शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २६७ )
हे मन-रूपी पथिक ! कुच-रूपी पर्वतोंमें होकर, दुर्गम कामिनी के शरीर रूपी बनमें न जाना , क्योंकि वहाँ कामदेव-रूपी तस्कर रहता है ॥८५॥
खुलासा—बन और पर्वतोंमें अक्सर तस्कर या चोर बैठे रहते हैं, इसलिये बुद्धिमान लोग वैसे बन-पर्वतोंमें नहीं जाते ; क्योंकि वहाँ जानेसे धन और प्राणोंके नाशका ख़तरा रहता है । स्त्री-रूपी बनमें भी कुच-रूपी पहाड़ हैं और उनके बीचमें कामदेव-तस्कर छिपा रहता है । जो मृदु भ्रूंकर भी स्त्री-रूपी बनमें जाता है, उसके धन और प्राण ख़तरेंमें पड़ जाते हैं । सारांश यह कि, स्त्रीसे प्रेम करनेवालेकी धन-दौलत, इज्जत-आबरू और प्राण सभी ख़तरेंमें रहते हैं । इसलिये धीमानोंको स्त्रीसे सदा दूर रहना चाहिये ।
कुण्डलिया ।
एरे मन मेरे पथिक ! तू न जाहु इहि ओर । तरुणी तन-श्वन सघनमें, कुच-पर्वत वर जोर । कुच-पर्वत वर जोर, चोर एक तहीं बसत हैं । करमें लिये कमान, वाण पाँचों बरसत हैं । लूट लेत सब स्राज, पकर कर राखत चंरे । मृदु नैन झरू कान, मुलान्यों तू कित एरे ? ॥८५॥