भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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सार—अपनी कुशल चाहो, तो स्त्रियोंसे दूर रहो ।

85. O my traveller-like mind, do not venture to enjoy the body of woman which is like a dense forest, very difficult to pass through, on account of big breasts which are like mountains and where dwells the thief Kamdev (Cupid)

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व्यादीर्घेण चलेन वक्रगतिना तेजस्विना भोगिना

नीलाञ्जयुतिनाऽहिना वरमहो दृष्टो न तच्चक्षुषा ॥

दृष्टे सन्ति चिकित्सका दिशिदिशि पायेण धर्मार्थिनो

मुग्धाच्चीत्तण्वीचिन्तस्य न हि मे वैयोन चान्प्यौषधम् ॥८६॥

बड़े लम्बे, तेज चलनेवाले, टेढ़ी चालवाले, भयंकर फण-धारी काले से काटा जाना भला ; पर अत्यन्त विशाल, चञ्चल, टेढ़ी चाल वाले, तेजस्वी और नीलकमलकी कान्तिवाले कामनीके नेत्रोंसे डसा जाना भला नहीं ; क्योंकि सपके काटे हुए को बचाने वाले धर्मार्थां मनुष्य सर्वत्र मिलते हैं ; पर सुनयनाकी इष्टिसे काटे हुएकी न कोई दवा है न वैय ॥८६॥

खुलासा—साँपके काटेको आराम करने वाले प्रायः सर्वत्र मिलते हैं । वे लोग बिना कुछ लिये साँपके काटे आदमीका इलाज करते और सुनते ही नङ्गे पैरों दौड़े चले आते हैं । उनके