शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
( ३६० )
जानते हैं कि, वेश्याएँ किसीके साथ प्रीति नहीं करतीं। इनका प्रेम एकमात्र धनके साथ होता है और खूब धन पाने पर भी ये किसी की नहीं होतीं ; परन्तु यहाँ तो सब उल्टा ही दीखता है। यह सती और अविचल प्रेमवती है, इसमें मुझे जरा भी शक नहीं होता।” गुणसिन्धु अपने मालिक की आज़ादी को रणडी की बातों की धारामें बहती देख, दिल्ली करता हुआ, कहने लगा,—“राजन् ! वेश्याका विश्वास विश्वमें कौन करता है ? कागा जती नहीं होता और वेश्या सती नहीं होती। यह ज्ञात विश्वासयोग्य नहीं। यह किसीको प्यार नहीं करती। इसका एक मात्र प्यारा रुपया है। यह अपने वचनको कभी पूरा नहीं करती। यह कभी किसीसे नेह निर्वाह नहीं करती। झूठ बोलना इसका नियम और ब्रत है। इसके मनकी बात, इसके संकल्प और इसकी महत कामनाको सहजमें ही कोई जान नहीं सकता। यह आपका अत्यन्त आदर करती है। आपके साथ अटल प्रेम प्रकट करती है ; पर यह सुख क्षणिक है। मतिहीन लोग वेश्याके बारे विचारोंको न जान कर, उसकी ऊपरी बातों पर मर-मिटते हैं। वह उपरसे अमृत है, पर भीतरसे हालाहल विष है। वेश्या—आशाकी तरह, आरंभमें अतिशय आनन्ददायिनी होती है ; परन्तु अन्तमें अमित दुःखसे पददलित कर छोड़ती है। हरि और हर प्रभृति देवता भी वेश्या और मायाके सच्चे स्वरूप को नहीं जानते ; तब आदमी बेवारा किस क्षेतकी मूली है ?
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राजा पर मंत्रीको उपरोक्त बातों का बड़ा असर हुआ। उनके दिलमें तरह-तरहके विचार उठने लगे। उन्होंने वेश्या की प्रीतिकी परीक्षा लेनेकी ठानी। वह एक दिन साँस चढ़ा कर मुदाँ हो गये। राजाकी अन्त्येष्टि किया करनेके लिये लोग उन्हें श्मशान पर लेगये। वेश्या भी सफेद कपड़े पहन कर, सती होनेके लिये, चिताके पास पहुँची। वह ज्योंही चितामें गिरने लगी, त्योंही राजाने चितासे उठकर उसका हाथ पकड़ लिया और कहा—“प्यारी”! सच्ची सती!.. ठहर! ठहर! मैं जिन्दा हूँ।”
उस दिनसे राजा रणधीर सिंह उस वेश्याके एकदम गलाम हो गये। उन्हें मंत्री पर बड़ा क्रोध आया। वे उसे मूर्ख समझने लगे। अब राजाके दिन फिलने और मंत्रीकी बात सच्ची होनेका समय आया। राजाने वेश्याकी अपार सम्पत्ति खर्च करके, कई लाख पैदल, पचास हजार सवार और दस हजार हाथी वगैरः अपने हाथमें कर लिये। उस सेनाको लेकर उन्होंने अपने शत्रु पर चढ़ाई की और उसे पराजित कर अपना राज्य ले लिया। वेश्या पटरानी बनाई गई। सब रानियोंसे अधिक उसका मान होने लगा।
एक रोज राजाको बहुत ही प्रसन्न देखकर वेश्याने कहा—“महाराज”! मैंने आपके साथ जो भलाई की है, उसे आप यावज्जीवन नहीं भूलेंगे। क्या आप, उसके बदलेमें, मेरी भी एक मनोकामना पूरी करेंगे?” राजाने कहा—“प्यारी! तु जो कह
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में वही करनेको तैयार हूँ।” वेश्याने कहा—“महाराज ! मेरा एक प्राणाधार, परम प्यारा, नयनोंका तारा है। वह निरपराध, चोर समझा जाकर, विदर्भ नगरमें पकड़ा गया और आज तक जेलमें बन्द है। आप उसे कठिन कारागारसे छुड़ाकर, दासी को कृतार्थ कीजिये।”
वेश्याकी उपरोक्त बात सुनते ही राजाके होश-हवास जाते रहे। अकृ हवा हो गई, सन्नाटा छा गया, वे उगेसे हो गये। वे इकट्ठा वेश्याके मुँह की तरफ देखने लगे। कुम्हलाये हुए कमलके फूलकी तरह, उनका सिर नीचेको झुक गया। इस समय उन्हें मंत्रोंकी बातें याद आईं। उनके दिलमें, समुद्रकी लहरोंकी तरह, एक-पर-एक संकल्प-विकल्प उठने लगे। बड़ी देरके बाद वह बोले :—
“प्यारी ! सुख-दुःखकी साधन ! तुम्हें आज क्या हो गया है ? क्या तूने आज शराब पी ली है ? तू आज ऐसी बेहूदी बातें क्यों कर रही है ?” राजाने उसे बहुत तरहसे समझाया, पर वह अपनी बातसे जरा भी न डिगी। उसने कहा—“महाराज ! आप बहुत भोले हैं। जगत्में बिना स्वार्थके कोई भी मुहब्बत नहीं करता, जिसमें हमारा तो स्वार्थपरायण व्यवहार जगत्में प्रसिद्ध है। अगर आपको मेरे उपकारका लेशमात्र भी ध्यान है और आपके चित्तपर कृतज्ञताका जरा भी संस्कार है, तो आप मेरी इस प्रार्थनाको स्वीकार कीजिये।” लाचार, राजाने सेना भेजकर विदर्भ नगरको फतह
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किया और उस वेश्याके यारको जेलसे छुड़ाकर उसके हवाले किया।
बुद्धिमानो ! वेश्यासे सदा सावधान रहो। वह तुमसे प्रेम रखती है, तुम्हें चाहती है, ऐसा कभी मत समझो। अगर ऐसा समझोगे, तो धोखा खाओगे। वेश्या यारसे बातें करती है; पर उसका मन और जगह रहता है। वेश्या अपना तन हर किसीको सौंप देती है, पर मन किसीको नहीं सौंपता। वह क्षण-क्षणमें नई-नई बातें कहता है। एक शब्द दूसरेके, मुक्तिकूल कहना, तो उसका कर्त्ताव्य है। बातोंका लौटफेर और फेरबका ढेर सदा उसके पास मौजूद रहता है। वेश्या स्कूटकी पुतली है। उसे यथायथ रूपसे कोई भां जान नहीं सकता। वेश्या पाँच तरहके यार रखती है—(१) एककी तो वह तारीफ़ हो किया करती है, (२) दूसरेका धन लूटता है, (३) तीसरेसे सेवा कराती है, (४) चौथेको अपनी रक्षाके लिये रखती है, और (५) पाँचवें की सदा मसखरी किया करती है। वेश्या किसीसे भी प्रीति नहीं करती। जो नर वेश्याके बन्धनमें फँस जाता है, उसको मुक्ति चिकालमें भी नहीं होती। उसका सत्यानाश हो जाता है। सुख-शान्ति उसमें किनारा कर जाते हैं। कुटुम्ब परिवार वाले उसे धिक्कारते हैं। वेश्यागानों इस लोक और परलोकमें अनेक तरह-बेकष्ट और क्लेश भोगता हुआ, चौरासी लक्ष योनियोंमें भ्रमता रहता है। जिस तरह माँप अपनी पुरानी कैंचलाको त्याग देता है; उसी तरह वेश्या अपने करोड़पति यारको भी निर्धन होते
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ही, जूने मारकर निकाल देती है। इसलिये जिन्हें संसारमें सुख भोगना हो, वे वैश्याके नज्दीक न जावें।
किसीने क्या खूब कहा है :—
गाना न० १
रगड़ी नहीं किसी को यार, ओ घर बार लटाने वाले। तीखे नयन चलाने वाले, रगड़ी नहीं किसी को यार ॥ इनका कूठा है जंजाल, इनका खोटा है व्यवहार। इसमें नफा नहीं है यार, ओ घरबार लटाने वाले ॥ इनके नखेरे इनकी चाल, इनके चिकने-चिकने गाल। इनके लम्बे-लम्बे बाल, आकृत करने वाले ॥ रड़ी नहीं किसीको यार, ओ घर-बार लटाने वाले। इनकी उद्दबत, इनको बातोंमें मत आना ॥ इसपर दिलको मत ललचाना, इनकी उद्दबतसे घराना।
आकृत था जाय जाने वाले। रगड़ी नहीं किसी को यार। ओ घर-बार लटाने वाले ॥ जब तक पैसा तबतक रगड़ी। जबतक बिलसे तबतक मगड़ी। वह तो खा-खा हुई मुछगड़ी। तुम पर आने लगे तमाले। जब से रुक गई घरकी मोरी। माँगो भीख करो या चोरी। अब तो हवा जेल की खा ले। रगड़ी नहीं किसी की यार। ओ घर-बार लटाने वाले ॥
( ३६५ )
गाना न० २
पहले तो घरमें दाम बिछाती हैं रघिइयाँ ।
वे-दाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रघिइयाँ ॥
करके सिंगार शामको, छा बैठीं बाम पर ।
करती हैं फिर इधारा, वह मक्कार वेखतर ॥
देखा कि मालदार, कोई भ्राता है इधर ।
फौन किया सलाम, फिर उसने मुँकाके सर ॥
किस ढबसे तुम्हें चालमें, लाती हैं रघिइयाँ ।
वे-दाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रघिइयाँ ॥
लेकर सलाम हो गये, गेंडासे फूलकर ।
कोठे पै उसके चढ़ गये, सोचा न कुछ मगर ।
तकिया लगाके बैठ गये, सीना तामकर ।
रगड़ीने देखते ही, करो माल पर मज़र ॥
हँस-हँसके नाज़-नखरे, दिखाती हैं रघिइयाँ ।
वे-दाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रघिइयाँ ॥
गई-नमें हाथ डाल, बोली वह सोमबर :-
“पहलुमें लेके सोइये, मुने कलको रातभर ॥
दोनो मने उड़ायेगे, बड़ाह ता-सहर ।”
फिर नायकाजो बोली, कि जलदी शिकार कर ॥
दाम=जाल । बाम=छत ; भ्रातरी । वेदाने=बिना चारेके । मुर्गी-दिल= यहाँ दिलको मुर्गी पकी कहा है । गेंडा=एक भयंकर मोटा जड़ली जामर । सीना=छाती । सोमबर=चन्द्रबदनी ; चाँदी जैसी गोरी । पहलु=काल ता=तक । सहर=खेवा ।
( ३६६ )
बाते बना-बनाके, लुभाती हैं रघिइयाँ ।
वेदाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रघिइयाँ ॥
मक्कार नायकाकी, तो छन लीजिये दास्तान ।
जल्दीसे जाके अपना, उठा लाई पानदास ॥
बोझी—“तम्बाकू छालियाँ, * गूँगा दीजियेगा पान ।”
रंड़ी बोली—“हाँ, अभी आता है मेरी जान ! ॥”
पहला सवाल तुमको, सुनाती हैं रघिइयाँ ।
वेदाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रघिइयाँ ॥
जेबोंमें लगी देखने, वह हाथ डोलकर ।
सुट्टीमें भरके लाई, कुछ थोड़ासा मालोजर ॥
उस्ताद जोसे बोली—“जरा आइयो इधर ।
कल्या तम्बाकू छालियाँ, इन्हें लादे जल्दतर ”
फौरन ही फिर तो, पान खिलाती हैं रघिइयाँ ।
वेदाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रघिइयाँ ॥
चिन्हाके बोली नायका—“यहाँ होते जाइये ।
रक्ड़ी और दूध थोड़ासा, हलवा भी लाइये ॥
दो पैसेकी अफयन भी, तुम खाते आइयो ।
सदका गई उस्ताद, जरा जल्दी आइयो ॥”
थोड़ा-ही-थोड़ा करके, मँगाती हैं रघिइयाँ ।
वेदाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रघिइयाँ ॥
दास्तान—कहानी । छालियाँ—छपारी । * मालोजर—रूपया-पैसा ।
अफयन—अफोम । सदका गई=बलाये लूँ ; कुर्गान हूँ ।
( ३६७ )
जब सेठजीका हो गया-भोड़सा खर्व माल।
रंडीने फिर दी उन्हें, फौरन ही एक चाल ॥
गद्दी बचाके रख लिया, एक म्यानीमें रुमाव।
बोली कि झोड़ दो मुझे, इस वक्त है गैर हास।
अव्ययभका बहाना, बनाती हैं रथिडयाँ।
वेदाने सुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रथिडयाँ ॥
फिर नायकाजी बोली—“अजी सेठजी जनाब !
बनियेका और सनारका, देना है कुछ हिसाब ॥”
रगड़ो टसकके बोली—“नहीं रेत हो जवाब ?”
घबराके बोले सेठजी—“कुलवाइये शिताब ॥”
अब घरमें उनके, आग लगाती हैं रथिडयाँ।
वे-दाने सुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रथिडयाँ ॥
बनियेका और सनारका, जब दे चुके हिसाब।
फिर सेठजी पै और हुआ, एक मया इताब ॥
“जोड़ै बनाके लाइये, जल्दीसे लाजवाब।
फिर कौन है तुम्हारे सिवा, लूटे जा शबाब ? ॥”
हर रोज ताज़ा फिकर, बनाती हैं रथिडयाँ।
वेदाने सुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रथिडयाँ ॥
जोड़ैका नाम सुनते ही, बाज़ारमें जाकर।
कपड़ा लिया और लाये वह, दरज़ीको बुलाकर ॥
म्यानी—गुप्त अंग। औरतें रजस्वला होनेके समय उस अंगमें कपड़ा रख लेती हैं, ताकि खून-हैजसे धोती झरा न हो। शिताब—जल्दी। इताब—हुकम। लाजवाब—चै जोड़, अद्वितीय। शबाब—जवानोंका मज़ा।
( ३६८ )
कहने लगे—“सीं दो इत्ते, जलदो सजाकर ।”
रंडीसे कहा पहन लो, ऐ ! जान पहले नहाकर ॥”
इस शब फिर उसे, पास छलाती हैं रंडियाँ ।
वेदाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रंडियाँ ॥
शब-भर तो मज़ा सेठजीने, खूब उड़ाया ।
रंडीने सेहर होते ही, एक फ़िक़रा बनाया ॥
ऐसा कोई मर्द नहीं, आज तक आया ।
रग-रगमें मेरे दर्द था, तुम्हने मिटाया ॥
वे-परकी देखो कैसी, उड़ाती हैं रण्डियाँ ।
वे दाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रंडियाँ ॥
ये छुमते ही फिर सेठजी, फूलें न समोये ।
घरमें था जो कुछ मालोज़र, सारा ही ले आये ॥
गुलझरें कई रोज़ तक, खूब उड़ाये ।
जब कुछ न रहा पास, तो फिर फ़ाक्रोंपर आये ॥
शब लुब्बा बेईमान, बताती हैं रंडियाँ ।
वेदाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रंडियाँ ॥
रंडीने मूँड़-माँड़के, जब घरसे निकाला ।
आँखें जो खुलीं फिर, तो नज़र आया उजाला ॥
जो कहता था वहनोई, वह कहता नहीं साला ।
जब कुछ न रहा पास, तो अपने लगे मांसा ॥
शब=रात । शबभर=रातभर । सेहर होते ही=खेरा होते ही रग-रग=नस-नस । बेघर की=बिना सिर-पंर की । फाक्रों पर आये=उपवास करने लगे—भूखों मरने लगे ।
( ६६६ )
लो इस तरह, हज़ामत बनाती हैं रंघियाँ।
बेदाने सुर्ग-दिलको, फँसाती हैं रंघियाँ।
इकतरफ़ा और गज़ब, फ़लक-पीरने डाला।
गरमी जो हुई, फिरते हैं पक्ड़े हुए ख़ाला॥
जुज़ बहुत नहीं, और कोई पूछनेवाला।
फिर नीमको टहनोसे, पड़ा उनके पाखा॥
दोज़ख़का मज़ा अब तो, चलाती हैं रंघियाँ।
बेदाने सुर्ग-दिलको, फँसाती हैं रंघियाँ।
जिस कमरे पे होली थी, बहुत ब्यापकी इज़ज़त।
अब कोई नहीं पूछता, यह हो गई हालत॥
बेज़ार हैं सुरतसे, ग़ज़ब हो गई नफ़रत।
भड़वाँका इशारा है, कहाँको है ये मिष्ठत॥
किस जिह्वासे बनावोसे, उठाती हैं रंघियाँ।
बेदाने सुर्ग-दिलको, फँसाती हैं रंघियाँ॥
अब भी तुम्हें कुछ शर्मा, मियाँ सेठजी ! ब्राई।
जब बरमें गये, ज़तौसे मारे है खुग्राई॥
लो सुफ़तमें हसवा हुई, जिह्वा भी उठाई।
न माँ है : वफ़ादार, न फ़रज़न्द न माई॥
ज़्तों पे जो बैठें, तो उठाती हैं रंघियाँ।
बेदाने सुर्ग-दिलको, फँसाती हैं रंघियाँ॥
5 ग़ज़ब=शक्ति। फ़लक=श्राप्मान। पीर=देवता। गरम=श्रात- यक, उपदंश। ख़ाला=शिरन, लिंगोन्दिप। दोज़ख़=नरक। हसवा= बदनामी। फ़रज़न्द=बेटा।
( ४०० )
तरह हुए इकने, फिर आके सताया।
जाकरके लवे बाँम, यह रो-रोके छुआया ॥
जो माल कि था पास मेरे, मैंने लुटाया।
अब रख लो मुलाजिम, तो रहे आपका साया ॥
क्या रंग ज़मानेका, दिखाती हैं रँडियाँ।
वे-दाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रँडियाँ ॥
“शहबाज़” कलम रोक, अब आगे न बढ़ाना।
इतना ये बहुत है, जो तेरे कहनेको माना ॥
रंडोसे वफ़ा कब है ? यह जानता है ज़माना।
इस शब वह होती इमिला, खिन्न उसको ज़माना ॥
हसको नवाँ महीनो, बनाती हैं रँडियाँ।
वे-दाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रँडियाँ ॥
लो और सुनो सेठको, क्रिस्मतकी डुराई।
रंडीके जो लड़की दुहे, वह किसकी कहलाई ॥
हरेकने फिर उनकी तरफ़, उँगली उठाई।
रंडीकी जो लड़की है, इन्हींकी तो है जाई ॥
अब रिश्तेदार तुमको, बनाती हैं रँडियाँ।
वेदाने-मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रँडियाँ ॥
रंडीने छूटी नहाके, लो फिर रात जगाई।
हर भड़वा हरेक रंडी, हरेक नायका आई ॥
बरह हुए=दूर हुए। इश्क़=प्रेम। मुलाजिम=नौकर। साया=छाया। शहबाज़=कविका नाम है, जिसने यह कविता बनाई है। वफ़ा=भलाई। इमिला=गर्भवती। ज़माना=दुनिया। रात जगाई=रतजगा किया।
( ४०१ )
बोली कि सुबारक हो, यह दौलत तुने पाई ।
सदके तेरी बच्ची, यह खिलायेगी कमाई ॥
लो तुल्का नातहकीक, कहाती हैं रडियां ।
वे दाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रडियां ॥
इन सेठके लड़केने, उधर होय संभाला ।
लड़कीने जवान होते ही, जोबनको निकाला ॥
शैतानने इन दोनोंको, फिर बोखला डाला ।
लड़केने सेठकी उसी लड़कीको संभाला ॥
भाई-बहनको, पास छलाती हैं रडियां ।
वे दाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रडियां ॥
शैतानको श्रापिदें हैं, जरियते शैतान ! ।
लाहौल नहीं पकते, किधर है तुम्हारा ध्यान ? ।
दौलत भी गई मुस्तमें, खोया गया ईमान् ।
गर लाख रुपये दोजिये, तो क्या इनपर है ऐहसान ॥
और अपना ही ऐहसान, जताती हैं रडियां ।
बेदाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रडियां ॥
उपपत्त ।
जातिहीन, कुलहीन, अन्ध ; कुसित कुरूप नर ।
जरा-यसित कशगात, गलितकुडी अरु पांडर ।
सुबारक हो=फलों-फूलों; बधाई है । सदक=बलैयाँ लूँ ; कुबान होऊँ । तुल्का नातहकीक=जिधके बीजका पता न हो । बोखला डाला=पागल बसाया ; गुमराह किया । शैतान=खुदाका मुझालिफ, जो लोगोंको पुरी राह पर चलनेको बहकाता है । जरियते शैतान=शैतानको औलाद । लाहौल=नफरतका कलम । *
२६
( ४०२ )
ऐसेहू धनवान होय, तो आदर वाकौ।
अपनो गात बिछाय, लेत रस सर्वस ताकौ।
गनिका विवेक-बेलकों, कदन करनवारी।
निरखि बच रहे कुलवन्त नर, रचत पचत मूरख हरषि ॥८६
89. What sensible man would like to have sexual intercourse with those prostitutes who give away their beautiful bodies for the sake of a little wealth even to those who are born blind, are ugly, are inactive due to old age, are foolish, are of low caste and are suffering from leprosy. These prostitutes are like knives to cut the creeper of reasoning.
—*—
वेश्यासौ मदनज्वाला रूपेन्यनसेमथिता ॥
कामिर्भिर्यत्र ह्यनन्ते यौवनानि धनानि च ॥६०॥
यह वेश्या सुन्दरता रूपी ईधनसे जलती हुई प्रचण्ड कामाग्नि है। कामी पुरुष इस अग्निमें अपने यौवन और धनकी आहुति देते हैं ॥६०॥
खुलासा—वेश्या तेज् आगके समान है। जिस तरह आग लकड़ियोंसे जलती है; उसी तरह वेश्या रूपी अग्नि वेश्या के रूप-रूपी ईधनसे जलती है। जिस तरह होमकी अग्निमें घृत, चाँवल और तिल प्रभृतिको आहुति दी जाती है; उसी तरह वेश्याग्निमें कामी लोग अपनी जवानी और धनकी आहुति देते हैं। होमकी अग्निमें घृत चाँवल प्रभृति जिस तरह जल कर
( ४०३ )
राख हो जाते हैं; उसी तरह वेश्या-रूपी अग्निमें, कामियों के रूप, यौवन और धनकी राख हो जाती है। सारांश यह कि, वेश्यासे प्रीति करने वालोंके रूप, यौवन और धन कृतई नाश हो जाते हैं। रणडीबाज़ी करने वाले अनेकों करोड़पति स्नाकपति और दर-दरके मिखांरों हो गये। अतः बुद्धिमानोंको इस वेश्या-रूपी भयङ्कर अग्निसे सदा दूर रहना चाहिये; क्योंकि जिस तरह अग्निमें गिरनेवाला सर्वथा भस्म हो जाता है; उसी तरह वेश्या-रूपी अग्निमें गिरने वाला भी सर्वथा भस्म हो जाता है; • क्योंकि रूप-यौवन तो चन्द्र रोज़में हो स्वाहा हो जाते हैं। जब तक धन रहता है, वेश्या प्यार (झूटा दिखावटो प्यार) करती है। कामी धनहीन हुआ कि, वेश्याने उसे घरसे धक्के देकर या जूतियाँ लगवा कर निकाला। जब कामी इस दुर्गतिको पड़ु ब जाता है, तब वह या तो विष प्रभृति खाकर या गलेमें फाँसी लगा कर मर जाता है अथवा बोरी वगैरः करनेसे पकड़ा जाकर जेलमें ठूस दिया जाता है। वहाँ वह दुःख पाकर मर जाता है। अगर जेलकी अवधि पूरी करके चला भी आता है, तो फिर वेश्याके लिये धन देनेको बोरी प्रभृति करता है या किसीको हत्या करके, उसका धन हथियानेकी चेष्टामें पकड़ा जाकर, फाँसी पर लटक दिया जाता है।
दोहा ।
गनिका कनिका अगिन की, रूप समिध मजबूत ।
होम करत, कामी पुरुष, धन यौवन याहूत ॥६०॥
( ४०४ )
सार—वेश्या धन और प्राणों के नाश करने वाली भयङ्कर अग्नि है ।
90 The prostitutes are the flames of passion burning with the fuel of beauty. Lustful men throw into that fire their wealth and health.
—*
करचुम्बति कुलपुरुषो वेश्याधरपल्लव मनोहमपि ।
चारभटचौरचेटकनटविदनिधीवनशरावम् ॥६१॥
वेश्याका अवर-पल्लव ( ब्राँठ ) यद्यपि अतीव मनोहर है ; किन्तु वह जासूस, सिपाही, चोर, नट, दास, नीच और जारोंके थूकनेका ठीका है । इसलिये कौन कुलीन पुरुष उसे चूमना चाहैगा ॥६१॥
खुलासा—सुन्दरी वेश्या के होठ निश्चय ही बढ़े मनोहर होते हैं, परन्तु उसके सुन्दर होठोंको चोर, बदमाश, गुण्डे, गुलाम, डाकू और भाँड़ प्रभृति महानीच चूमते और चूसते हैं ; इसलिये वह महाअपवित्र और गन्दे हो जाते हैं । ऐसे गन्दे और नापाक ओठोंको कौन प्रतिष्ठित और ऊँचे कुल का पुरुष चूमना चाहता है ? अर्थात् उसे नीच लोग ही चूमना चाहते हैं ; कुलीन पुरुष उस नीचोंके थूकनेके ठीकरके अपनी जीभ लगा कर उसे गन्दी नहीं करते ।
पहले लिख आये हैं कि, वेश्या पैसेकी गुलाम है, उसे पैसे
( ४०५ )
से प्रेम है । वह रूप, यौवन, गुण, विद्या और उत्तम वंश प्रभृति को नहीं देखती ! उसे यदि भङ्गी और चमार धन दें, तो वह उन्हींकी हो जाती है । उसके सुन्दर ओठोंको वही चूमते-चाटते और उसके शरीरको गन्दा करते हैं । जिसे कुछ भी पवित्रता-अपवित्रताका ध्यान है, जिसने उच्च कुल और उत्तम वर्णमें जन्म लिया है, वह वैसी गन्दगीकी खानसे नेह लगाकर, क्यों अपनी आत्माको कलुषित करेंगी ? वेश्या नीच पापियोंके योग्य है, अतः नीच लोग ही उसके पास जायेंगे । भङ्गी और चमारोंका काम भङ्गी-चमार ही करेंगे ; ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य उनके कामोंको हरगिज़ न करेंगे ।
सोरठा ।
गनिकाके मृदु थोठ ; को कुलीन चुम्बन करें ? ।
नट, मट, विट, ठग, गोठ ; पीकपाल है सबनको ॥६१॥
सार— वेश्याएँ महा अधम और पापियोंके द्वारा भोगी जाती हैं, अतः वे श्रेष्ठ-कुलोत्पन्न पुरुषोंके योग्य नहीं ।
91. Though the leaf-like lips of a prostitute are beautiful, yet what respectable person would kiss that which is the pot where cheats, rogues, rustics, thieves and knaves throw their saliva.
—*
( ४०६ )
धन्यास्त एव चपलायतलोचनानां
तारुण्यदर्पवनपीनपयोधराणाम् ॥
चामोदरोपरिलसत्त्रिवलीलतानां
हृदृवाऊर्ति विकृतिभेति मनो न येषाम् ॥६२॥
चञ्चल और बड़ी-बड़ी आँखों वाली, यौवनेके अभिमानसे पूर्ण, हृद और पुष्ट स्तनों वाली एवं क्षीण उदर-भाग पर त्रिवलीसे सुशोभित युवती स्त्रियोंकी सूत्र देखकर, जिन पुरुषोंके मनमें विकार उत्पन्न नहीं होता, वे पुरुष धन्य हैं ।
खुलासा—बड़ी-बड़ी चञ्चल आँखों वाली, नारङ्गियोंके समान गोल और कठोर स्तनों वाली तथा पेटके अघोभाग पर तीन रेखाओं वाली जवान स्त्री को देखकर किसी विरुद्ध ही माईके लालके मनमें अनुराग उत्पन्न नहीं होता । जिसके मनमें ऐसी सुन्दरीको देखकर उथल-पुथल नहीं मचती, जिसका मन ऐसी नारीको देखकर विचलित नहीं होता, वह पुरुष निश्चयः ही क्राबिल-तारीफ़ है । उसने संसारको जीत लिया है । उससे बढ़कर और शूरवीर नहीं । वह चेष्टा करनेसे सहजमें परमपद पा सकता है । जिसका मन ऐसी सुन्दरी पर नहीं चलता, उसका मन और किसी भी संसारी पदार्थ पर चल नहीं सकता । जिसे ऐसी तक्षणीसे विराग है, उसे संसारसे विराग है । जिसे ऐसी नारीसे चिरक्ति है, वह निश्चय ही महात्मा है । किसोने ठीक ही कहा है :—
( ४०७ )
सानुरागां क्षिप्रं दृष्ट्वा, मृत्युं वा समुपस्थितम् ।
आविकलमनाः स्वस्थो, मुक्त एव महाशयः ॥
अनुराग-पूर्णं स्त्री और मौतको सामने देखकर भी, जिसका मन व्याकुल नहीं होता, वह महाशय मुक्त-रूप है ।
दोहा ।
जीए लंक अरु पीन कुच, लखि तिथके हगतीर ।
जे अधीर नहिं करत मन, धन्य-धन्य ते धीर ॥६२॥
सार—परमा रूपवती नवीना नारी पर जिस का मन नहीं चलता, वह मनुष्य नहीं देवता है ।
92. Blessed are those whose minds are not disturbed on looking at the woman who has restless big eyes, is young and handsome, has full grown and high breasts and on whose thin belly are the elegant lines,
—*—
बाले लीलामुकुलितमभी सुन्दरा दृष्टिभाताः
किं चिप्पन्ते विरम विरम व्यर्थ एष श्रमस्ते ॥
सम्पत्यन्ये वृद्धमुपरतं बाल्यमास्या बनान्ते
जीणो मोहस्तृणमिव जगज्जालमालोकयामः ॥६३॥
( ४०६ )
धन्यास्त एव चपलायतलोचनानां ताख्ययदर्पवनपीनपयोधराणाम् ॥ त्रामोदरोपरिलसत्त्रिवलीलतानां
हृष्ट्वाऽकृतिं विठ्ठतिमेति मनो न येषाम् ॥६२॥
चञ्चल और बड़ी-बड़ी आँखों वाली, यौवनके अभिमानसे पूर्ण, हृद् और पुष्ट स्तनों वाली एवं क्षीण उदर-भाग पर त्रिवलीसे सुशोभित युवती स्त्रियोंकी सूत्र देखकर, जिन पुरुषोंके मनमें विकार उत्पन्न नहीं होता, वे पुरुष धन्य हैं ।
खुलासा—बड़ी-बड़ी चञ्चल आँखों वाली, नारङ्गियोंके समान गोल और कठोर स्तनों वाली तथा पेटके अधोभाग पर तीन रेखाओं वाली जवान स्त्री को देखकर किसी विरले ही माईके लालके मनमें अनुराग उत्पन्न नहीं होता । जिसके मनमें ऐसी सुन्दरीको देखकर उथल-पुथल नहीं मचती, जिसका मन ऐसी नारीको देखकर विचलित नहीं होता, वह पुरुष निश्चयः ही क्राबिल-तारीफ़ है । उसने संसारको जीत लिया है । उससे बढ़कर और शूरवीर नहीं । वह चेष्टा करनेसे सहजमें परमपद पा सकता है । जिसका मन ऐसी सुन्दरी पर नहीं चलता, उसका मन और किसी भी संसारी पदार्थ पर चल नहीं सकता । जिसे ऐसी तहसीसे विराग है, उसे संसारसे विराग है । जिसे ऐसी नारीसे विरक्ति है, वह निश्चय ही महात्मा है । किसीने ठीक ही कहा है :—
( ४०७ )
सानुरागां खिंये दृष्ट्वा, मृत्युं वा समुपस्थितम् ।
अविकलमनाः स्वस्थो, मुक्त एव महाशयः ॥
अनुराग-पूर्णं स्त्री और मौतको सामने देखकर भी, जिसका मन व्याकुल नहीं होता, वह महाशय मुक्त-रूप है ।
दोहा ।
जीए लंक अरु पीन कुच, लखि तियके हगतीर ।
जे अधीर नहिं करत मन, धन्य-धन्य ते धीर ॥६२॥
सार—परमा रूपवती नवीना नारी पर जिस का मन नहीं चलता, वह मनुष्य नहीं देवता है ।
92. Blessed are those whose minds are not disturbed on looking at the woman who has restless big eyes, is young and handsome, has full grown and high breasts and on whose thin belly are the elegant lines.
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बाले लीलामुकुलितमभी सुन्दरा दधिघाताः
किं चिप्पन्ते विरम विरम व्यर्थ एष भ्रमन्ते ॥
सम्पत्यन्ये वयमुपरतं बाल्यमास्या बनान्ते
जीणो मोहस्तृष्णामिव जगज्जालमालोकयामः ॥६३॥