भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

Devanagarihipublished544 पृष्ठ

पृष्ठ 482, कुल 544 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 482

( ४०७ )

सानुरागां क्षिप्रं दृष्ट्वा, मृत्युं वा समुपस्थितम् ।

आविकलमनाः स्वस्थो, मुक्त एव महाशयः ॥

अनुराग-पूर्णं स्त्री और मौतको सामने देखकर भी, जिसका मन व्याकुल नहीं होता, वह महाशय मुक्त-रूप है ।

दोहा ।

जीए लंक अरु पीन कुच, लखि तिथके हगतीर ।

जे अधीर नहिं करत मन, धन्य-धन्य ते धीर ॥६२॥

सार—परमा रूपवती नवीना नारी पर जिस का मन नहीं चलता, वह मनुष्य नहीं देवता है ।

92. Blessed are those whose minds are not disturbed on looking at the woman who has restless big eyes, is young and handsome, has full grown and high breasts and on whose thin belly are the elegant lines,

—*—

बाले लीलामुकुलितमभी सुन्दरा दृष्टिभाताः

किं चिप्पन्ते विरम विरम व्यर्थ एष श्रमस्ते ॥

सम्पत्यन्ये वृद्धमुपरतं बाल्यमास्या बनान्ते

जीणो मोहस्तृणमिव जगज्जालमालोकयामः ॥६३॥