शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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हे बाले ! लीलासे ज़रा-ज़रा खुले हुए नेत्रोंसे सुन्दर कटाक्ष हम पर क्यों फैकती है ? विश्राम ले ! विश्राम ले ! हमारे लिये तेरा यह श्रम व्यर्थ है । क्योंकि अब हम पहले जैसे नहीं रहे ; अब हमारा छल्लोरपन चला गया, अज्ञान दूर हो गया । हम बनमें रहते हैं और जगज्जालको तिनकेके समान समझते हैं ।
93. Maiden ! why are you casting your sweet and sportful glances at me ? Pray, stop there. Your efforts in this connection are useless. I am a changed man now. Youth has passed away. I long to live in the woods now. My illusion is gone. I consider the worldly bondage as that of straw.
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इयं बाला मां प्रत्यनवरतभिन्दीवरदल—
प्रभाचेरं चक्षुः क्षिपति किमभिप्रेतमनया ॥
गता मोहोऽस्माकं स्मरशबरबाणव्यतिकर—
ज्वलज्ज्वालाः शान्तास्तदपि न वराकी विरमति ॥६४॥
इस बालाका क्या मतलब है, जो यह अपने कमल-दलकी शोभाको तिरस्कार करनेवाले नेत्रोंको मेरी ओर चलाती है ? मेरा अज्ञान नाश हो गया और कामदेव रूपी भीलके बाणोंसे उत्पन्न हुई अग्नि भी शान्त हो गई, तथापि यह मूर्खा बाला विश्राम नहीं लेती ! ॥६४॥
94. What does this young woman mean by casting her eyes, which surpass the beauty of the lotuses, constantly on me ? I
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am no longer under the charm of illusions. The fire of passion kindled by the arrows of Cupid, have subsided in me and yet this foolish girl would not desist
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शुभ्रं सच्च सविश्रमा युवतयः श्वेतातपनोज्ज्वला
लक्ष्मीरित्यनुभूयते स्थिरभिवस्फूतिं शुभे कर्मणि ॥
विच्छिन्नने नितरामनङ्गकलहकीडावुटतन्तुक्
मुक्ताजालमिव प्रायाति क्षतिंति अशयदिशो दृश्यतामर् ॥१६५॥
जब तक मनुष्यके पूर्वजन्मके शुभ कर्मोंका प्रभाव रहता है, तब तक उज्ज्वल भवन, हाव-भाव-युक्त सुन्दरी नारियों और सफेद छत्र चँवर प्रभृतिसे शोभायमान लक्ष्मी—ये सब स्थिर भावसे भोगने में आते हैं ; किन्तु पूर्वजन्मके पुण्योंका क्षय होते ही, ये सब सुखेच्छय्यके सामान—कामदेवकी क्रीडोंके कलहमें टूटे हुए हारके मोतियोंके समान—शीघ्र ही जहाँ-तहाँ लुप्त हो जाते हैं ॥१६५॥
खुलासा—जब तक मनुष्यके पहले जन्ममें किये हुए शुभ कर्म अथवा पुण्य कर्मोंका ओर-छोर नहीं आता, तभी तक सुन्दर-सुन्दर आलीशान महल, अपने हाव-भावों—नात्रो-अदाओंसे पुरुषका मन हरने वाली सुन्दरी ललनाये तथा छत्र, चँवर, रथ, घोड़े, हाथी, पालकी, जोड़ी, बगूची प्रभृति सुख-पेशव्य्यके सामान बने रहते हैं और पुरुष उन्हें स्थिरताके साथ भोगता है ; किन्तु ज्योंही उसके पूर्वजन्मके पुण्य-कर्मोंका अन्त
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हो जाता है, ईश्वरीय खातेमें पुण्य-कर्म नहीं रहते ; त्योंही उपरोक्त महल-मकान, जमीन-जायदाद, बाग-बगीचे, मनमोहिनी चन्द्रवदनी स्त्रियाँ और लक्ष्मी एवं क्षमता प्रभृति इस तरह विलाप जाते हैं ; जिस तरह रत-केलिके समय—स्त्री-पुरुषोंमें बीजातानी और भगड़ा-भगड़ी होनेसे—हारके मोती दूर-दूर कर चारों ओर लुप्त हो जाते हैं ।
दोहा ।
ॐ कर्मनके उदयमें, यह तिय चित सब ठोर ।
अस्त भये तीनों नहीं, ज्यों सुक्ता बिन-डोर ॥६५॥
सा०—जबतक मनुष्यके पूर्वजन्मके पुण्यों का चय नहीं होता, तब तक सारे संसारी सुखैश्वर्य्य बने रहते हैं ; पुण्य चय होने पर, वे क्षणभर भी नहीं रहते ।
95. A white palace, a good and loving young woman and the wealth with the ( royal ) symbol of white umbrella, are enjoyed only so long as there is the growth of good virtuous acts, but when they ( virtuous acts ) diminish then all the enjoyments run away from the man to different directions like the pearls of a garland broken in the quarrel of amorous plays.
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सदा योगाभ्यासव्यसनवश्योरात्ममत्तसो
रविच्छिन्ना मैत्री स्फुरति यमिनस्तस्यकिमु तैः ॥
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प्रियायामालापैरभरमधुर्भिवनत्रविधुभिः
सनरिवासामोदैः सकुचकलशारलेषुरैतैः ॥६६॥
जो अपने मनको वशमें करके, आत्माको सदा योगाभ्यास-साधनमें लगाये रहना ही पसन्द करते हैं—उन्हें प्यारी-प्यारी स्त्रियोंकी बात-चीत, अधराभूत, श्वासोंकी सुगन्धि सहित मुखचन्द्र और कुचकलशोंको हृदयसे लगाकर काम-क्रीडासे क्या मतलब ! ॥६६॥
खुलासा—जिनको अपनी इन्द्रियाँ और मनको वशमें रखने तथा योग-साधनका अभ्यास करनेके लाभ नहीं मालूम, वह विषय-भोग भोगना ही अच्छा समझते हैं और सदा भोग भोगनेमें ही मस्त रहते हैं। ऐसे कामियोंको एकान्तमें स्त्रियोंसे बातचीत या गुप्तगु कराना, उनके ओठ चूसना, उनके श्वाससे निकली मृगमद-कस्तूरीको लजानेवाली सुगन्धि सूर्यना, चन्द्र-माके समान मुखको चूमना और सोनेके दो कलशों या नार-द्वियों अथवा कच्चे-कच्चे सेबोंके समान कुचोंको छातीसे लगा कर उनसे संगम करना ही अच्छा लगता है ; किन्तु जिन्हें मन और इन्द्रियोंको क्राबूमें करके सदा योगाभ्यासका व्यसन रखना ही अच्छा लगता है, उन्हें सुन्दरियों की मीठी-मीठी बातें सुनना, उनके निचले होठको चूसना, उनके मुख की सुगन्धिका आस्वादन करना, उनके चन्द्राननको देखना, उनके गुलाबी गाल चूमना और दो कलशोंके समान ऊँचे उठे हुए कठोर कुचोंको हृदयसे लगा कर, उनके साथ संगम करना अच्छा नहीं लगता। वे
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इन सबको वृथा समझते हैं। उन्हें इनमें जरा भी आनन्द नहीं मालूम होता।
सार—विषयासक्त कामियोंको स्त्रियाँ अच्छी लगती हैं ; पर इन्द्रिय-विजयी ज्ञानियों को निरन्तर योगाभ्यासमें लगे रहना ही अच्छा मालूम होता है।
9१. Of what use are the sweet conversation with a lovely woman, the nectar of her lips, her moon-like face with scented breath and the sweet enjoyment of sexual intercourse while pressing her pot-like breasts to the bosom, to those whose mind and soul are constant friends and take delight in the practice of concentration.
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त्रजितात्मसु सम्बद्धः समाधिकृतचापलः ।
मुजंगकुटिलः स्तब्धो श्रूविनेषः खलायते ॥१७॥
अजितेन्द्रिय मनुष्योसे सम्बन्ध रखनेवाला, चित्तकी एकाग्रता या समाधिमें अतीव चञ्चलता करनेवाला, सपके समान कुटिल और स्तब्ध स्त्रियोंका भूक्षेप या कटाक्ष खलके समान आचरण करता है ॥१७॥
खुलासा—स्त्रियोंका कटाक्ष (चतुरार्द्ध से भौंह चलाना) अजितेन्द्रियोंसे सम्बन्ध रखता है, चित्तकी एकाग्र रहने नहीं देता और समाधिको भङ्ग करता है, अतएव वह सपके समान कुटिल
भूतानिक
सुधासय चन्द्रमा अपने त्रय रोग की शान्ति के लिये, सीसी का रूप धारण कर, कसिनी के कोठों का अस्वत पी रहा है। मतलब यह है कि, खों के हाठों में ऐसा उत्तम अमृत है कि, उसे पाने के लिए, सुधा-कर—चन्द्रमा ने भी सीसी का रूप धारण किया है। (पृ० २५७)
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और दुष्टोंका सा काम करने वाला है ; पर ध्यान रहे कि, वही कटाक्ष जितेन्द्रियों से सम्बन्ध नहीं रखता। वह उनका कुछ भी नहीं कर सकता। न वह उनकी चित्तकी एकाग्रतामें खल-बली डाल सकता है और न उनकी समाधि ही भंग कर सकता है।
दोहा ।
तिय-कटाक्ष खल-सरिस है, करत समाधिहि भंग ।
श्राकृत जन संसर्ग रत, शठ-इव कुटिल भुजंग ॥६७॥
सार—खलोंके समान आचरण करनेवाले स्त्रियोंके कटाक्षका जोर केवल कामियों पर ही चलता है; जितेन्द्रियोंका वह कुछ भी नहीं कर सकता।
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मतेभकुम्भपरिणहिनि कुंकुमाई
कान्तापयोधरतटे रसखेदखिलः ।
वन्नोनिधाय भुजप जरमव्यवर्ती
धन्यः ज्पां ज्ञपयति ज्गलव्यनिद्रः ॥६८॥
जो पुरुष मैथुनके श्रमसे थककर, मतवाले हाथीके कुम्भोंके समान वित्तीर्थ और केशद्रसे भोंगे हुए स्त्रीके स्तनों पर अपनी छाती
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रखकर, उसके सुजा रूपी पञ्जरके बीचमें पड़ा हुआ, एक क्षण भी सोकर रात बिताता है, वह धन्य है ॥६॥
खुलासा—मैथुनके बाद पुरुष का बल क्षीण हो जाता है, मिनट दो मिनटके लिये उसमें उठनेको भी सामर्थ्य नहीं रहती ; तब वह खा को छातियों पर अपनी छाती रखे हुए, उसके दोनों हाथोंके बीचमें पड़ा हुआ, शान्ति की नींद-सी लेता या अपनी थकान दूर करता है । कवि महोदय कहते हैं, कि जो पुरुष क्षणभरके लिये भी, यह आनन्द उपभोग करता है वह भाग्यवान् है—उसने पूर्वजन्ममें पुण्य किये हैं ।
छप्पय ।
कुंकुम-कंदम-युक्त, मत्तगज कुम्भ बने मनु । कान्ता कुचतट माहिं सने, रस-खेद खिन्न जनु । तेहि भुज-पंजर मध्य, रहैं सुख सों लिपटाने । क्षण इक निद्रा लहै, क्षण बीतत नहि जानें । इमि निज वक्षस्थल ताहि सों, जोरि रहे जे शुभग नर । हैं तेई यहि संसारमें, धन्यवाद के योग्य वर ॥६॥
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सुधाभयोऽपि क्षयरोगशान्त्यै नासाध्रमुक्ताफलकच्छलेन । अरंगसञ्जीवनदृष्टिशक्तिमुखाभूतं ते प्रिवतीव चन्द्रः ॥६६॥
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हे प्यारी ! यह चंद्रमा अमृतमय, अतएव काम चेतन्य करने वाला होनेपर भी, अपने द्वाय रोगकी शान्तिके लिये, नाकके अगले हिस्सेमें लटकते हुए मोतीके मिससे, तेरे अधरामृतको पी रहा है ॥६६
कवि महोदय स्त्री को नाकके अग्रभागमें लटकते हुए मोती को पूर्ण चन्द्रमा मान कर कहते हैं, कि हे सुन्दरि ! यद्यपि चन्द्रमा स्वयं अमृतमय है और वह पुरुषोंके हृदयोंमें कामोद्दीपन करने की शक्ति और सामर्थ्य रखता है ; तथापि वह, अपने राज-रोग या क्षयके आराम करनेके लिये, बड़ेसे मोतीका रूप धरके, तेरी नाककी बुलाक या नथमें लटका हुआ, तेरे हाथोंके अमृत को पान कर रहा है । रसिक कवि कहते हैं :—
दोहा ।
प्रिये ! सुधाकर रोग निज, क्षयी-निवृत्ति-उपाय । चन्द पिवत मधु अधरको, नथ-मोती-मिस आय ॥
दोहा ।
मनसिज-नर्दक अमृतमय, क्षयी-हरण शशि जान । नाशा-मोती मिस किये, करे अधरामृत पान ॥६६॥
सार—स्त्रीका अधरामृत सुधाकरके अमृत से भी अच्छा है ।
99. O lady ! although the moon is full of nectar and the sight of moon gives rise to sexual desires yet he is unable to cure his
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own disease of phtisis and in order to cure himself of that disease, the moon has, as it were, transformed himself into a pearl pendant of your nose and is constantly tasting the nectar of your lips.
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दिश वनहरिणीभ्यो वंशकाण्डच्छवीनां
कवलमुपलकौटिच्छिन्नमूलं कुशानाम् ।
शुकयुवतिकपोलोपाण्डुतांबूलवल्ली-
यलमरुणनखायैः पाटितं वा वधूभ्यः ॥१००॥
हे पुरुषो ! या तो तुम वन-मृगियोंके लिये बाँसके दण्डेको समान छविवाली, पत्थरकी नोकसे कटी हुई मूलवाली, कुश नामक वासके प्राप्त दो अथवा सुन्दरी बहुओं के लिये लाल-लाल नाखुनोंसे तोड़े हुए सूई—तोतीके कपोलके समान, जरा-जरा पीले रंगके पान दो ॥१००॥
खुलासा—मनुष्यो ! दो में से एक काम करो :—(१) या तो घर-गृहस्थोंको मोह-ममता तोड़, बनमें जा, ईश्वराराधनमें मन लगाओ और पत्थरकी नोकसे कुश-वासकी जड़े काट-काट कर जड़ूली हिरनियोंको खुगाओ, अथवा घरमें रह कर सुन्दरी नवयुवतियोंको पके हुए पौले-पीले पानोंके बीड़े दो ।
दोहा ।
वन-मृगिनके देन को, हरे-हरे तृण लेहु ।
अथवा पीरे पान को, बीरा बूध्वन देहु ॥१००॥
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सार—दो में से एक काम करो :—(१) या तो बनमें जा ईश्वर-भजन करो, अथवा (२) घरमें रह नव-बधुओंको भोगो ।
100. O people, you are either to feed the wild deer with Kush grass cut by the sharp edges of stone resembling bamboo sticks or to offer betel of slight yellow color torn by red nails to beautiful wives.
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यदासीद्धानं स्मरतिभिरसंचारजनितां तदा सर्वं नारीभयमिदमशेषं जगदभूत् । इदानीमस्माकं पठुरविवेकाञ्जनदृशां समीभूता दृष्टिस्त्रिभुवनमपि ब्रह्म मनुते ॥१०१॥
जब तक मुझमें कामका अज्ञान-अन्धकार था, तब तक मुझे सारा संसार क्षीण्य दीखता था ; लेकिन अब मैंने आँखोंमें विवेक-अञ्जन लगाया है, इसलिये मेरी समदृष्टि हो गई है, मुझे त्रिलोकी ब्रह्मय दीखती है ॥१०१॥
खुलासा—जब तक मेरे ऊपर कामदेवका प्रभाव था, जब तक मेरे हृदयमें अज्ञानका अंधेरा था, जब तक मुझे सत्-असत् का ज्ञान नहीं था, जब तक मुझे स्त्रियों की असलियत मालूम नहीं थी, जब तक मुझे स्त्रियों की मुहब्बत सच्ची मालूम होती थी, तब तक मुझे सारे जगत्में स्त्रियाँ-ही-स्त्रियाँ दीखती थीं,
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मेरा मन हर समय उन्हींमें लगा रहता था और उनके साथ रमण करना ही मुझे अच्छा लगता था। मैं समझता था, कि इस जगत्में जन्म लेकर कामिनियोंको भोगना ही—पुरुष का परम कर्तव्य है। इसीसे उन दिनों स्त्रियोंके सिवा मुझे और किसी भी काममें आनन्द नहीं आता था ; लेकिन ज्योंही मैंने आँखोंमें विवेक-विचारका अज्ञान आँजा, मेरी आँखोंका अंधेरा दूर हो गया, मेरा अज्ञान नाश हो गया, मुझे सत्-असत् का ज्ञान हो गया, मुझे मालूम हो गया कि जगत् सारहीन है, संसार असार और मिथ्या तथा नाशमान् है, स्त्रियोंका रूप-यौवन और उनकी प्रीति अतित्य एवं सदा रहनेवाली नहीं है, इस जगत्में कोई किसीका नहीं है, सभी एक दूसरेको थोड़ा देकर अपना-अपना मतलब साध रहे हैं, सभी स्वार्थकी जड़ियोंमें बँधे हुए हैं, स्वार्थ बिना कोई किसीसे बात भी नहीं करता ; जिस में स्त्रियोंकी प्रीति तो बिल्कुल ही भूटी है। वे किसी काल और किसी दशामें भी विश्वास-योग्य नहीं। एकमात्र ब्रह्म—अपना आत्मा—ही सच्चा है। उसी की चिन्तामें कल्याण है। उस ब्रह्मके सुखके सामने त्रिलोकी के सभी सुख-भोग तुच्छ हैं। सब जगत्में, जगत्के प्राणिमात्रमें, एक पूर्ण ब्रह्म व्यापक है। इस ज्ञानके कारणसे, अब मुझे न कहीं स्त्री दीखती है, न पुरुष, न और ही कुछ ; सर्वत्र एक ब्रह्म ही दीखता है। अतः अब मैं उसी के ध्यानमें लौलीन रहता हूँ ; क्योंकि वेरायकी अग्निने संसारी भोग-विषयोंके खयालात जड़ले ही भस्म कर दिये हैं।
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101. So long as I was laboring under ignorance due to the darkness caused by Cupid, I could see nothing but woman in this whole world. Now, by applying the collyrium of better reasoning, my eye-sight has become normal and I find Brahma pervading the three worlds,
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वैराग्ये सञ्चरत्येको; नीतौ भूपति चापरः ।
शृंगारे रमते कश्चिद् भुवि भेदः परस्परम् ॥१०२॥
कोई वैराग्यको पसन्द करता है, कोई नीतिमें मस्त रहता है और कोई शृंगारमें मग्न रहता है । इस भूतल पर, मनुष्योंमें परस्पर इच्छाओंका भेदाभेद है ॥१०२॥
इस दुनियामें सबकी रुचि एक नहीं । किसीको एक चीज अच्छी लगती है, तो दूसरे को दूसरी और तीसरे को तीसरी । सबके मन और रुचि एक नहीं ; किसीको यह संसार बुरा लगता है ; अतः वह इसे मिथ्या और असार समझ, सबको त्याग, परम परमात्माको भजता है । किसी को नीतिशास्त्रों का अध्ययन ही अच्छा लगता है ; अतः वह रात-दिन नीति-ग्रन्थों का ही कीड़ा बना रहता है । किसीको न वैराग्य पसन्द है और न नीति ; उसे एकमात्र विषयोंका भोगना ही अच्छा लगता है ; अत वह इन्हींमें आनन्द समझता है, दिन-रात विषय-सुखों में ही मतवाला रहता है, स्त्रियोंको ही अपनी आराध्य देवी समझता है और उनकी तारीफोंसे भरे हुए शृङ्गार रसके ग्रन्थ देखनेमें ही लगा रहता है । सबकी रुचि भिन्न-भिन्न है, इसीसे भर्तृहरि महाराजने “वैराग्य शतक” “शृङ्गार शतक” और
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“नीतिशतक”—तीन शतक, तीनों प्रकारके लोगों' के लिये, लिखे हैं। जिसका दिल वैराग्यमें हो, वह “वैराग्य शतक” पढ़े; जिसे नीतिसे प्रेम हो, वह “नीति शतक” पढ़े और जिसे श्रद्धा से प्रेम हो, वह “श्रद्धा शतक” पढ़े।
दोहा।
काहूके वैराग्य-रुचि, काहूके रुचि नीति।
काहूके शृंगार रुचि, जुदी-जुदी परतीति ॥१०२॥
102. Some one feels pleasure in renunciation, some study morality and some take delight in love. So there is diversity of desires in this world.
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यद्यस्य नास्ति रुचिरं तस्मिंस्तस्याप्रहा मनोवेऽपि।
रमणीयेऽपि सुधांशौ न मनः कामः सोरजिन्याः ॥१०३॥
जिस चीज़में जिसकी रुचि नहीं होती, वह चाहे जैसी सुन्दर क्यों न हो, उसे वह अच्छी नहीं लगती। चन्द्रमा सुन्दर है, पर कमलिनी उसे नहीं चाहती ॥१०३॥
दोहा।
जो जाके मन भावतौ, ताको तासों काम।
कमल न चाहत चाँदनी, विकसत परसत घाम ॥१०३॥
103. A man has no inclination for the thing which he does not like, though it may be a very good one. The moon is beautiful yet she is not liked by the lotus.
समाप्त।
शुद्धिपत्रक
संसार में सबकी कवि पकसी नहीं होती । किसी को शुद्धि पसन्द है, कामितियों का स्वर्गाय आतन्त्र लुटना पसन्द है; किसी को सिद्धी विष से भी घुरी लगती है, उन्हें वैराग्य पसन्द है और किसी को नीति का अध्ययन पसन्द है । इसी से महाराज भक्तहरि ने तीन तरह के मनुष्यों के लिये शुद्धि, वैराग्य और नीति पर तीन शतक लिखे ।
(पृ० २०)
Popular Press—Calcutta.
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मनुष्य भावके पास रहने योग्य
तीन अनमोल ग्रन्थरत्न ।
१ स्वास्थयरक्षा ।
भारतमें ऐसे हिन्दी-पढ़े-लिखे मनुष्य बहुत कम होंगे, जोंने बाबू हरिदास वैद्य-लिखित “स्वास्थयरक्षा” की कम-से-तारीफ़ न सुनी हो । आज तक इस ग्रन्थके पाँच-पाँच और तीन हजारके आठ संस्करण हो चुके । राजा-महाराजा, सेठ-कार, जज-वकील, प्रोफेसर-माधुर और विद्यार्थी, स्त्री और ल, बालक, जवान और बूढ़े, अमीर-उमरा और गरीब किसान के यहाँ यह अमूल्य ग्रन्थ जा पहुँचा है । देशका इस ग्रन्थने ना उपकार किया है, कितने जीवोंकी प्राणरक्षा की है, जने नौजवान उठती उमरके पढ़ोंको इसने कुराहसे हटाकर ह पर लगाया है, इसको हम अपनी क़लमसे लिखना अच्छा समझते । आप जिस हिन्दी-पढ़े-लिखेसे पूछियेगा, वही गा कि, “स्वास्थयरक्षा” वास्तवमें “स्वास्थयरक्षा” ही है । उसका नाम है, वैसे ही उसमें गुण हैं । अगर आप सदा निरोग रहना चाहते हैं, अगर आप पूर्ण भोगते हुए सुखसे जिन्दगीका बेड़ा पार करना चाहते हैं,
४ हरिदास एण्ड कंपनी, २०१ हरिसन रोड, कलकत्ता।
मछली एक साथ खाना ) से उन्माद रोग हो जाता है। अत्यन्त शोका-चिन्ता, क्रोध और मोह लोभसे मनुष्य की स्मरण-शक्ति नाश होकर भयंकर मृगो रोग हो जाता है। अत्यन्त स्त्री-प्रसंग करनेसे, बहुत जागनेसे, बहुत ही व्रत-उपवास करनेसे, मल-मूत्रके वेग रोकनेसे और बहुत ज़ियादा मिहनत करनेसे वायु कुपित हो जाता है, जिससे भयंकर वात रोग उत्पन्न हो जाते हैं, वह इन मिथ्या आहार विहारोंसे कैसे बच सकता है ?
ज़ियादा नमकीन और गरम पदार्थ खानेसे, पत्तोंका साग खानेसे, नियम-विरुद्ध और अत्यधिक दही खानेसे, अजीर्णमें भोजन करनेसे, दिनमें सोनेसे ; उड़दकी दाल, माटा और बैंगन-वगैरह : ज़ियादा खानेसे “वातरक्त” रोग हो जाता है, खून दूषित होकर शरीर सड़ने लगता है। बहुत ज़ियादा मैथुन करनेसे, बहुत ही शीतल पानी पीनेसे, मिण्डो-नवारकी फलों वगैरह : सुखे साग खानेसे और बहुत ही हँसने-बोलने वगैरह : से भयंकर “शूल” रोग हो जाता है। जो इन बातोंको नहीं जानता, वह इन कामोंसे कैसे बच सकता है ? जो जानता है कि क्रूर में क्रूढ़नेसे मर जाऊँगा, वही क्रूर में न क्रूढ़ेगा। जो जानता है कि, साँपका फन पकड़नेसे साँप डस लेगा और मेरी मौत हो जायगी, वही साँप से दूर रहेगा ; अनजान तो उसे मामूली जानवर या खिलौना सम्भ्रम कर पकड़ेगा और मरेगा। इस लिये जो निरोग रहना चाहें—और परमायु भोगना चाहें, उन्हें रोग होनेके कारण अवश्य जानने चाहिये। कारण
हरिदास एण्ड कम्पनी, २०१ हरिसन रोड, कलकत्ता। ५
जाननेसे ही वे गलतियाँ नहीं करेंगे और रोगोंके पञ्चोंमें भी न फँसेंगे।
रोगोंसे बचने और आरोग्य रहनेके तरीके कैसे मालूम हों ?
रोगोंसे बचने, आरोग्य रहने, अकाल मृत्युसे छुटकारा पाने और पूरी आयु भोगनेके तरीके “आयुर्वेद” में लिखे हैं। आयुर्वेद पढ़नेसे ही हरेक आदमी उपरोक्त बातोंको जान सकता है ; पर हमारा आयुर्वेद संस्कृत भाषामें है। आज-कल सभी भारतवासों संस्कृत नहीं जानते, इसलिए वे आयुर्वेद पढ़ नहीं सकते। बम्बई प्रभृतिमें आयुर्वेदका हिन्दी अनुवाद भी छप गया है, पर वह ऐसा कठिन है, कि वह बिना किसी गुरुके पढ़ाये समझमें नहीं आता। अब जो लोग वैद्यके धन्धेके सिवा और धन्धे करते हैं, जिनकी उम्र अब विद्या-योग्य पढ़ने नहीं रही है, अथवा जिनके बिना कमाये गुहस्थीका पालन नहीं हो सकता, वे अब आयुर्वेद कैसे पढ़ सकते हैं और गुरुकी फीस कहाँसे दे सकते हैं ?
लाखों आदमी नौकरी-चाकरी या दूसरा धन्धा करते हुए भी आयुर्वेद पढ़ना चाहते हैं, पर हिन्दीमें—बोलचालकी सरल हिन्दीमें—आयुर्वेद न होनेसे, इच्छा रहने पर भी, मन मार कर रह जाते हैं। इसीलिए हमारी कम्पनीके मुख्य सञ्चालक वयोवृद्ध, पूर्ण अनुभवी वैद्य बाबू हरिदासजीने, लोकोपकारार्थ, पहले “स्वास्थ्यरक्षा” नामक ग्रन्थ लिखा था। वह भारतके हर हिन्दी