भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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ऐसेहू धनवान होय, तो आदर वाकौ।

अपनो गात बिछाय, लेत रस सर्वस ताकौ।

गनिका विवेक-बेलकों, कदन करनवारी।

निरखि बच रहे कुलवन्त नर, रचत पचत मूरख हरषि ॥८६

89. What sensible man would like to have sexual intercourse with those prostitutes who give away their beautiful bodies for the sake of a little wealth even to those who are born blind, are ugly, are inactive due to old age, are foolish, are of low caste and are suffering from leprosy. These prostitutes are like knives to cut the creeper of reasoning.

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वेश्यासौ मदनज्वाला रूपेन्यनसेमथिता ॥

कामिर्भिर्यत्र ह्यनन्ते यौवनानि धनानि च ॥६०॥

यह वेश्या सुन्दरता रूपी ईधनसे जलती हुई प्रचण्ड कामाग्नि है। कामी पुरुष इस अग्निमें अपने यौवन और धनकी आहुति देते हैं ॥६०॥

खुलासा—वेश्या तेज् आगके समान है। जिस तरह आग लकड़ियोंसे जलती है; उसी तरह वेश्या रूपी अग्नि वेश्या के रूप-रूपी ईधनसे जलती है। जिस तरह होमकी अग्निमें घृत, चाँवल और तिल प्रभृतिको आहुति दी जाती है; उसी तरह वेश्याग्निमें कामी लोग अपनी जवानी और धनकी आहुति देते हैं। होमकी अग्निमें घृत चाँवल प्रभृति जिस तरह जल कर