे फायदा करती हों, वे इनको मँगाकर रुपया बर्बाद न करें । हाँ, जिन्हें गरम पदार्थोंसे सुख होता हो, वे ही उन्हें मँगावें। दाम १५० गोलियोंका ४)

लवंगदि चूर्ण ।

इस चूर्णके सेवन करनेसे राजयक्ष्मा तो निश्चय ही नाश होता ही है। उसके सिवा जू काम भी आराम हो जाता है। जिन को बारहों महीने जुकाम बना रहता है, वह इस चूर्णको कम-से-कम १ महीने सेवन करें। उन्हें बड़ा लाभ होगा, जुकामसे पीड़ा छूट जायगा, साथ ही ताकत भी आवेगी। आजकल धातुपर गरमी पहुँचनेसे लोगोंको जुकाम बहुत सताया करता है; हमने इस चूर्णसे अनेक रोगी आराम किये हैं। जिन लोगोंको क्षय है, लूँसों है और कफके साथ खून आता है, उनके लिए भी यह चूर्ण परीक्षित है। इन सब रोगोंके अलावा, इससे सदासे होनेवाला तमक श्वास-श्वास नलोंके सुकड़नेसे, हक-हक-कर

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आनेवाला श्वास, प्रमेह, क्षयी, धातुक्षय, छातीका दर्द, दिलका घबराना, गलेके रोग और अस्चि ये सब रोग नाश होते हैं। जिन लोगोंको बुढ़ापेने घेर लिया है; बुढ़ापेके मारे कफ और वायु घेरे रहते हैं, कमर और शरीरके जोड़ोंमें दर्द रहता है, खाँसो चलती है और दम चढ़ता है, वे बुद्ध हमारे कहनेसे इस चूर्णको नियमसे महीने-दो-महीने सेवन करके, इसका अपूर्व गुण देखें। अगर आपका मित्राज गरम नहीं है, उम्रमौसे रोग नहीं है, तो निश्चय ही इससे लाभ होगा। चार महीने शामको इसे और सवेरे "बुद्धसुधा चूर्ण" सेवन करें, तो बूढ़ोंके सारे रोग नाश होकर, सफेद बाल काले होनेके सिवा , जवानी का और सब आनन्द आजावे। दाम लंबगादि चूर्णकी १ शीशीका १)

बुद्धसुधा चूर्ण ।

यह चूर्ण विधारा और असगन्ध आदि २१ उत्तमोत्तम दवाओंसे बनता है। इसके सेवन करनेसे प्रमेह वगैरः धातु-रोग नाश होकर, शरीर खूब पुष्ट और बलवान होता है। जिनको प्रमेह है और जिनका शरीर मोटा-ताज़ा नहीं है, उनको इसे जाड़ेमें चार महीने खाकर आनन्द देखना चाहिये। ४० बरससे ६०७० बरसकी उम्र वाले इस अमृतको जाड़ेमें अवश्य सेवन किया करें। मूल्य ४० दिनकी दवाका ११)

२८ हरिदास एण्ड कम्पनी, २०१ हरिसन रोड, कलकत्ता ।

सुधारस ।

इस रससे समस्त प्रमेह नाश होते हैं और गिरती हुई धातु फौरन रुकती है। यह रस प्रमेह पर कभी फेल नहीं होता। इसमें अवीथ मोती, शिलाजीत, वंगभस्म और चाँदीके वर्क आदि क्रोमती चीजें गिरती हैं। जिन्हें मिकदारमें बहुत दवा खाना पसन्द न हो, वे लोग इसे अवश्य सेवन करें। अमीरोंके लायक अमृत है। मूल्य २१ दिनकी दवाका १५)

प्रमेहान्तक चूर्ण ।

इसके सेवन करनेसे बीसों तरहके प्रमेह निश्चय हो नाश हो जाते हैं। साथ ही बल-वीर्य और कान्ति बढ़ती है, शरीर खूब तैयार होता है, धातु गाढ़ी और पुष्ट होती है और स्त्री-प्रसंगमें स्वर्गीय आनन्द आता है। जो शुरुस इसे ६० दिन लगातार सेवन कर लेता है, स्त्री उसकी गुलाम हो जाती है। जिनकी धातु पेशाबकी राहसे गिरती है, प्रसंगकी इच्छा नहीं होती या रक्तावट नहीं होती, वे इसे अवश्य सेवन करें। ३० सालकी आजमूदा दवा है। फेल होना तो जानती ही नहीं। मूल्य ४० दिनकी दवाका १५)

वसन्तकुसुमाकर रस ।

जो प्रमेह किसी दवासे आराम नहीं होता, वह "वसन्त-कुसुमाकर"से आराम होता है। सभी प्रमेही इससे आराम होते

हरिदास एण्ड कम्पनी, २०१ हरिसन रोड, कलकत्ता। २६

हैं। कोई अभागा और बद्किस्मत ही आराम न हो तो न हो। इसकी एक-एक मात्रा "शहद" के साथ खानेसे कफ और वातज प्रमेह आराम होते हैं तथा "शर्बत चन्दन" के साथ खानेसे पित्तज प्रमेह और अरुपित्तादि रोग आराम होते हैं। गरम मिज़ाजवालोंको २ चाँबल और ताक़तवर एवं सदै मिज़ाजवालोंको दो रत्तीकी मात्रा है। इसमें सोनेकी भस्म, मोती भस्म, मूँ गाभस्म, निश्चन्दू सहस्रपुटो अम्रक भस्म, फ़ोलाद-भस्म और बंगेश्वर वगैरः सभी कीमती चीज़ें पड़ती हैं; इसलिये सभी वैद्य इसमें बढ़िया चीज़ें नहीं डालते। मोती असल ४०) या ४५) रुपया भरी मिलते हैं। वैद्य लोग १८) या २०) रु० भरीका कूड़ाकरकट डालकर "वसन्त कुसुमाकर" बना लेते हैं, तभी तो वह फायदा नहीं करता और वैद्यककी बदनामी होती है। हम हरेक चीज़ लोभ-लालच त्यागकर बनाते हैं, क्योंकि अबल तो जगदीशकी दयासे रुपयोंकी कमी नहीं, फिर मुँह-माँगे दाम मिलते हैं। १ तोलेका मूल्य ५०)।

चन्द्रप्रभावटी ।

• ये गोळियाँ भी प्रमेह नाश करनेमें प्रसिद्ध हैं, पर अब आदमियोंका बल और मिज़ाज और तरहका हो जानेसे शास्त्रोंमें लिखी हुई विधिसे बनाई हुई फायदा नहीं करतीं। देवाओंमें उलटफेर करनेसे फायदा करती है। हमने इनको अनेक बार आजमाया की है। ये बीसों तरहके प्रमेह, मूषकन्द, ५०)

ई० हरिदास पण्ड कम्पनी, २०१ हरिसन रोड, कलकत्ता ।

सूत्राघात और पथरीमें अपना अदुत चमत्कार दिखाती हैं। शास्त्रमें लिखा है, इनसे अरोचक, वमन, शूलसमेत प्रमेह, कष्ट-साध्य इन्द्रियकी गाँठ, अन्तर्द्वि, अण्डर्द्वि, कामला, पाण्डु, कोढ़, प्लीहा, उदर रोग, भगन्दर, श्वास, खाँसी, नेत्ररोग, मन्दाग्नि, दारुण सूत्राघात, सूत्रकूष्ठ शूल, अफारा, पथरी और मर्दोंके वीर्यके रोगो एवं स्त्रियोंके मासिक धर्मकी शिकायतें आराम्भ हो जातीं और बाँकके पुत्र होते हैं। मूल्य २१ गोलीका ३)

शिलोद्धवादि बटी ।

इन गोलियोंके ३ महीने लगातार सेवन करनेसे प्रमेह नाश होकर, बलवीर्य बढ़ता और शरीरमें शक्ति आती तथा चेहरे पर तेज और कान्ति विराजतो है। गरीबोंको यह गोलियाँ परमोत्तम हैं। सैकड़ों बारकी परीक्षित है। मूल्य ८० गोलीका ५)

लक्ष्मी विलास रस ।

इस रसके २३ महीने लगातार खानेसे बूढ़ा भी जवान हो जाता है, सिर्फ बाल काले नहीं होते। वह स्त्रीप्रसंगमें कभी नहीं थकता और अनेकों स्त्रियोंका धमपद चूर कर सकता है। यह नुसल्ला महात्मा नारदने भगवान् कृष्णको बताया था। वे इसीके ब्रह्मसे १६१०८ रानियोंके प्यारे हुए थे। एक मज्ञा और है कि, इसके खानेवालेको पथ्य-परहेजकी, जरूरत नहीं। और इसके सेवन करनेवाला दूध, दही, मांठा और माँससे बने

हरिदास एण्ड कम्पनी, २०१ हरिसन रोड, कलकत्ता। ३१

हुए पदार्थ और शराब भी सेवन करे, तोभी पूरा लाभ होता है। भोगशक्ति बढ़ानेके अलाव: इस रससे सन्निपातके घोर रोग, वात रोग, १८ कोह, गुदाके रोग, नासुर, भगन्दर, कफ और वातके रोग, हाथ-पाँव और गलेकी सूजन, आँते बढ़ना, अतिसार, पीनस, क्षय, बवासीर, मुट्ठापा, शरीरमें बढ़ू आना, आमवात, जिह्वास्तम्भ, गलघण्ड, वातरक्त, शरीरका दूद, कानके नाकके और आँखोंके रोग एवं औरतोंके रोग औराम होते हैं। दाम ८० गोलीका १०)।

सुवर्ण भस्म।

यह भस्म शीतल, बलवर्ध और कान्ति बढ़ानेवाली, प्रमेह, स्वास, खाँसी, पित्तरोग, क्षयरोग, बुढ़ापा और मृगी रोग नाशक है। यह नेत्रोंको हितकारी, बुद्धि और स्मरणशक्ति-वर्द्धक, हृदयको प्रिय, बलवर्द्धक, आयुवर्द्धक, स्थावर-जड़म विष नाशक तथा कामी पुरुषोंके लिए कल्पवृक्ष है; क्योंकि उन्हें मनमाने भोग भुगाती है। सब तो यह है, यह पृथ्वीका दूसरा अमृत है। मात्रा २ चाँवल से २ रस्ती तक। कमलकी केसर या भाँगरेके स्वरसके साथ खानेसे शरीरको पुष्ट करती है। बचके स्पर्श खानेसे बुद्धि बढ़ाती है। पीपर, बड़ी इलायची और शहदके साथ खानेसे नपुंसकताको मार भगाती है। शंखपुष्पी के रसके साथ खानेसे उग्र बढ़ाती है। विदारीकन्दके साथ खानेसे पुत्र देती है। केसरके साथ शरीरकी कान्ति बढ़ाती है। यह अलग-अलग अनुपानोंसे कोई ४० रोग नाश करती

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३२ हरिदास एण्ड कम्पनी, २०१ हरिसन रोड, कलकत्ता ।

है। जिनको भगवान्ने पैसा दिया है, वह इसे अवश्य सेवन करके जिन्दगीका आनन्द लूटे'। मूल्य १ तोलेका ६०)

चाँदीकी भस्म ।

यह भस्म शीतल, पाक और रसमें मधुर, दस्तावर, ज्वानी को ठहरानेवाली, पित्त और प्रमेह आदि नाशक है। प्रमेह पर यह ब्रास तौरसे उत्तम है। यह खूब ताकत लाती और वीर्य बढ़ाती है। बहुत क्या—उग्र, बल, वीर्य और बुद्धि बढ़ानेमें अब्बल दर्जे की चाञ्ज है। भूख लगाती, विष को फौरन नाश करती और कमजोरी को मार भगाती है। अगर यह अशुद्ध या बेक़ायदे बनी होती है, तो खुजली, पीलिया, सिर-दर्द कमजोरी और वीर्य नाश आदि रोग करती है। इसी तरह अशुद्ध खोने की भस्म भी बल-वीर्य नाश करती, रोग बढ़ाती और मृत्यु करती है। अतः ये चीज़ें ऐरे गैरे नत्यू खेरे दैघोंसे न लेनी चाहिये'। इस की मात्रा आधी रत्तीसे २ रत्ती तक है। शरीर-पुष्टिके लिए पानमें, वीर्य-बुद्धि को खोये और मिश्रीमें, आनन्द बढ़ाने को शहद और अदरखके रसमें; धातुपुष्टिको शहद, छोटी इलायची, बंसलोचन और सत्त गिलोय एक-एक रत्तीके साथ अथवा केवल मधुमें खानी चाहिये। मूल्य ८) ४० तोले।

वंगेश्वर ।

बंगभस्म हृत्की, दस्तावर, नेत्रों को हितकारी, किसी कदर पित्तकारक, कोढ़, प्रमेह, कफ, कीड़े, पीलिया और श्वास नाशक

हरिदास एण्ड कंपनी, २०१ हरिसन रोड, कलकत्ता । ३३

है । जिस तरह सिंह हाथियोंको मार भगाता है ; उसी तरह यह समस्त प्रमेहों को मार भगाती है । बंग देहमें सुख करती, इन्द्रियोंको बलवान करती और निश्चयही पुष्टि करती है । मसल मशहूर है” —“घोड़े को तंग और मर्द को बंग ।”

अगर दूषित या अशुद्ध बंग खाई जाती है, तो आक्षेपक-वात, कम्पवात, गोला, किलास कोह, शूल, सूजन, पीलिया, प्रमेह, पथरी, कफज्वर, विद्रधि और फोतोंके रोग पैदा करती है । बाज़ार वैद्य इसे बिना शोधे अजवायन वगैरः—से ज़रा सी देरमें फूँक देते हैं । लालच-वश जो सस्ती समझ कर, इसे उन अताइयोंसे लेकर खाते हैं, वे जन्म भर रोते हैं । असल उत्तम बंग का दाम २) रु० तोले और बंगेश्वर का दाम ८) तोले ।

अश्रक भस्म ।

यह भस्म कपैली, मीठो, शीतल, उष्ण बढ़ानेवाली, त्रिदोष, फोड़े, प्रमेह, तिह्लो, विष, कीड़े नाश करनेवाली, शरीर को पुष्ट करनेवाली और १०० खियोंको भोगने की शक्ति करनेवाली है । इसके सेवनसे सिंहके समान बलवान और दीर्घायु पुत्र होते हैं । अगर इसे कोई दो चार बरस खावे, तो उसके रुफे दू बाल भी काले होजावें और अकाल मृत्युका भय न रहे । सबसे उत्तम अश्रक भस्म १००० आँचकी होती है । वह काजल-जैसी चिकनी और निश्चिन्त (बिना खमक की) अच्छी होती

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है। उत्तम अम्रक टीक गुलाबके फूलके रंगकी और बिल्कुल चिकनी होती है। बेसी अम्रक खानेसे ही इतने गुण होते हैं। बेसी अम्रक हमारे पास है। (दाम ४०) रुपया तोले। यह १००० आँचकी है। ५०० पुटोका (दाम १५) २० तोले और ३०० पुटोका (है) तोले है। अपने-अपने दामोंके अनुसार सभी गुण करती हैं। हमारी ३०० पुटी अम्रक खाकर ही गुण देखलें। जिन्हें भगवान्ने धन दिया है, वे १००० पुटो ही खावें। दूसरा अमृत है। यह सभी आतुओंसे अधिक गुणकारी है।

जस्ता भस्म।

यह भस्म कड़वी, शीतल और कफपित्त नाशक है। यह दस्तावर, नेत्रोंको हितकारी, प्रमेह, पाण्डु और श्वास-नाशक है। इससे शरीर पुष्ट होता और उबर वगैरः नाश होते हैं। मात्रा १ रत्तोसे २ रत्ती तक। नपुंसकतामें जायफल, इलायची, मिश्रो और गायके दूधके साथ तथा प्रमेहमें पानके रसके साथ सेवन करनी चाहिये। (मूल्य २) २० तोले।

शीशा भस्म।

यह भस्म प्रमेह रोग नाश करनेमें बहुत अच्छी है। जो इसे खाता रहता है, वह हाथोंके समान बलवान हो जाता है। इससे रोग नाश होते, जीवन बढ़ता, अग्नि दीप्त होती, कामशक्ति बढ़ती और अकाल मृत्यु दूर होती है। व्रत रोग, कफ रोग, गुल्म, बवासीर, मूल, प्रमेह, क्षय, खाँसी, श्वास, कुम्भ, भ्रम,

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मन्दाग्नि, संग्रहणी और पीलिया आदि रोग नाश हो जाते हैं। मात्रा आधो रस्तीसे दो रस्ती तक है। शरीर-पुष्टिके लिए शोशा भस्म—मिश्रों, जायफल, पीपल और मावेमें खाई जाती है। कमजोरीसे दम फूलनेमें भी इसी तरह खाई जाती है। घोर प्रदर रोगमें पीपलके चूर्ण और काकमाचीके रसमें सेवन की जाती है। (दाम ३) रु० तोले।

लोहा भस्म।

इस भस्मसे बलवीर्ण और आयु बढ़ती है। बहुत दिन सेवन करनेसे कामदेव खूब जोर करता है। इसके सेवन करनेवालेके पास रोग नहीं आते। बड़ी ही ताकतवर चीज़ है। प्रमेहमें त्रिकलाके चूर्णके साथ; पाँचों खाँसियोंमें अङ्गुसेके रसके साथ; शरीर-पुष्टिको छोटी हरड और मिश्रीके साथ—अथवा पीपलके चूर्ण और शहदके साथ; श्वास रोगोंमें लहसन और घाके साथ लोहभस्म सेवन करनी चाहिये। (दाम ४) रु० तोले।

मूगा भस्म।

• यह भस्म मधुर, दीपक, हल्की, वीर्ण और कान्तिवद्धक है। इस भस्मसे त्रिदोष, राजयक्ष्मा, खाँसी, त्रिषदोष और उन्माद आदि रोग नाश होते हैं। हमने इसे क्षय और खाँसी में बहुत आजमाया है। इससे कमजोर और दुबला पतला आदमों खूब बलवान और मोटा-ताज़ा हो जाता है। जो लोग कोई भी

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भस्म खाना नहीं चाहते, वे मूँगको भस्म बेखटक खावे। उनका शरीर तैयार होगा, धातुकी कमी पूरी होगी, क्षयका नाश होगा और नेत्र-ज्योति बढ़ेगी। अमोर और गरीब सभी तरहके स्त्री-पुरुषोंके लिये मूँगभस्म सर्वोत्तम महोषधि है। दाम १०) रुपया तोले।

मोती भस्म।

मोती भस्म मधुर और शोतल है। राजयक्ष्मा, उरःक्षत, नेत्ररोग, वीर्यकी कमज़ोरी और नाताकृती आदि रोग इससे नाश होते हैं। जिन्हें इनमें से कोई रोग हो, वे "मोती-भस्म" सेवन करें; क्योंकि इससे खाँसो, श्वास, कफक्षय और मन्दाग्नि भी नाश होती है। लगातार खानेसे शरीर हृष्पुष्ट और बलिष्ट होता है। जीर्णज्वरी और सोज़ाक वालोंको भी इससे बड़ा लाभ होता है। जिनको भगवान् ने धन दिया है, वे असल मोती-भस्म सेवन करें। बहुतसे वैद्य मोतियोंको गुलाब-जलमें घोट देते हैं, वह भस्म उतना लाभ नहीं करती। इसके सिवा, वैद्य लोग सस्ते मोती लाकर भस्म बनाते हैं। जो मोती फोका, चपटा, मछली की आँखकी तरह लाल, टेढ़ा-मेढ़ा, खुट्टेवाला, रूखा और ऊँचा नीचा होता है, वह न तो खानेके कामका होता है और न पहननेके। जो मोती आकाशके तारोंकी तरह अमकदार, मोटा, चिकना, गोल, चन्द्रमाकी तरह सफेद, तोलमें भारी और बिना छेदवाला होता है, वही खाने और पहननेके कामका होता है, ऐसा मोती ४०) ५०) रुपये भरसे