भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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धन्यास्त एव चपलायतलोचनानां

तारुण्यदर्पवनपीनपयोधराणाम् ॥

चामोदरोपरिलसत्त्रिवलीलतानां

हृदृवाऊर्ति विकृतिभेति मनो न येषाम् ॥६२॥

चञ्चल और बड़ी-बड़ी आँखों वाली, यौवनेके अभिमानसे पूर्ण, हृद और पुष्ट स्तनों वाली एवं क्षीण उदर-भाग पर त्रिवलीसे सुशोभित युवती स्त्रियोंकी सूत्र देखकर, जिन पुरुषोंके मनमें विकार उत्पन्न नहीं होता, वे पुरुष धन्य हैं ।

खुलासा—बड़ी-बड़ी चञ्चल आँखों वाली, नारङ्गियोंके समान गोल और कठोर स्तनों वाली तथा पेटके अघोभाग पर तीन रेखाओं वाली जवान स्त्री को देखकर किसी विरुद्ध ही माईके लालके मनमें अनुराग उत्पन्न नहीं होता । जिसके मनमें ऐसी सुन्दरीको देखकर उथल-पुथल नहीं मचती, जिसका मन ऐसी नारीको देखकर विचलित नहीं होता, वह पुरुष निश्चयः ही क्राबिल-तारीफ़ है । उसने संसारको जीत लिया है । उससे बढ़कर और शूरवीर नहीं । वह चेष्टा करनेसे सहजमें परमपद पा सकता है । जिसका मन ऐसी सुन्दरी पर नहीं चलता, उसका मन और किसी भी संसारी पदार्थ पर चल नहीं सकता । जिसे ऐसी तक्षणीसे विराग है, उसे संसारसे विराग है । जिसे ऐसी नारीसे चिरक्ति है, वह निश्चय ही महात्मा है । किसोने ठीक ही कहा है :—

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