शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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यह नवयौवना बाला मेरे फँसाने या मारनेके लिये व्याघ्र—शिकारी सी हो रही है। इसकी भौँहें धनुषके समान हैं; यानी यह बाला अपने भौँह रूपी धनुषसे मेरे मनको व्याकुल करती है—अपनी तिरछी नज़रोंसे मुझे घायल करे देती है।
बात एक ही है, स्त्रीके सामने जाने, उसे घूरकर देखने और उसकी नज़र-से-नज़र मिलानेसे ही पुरुष मारा जाता है। जो स्त्रीसे दूर रहें अथवा उसे देखकर नीची नज़र कर लें, उससे आँखें न मिलावे, वे बेशक उसके जाल या बाणोंसे बच सकते हैं। जिन्हें अपने कल्याणको इच्छा हो, वे स्त्रियोंको छायाके भी पास न जायँ। उनसे दूर रहनेसे पुरुषको इस लोकमें सुख-सम्पत्ति और मरने पर सद्गति मिलेगी।
दोहा ।
काम-मील भव-सिन्धुमें, बंसी-नारी डार ।
मीन-नरनको गहि पचत, प्रेम-श्रियोंको धार ॥८४॥
84. The world is like the ocean and Kamdev the fisherman. He has spread the net in the form of woman and catches and burns, in the fire of love, those who are greedy enough to taste the bait in the form of her lips.
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कामिनीकायकान्तारे कुचपर्वतदुर्गमे ।
मा सञ्चर मनः पान्यं तत्वास्ते स्मरतस्करः ॥८४॥