भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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सिवा साँपके काटेकी दवा भी जहाँ-तहाँ विकती हैं। जङ्गलोंमें जड़ी-बूटियाँ भी पाई जाती हैं। इसलिये साँपके काटे हुए आदमीके बचनेकी उम्मीद रहती है; पर स्त्रीके नेत्रों द्वारा काटे हुए आदमीका इलाज करनेवाले और उसकी दवा—दोनों ही नहीं मिलते; इसलिये स्त्रीके काटे हुएका बचना कठिन हो जाता है। अतः प्राणरक्षा चाहने वालोंको स्त्रीके नेत्रोंसे सदा दूर रहना चाहिये, जिससे कि वे काट न सकें।

छप्पय ।

महा भयंकर चपल वक्रगति, अरु फण्णुषारी ।

डसे कालिया नाग, नहीं कछु विपता भारी ।

कोरे चिकित्सा वैद्य, धर्म-हित देयँ जिवाई ।

ये नहिं कोउ वैद्य, चिकित्सा और उपाई ।

जेहि डसत मुजेंगिनि-लिय चपल, करि कटाक्ष सो नहिं जियत । यह जानि विदुषजन जगत्में, विषय रूप विष किमि पियत ? ॥८६॥

सार—स्त्री-सर्पके काटेका इलाज नहीं है।

86. It is better to be bitten by a snake long, restless, crooked, bright fanged and colored like blue lotus than to be pierced by the oblique glances of a woman. For there are many virtuous men in every country to cure those that are bitten by snakes but there is neither a physician nor any medicine to cure those who have been glanced for a short while through the eyes of a good-looking woman.

—ॐ—

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