भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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सार—वेश्या धन और प्राणों के नाश करने वाली भयङ्कर अग्नि है ।

90 The prostitutes are the flames of passion burning with the fuel of beauty. Lustful men throw into that fire their wealth and health.

—*

करचुम्बति कुलपुरुषो वेश्याधरपल्लव मनोहमपि ।

चारभटचौरचेटकनटविदनिधीवनशरावम् ॥६१॥

वेश्याका अवर-पल्लव ( ब्राँठ ) यद्यपि अतीव मनोहर है ; किन्तु वह जासूस, सिपाही, चोर, नट, दास, नीच और जारोंके थूकनेका ठीका है । इसलिये कौन कुलीन पुरुष उसे चूमना चाहैगा ॥६१॥

खुलासा—सुन्दरी वेश्या के होठ निश्चय ही बढ़े मनोहर होते हैं, परन्तु उसके सुन्दर होठोंको चोर, बदमाश, गुण्डे, गुलाम, डाकू और भाँड़ प्रभृति महानीच चूमते और चूसते हैं ; इसलिये वह महाअपवित्र और गन्दे हो जाते हैं । ऐसे गन्दे और नापाक ओठोंको कौन प्रतिष्ठित और ऊँचे कुल का पुरुष चूमना चाहता है ? अर्थात् उसे नीच लोग ही चूमना चाहते हैं ; कुलीन पुरुष उस नीचोंके थूकनेके ठीकरके अपनी जीभ लगा कर उसे गन्दी नहीं करते ।

पहले लिख आये हैं कि, वेश्या पैसेकी गुलाम है, उसे पैसे

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