भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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राख हो जाते हैं; उसी तरह वेश्या-रूपी अग्निमें, कामियों के रूप, यौवन और धनकी राख हो जाती है। सारांश यह कि, वेश्यासे प्रीति करने वालोंके रूप, यौवन और धन कृतई नाश हो जाते हैं। रणडीबाज़ी करने वाले अनेकों करोड़पति स्नाकपति और दर-दरके मिखांरों हो गये। अतः बुद्धिमानोंको इस वेश्या-रूपी भयङ्कर अग्निसे सदा दूर रहना चाहिये; क्योंकि जिस तरह अग्निमें गिरनेवाला सर्वथा भस्म हो जाता है; उसी तरह वेश्या-रूपी अग्निमें गिरने वाला भी सर्वथा भस्म हो जाता है; • क्योंकि रूप-यौवन तो चन्द्र रोज़में हो स्वाहा हो जाते हैं। जब तक धन रहता है, वेश्या प्यार (झूटा दिखावटो प्यार) करती है। कामी धनहीन हुआ कि, वेश्याने उसे घरसे धक्के देकर या जूतियाँ लगवा कर निकाला। जब कामी इस दुर्गतिको पड़ु ब जाता है, तब वह या तो विष प्रभृति खाकर या गलेमें फाँसी लगा कर मर जाता है अथवा बोरी वगैरः करनेसे पकड़ा जाकर जेलमें ठूस दिया जाता है। वहाँ वह दुःख पाकर मर जाता है। अगर जेलकी अवधि पूरी करके चला भी आता है, तो फिर वेश्याके लिये धन देनेको बोरी प्रभृति करता है या किसीको हत्या करके, उसका धन हथियानेकी चेष्टामें पकड़ा जाकर, फाँसी पर लटक दिया जाता है।

दोहा ।

गनिका कनिका अगिन की, रूप समिध मजबूत ।

होम करत, कामी पुरुष, धन यौवन याहूत ॥६०॥