शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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इह हि मधुरगीतं नृत्यमेतद्वसोऽयं स्फुरति परिमलोऽसौ स्पशं एष स्तनानाम् ॥ इति हतपरमार्थैरिन्द्रियैर्भ्राम्यमाणो द्वाहितकरणद्वैतैः पञ्चभिर्वैचित्रतोऽसि ॥८७॥
यह कैसा मधुर गाना है, यह कैसा उत्तम नाच है, इस पदार्थका स्वाद कैसा अच्छा है, यह सुगन्ध कैसी मनोहर है, इन स्तनोत्तम छूनेसे कैसा मजा आता है ! हे मनुष्य ! तू इन पाँच विषयोंमें भ्रमता हुआ—परमार्थ-नाशिनी नरकादिकी साधनभूत पाँचों इन्द्रियोंसे—ठगा गया है ॥८७॥
खुलासा—कान निरन्तर गाना सुनना चाहते हैं, नाक अतर फुलेल और फूल प्रभृति चाहती है, चमड़ा सुन्दरी थोड़शी बालाके कठोर कुचोंको मर्दन करना चाहता है और रसना—जीभ ज्वट-मीठे पदार्थोंका स्वाद लेना चाहती है। कान, नेत्र, नाक, त्वचा और जीभ—इन पाँचों इन्द्रियोंका स्वभाव अपने-अपने विषय—शब्द, रूप, गन्ध, स्पर्श और रसको ओर जानेका है। बस ; ये पाँचों इन्द्रियाँ पुरुषको अपने-अपने विषयोंमें फँसा कर बेकाम कर देती हैं। इनमेंसे एक-एक विषय भी मनुष्यका सर्वनाश कर सकता है। अगर ये पाँचों हों, तब तो कहना ही क्या ? सर्वनाशको पञ्चाव मेलको तरह अत्यन्त शीघ्रतासे पास आया समझिये। सुनिये, एक-एक विषयसे ही प्राणीका सर्वनाश किस तरह हो जाता है :—