शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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खुलासा—क्या अच्छा रूपक है? इसमें सागर “संसार-सागर” है। मछली पकड़नेवाला मछुआ या धीमर स्वयं “कामदेव” है। मछली पकड़नेका जाल “खी” है। मछलियाँ “पुरुष” हैं। उनका चारा, जिसके लोभसे पुरुष-रूपो मछलियाँ जालमें फँसती हैं, “अधरामिप” है। मछलियोंको, भाग जानेके डरसे, शीघ्र ही पका डालने को अग्नि “अनुराग” है।
अजब मजेदार मामला है। कामदेव-धीमर बड़ा ही चालाक है। वह पुरुष-रूपी मछलियोंके फँसानेके लिये जाल और चारा प्रभृति सभी सामान लेस रखता है। एकबार फँस कर मछलियाँ निकल न भागे, इसलिये वह आग भी तैयार रखता है। इधर मछली जालमें फँसी और उधर आग पर रखी। ऐसे चालाक धीमरके जालमें फँसकर कौन बच सकता है? तात्पर्य यह कि, एक बार इश्क या प्रेममें फँसने पर, पुरुष निकल नहीं सकता। जब तक जालमें न फँसे, तभी तक ख़ैर है। अतः जो पुरुष कामदेव के जालमें फँसकर प्राण न गँवाना चाहें, वे कामदेवके “स्त्री-जालसे” दूर रहें।
महाकवि कालिदासने स्वयं स्त्रियोंको व्याध बनाकर और हां तरह रूपक बाँधा है। उनको उक्ति का भी मज़ा चख लीजिये :—
इयं व्याधायते* वाला भूरस्याः कामुकायते । कटाक्षश्च शरायन्ते मनो मे हरिष्यायते ॥