शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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से प्रेम है । वह रूप, यौवन, गुण, विद्या और उत्तम वंश प्रभृति को नहीं देखती ! उसे यदि भङ्गी और चमार धन दें, तो वह उन्हींकी हो जाती है । उसके सुन्दर ओठोंको वही चूमते-चाटते और उसके शरीरको गन्दा करते हैं । जिसे कुछ भी पवित्रता-अपवित्रताका ध्यान है, जिसने उच्च कुल और उत्तम वर्णमें जन्म लिया है, वह वैसी गन्दगीकी खानसे नेह लगाकर, क्यों अपनी आत्माको कलुषित करेंगी ? वेश्या नीच पापियोंके योग्य है, अतः नीच लोग ही उसके पास जायेंगे । भङ्गी और चमारोंका काम भङ्गी-चमार ही करेंगे ; ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य उनके कामोंको हरगिज़ न करेंगे ।
सोरठा ।
गनिकाके मृदु थोठ ; को कुलीन चुम्बन करें ? ।
नट, मट, विट, ठग, गोठ ; पीकपाल है सबनको ॥६१॥
सार— वेश्याएँ महा अधम और पापियोंके द्वारा भोगी जाती हैं, अतः वे श्रेष्ठ-कुलोत्पन्न पुरुषोंके योग्य नहीं ।
91. Though the leaf-like lips of a prostitute are beautiful, yet what respectable person would kiss that which is the pot where cheats, rogues, rustics, thieves and knaves throw their saliva.
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