भारतकोश
संग्रह पर लौटें

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

Devanagarihipublished544 पृष्ठ

( ३६६ )

यह नवयौवना बाला मेरे फँसाने या मारनेके लिये व्याघ्र—शिकारी सी हो रही है। इसकी भौँहें धनुषके समान हैं; यानी यह बाला अपने भौँह रूपी धनुषसे मेरे मनको व्याकुल करती है—अपनी तिरछी नज़रोंसे मुझे घायल करे देती है।

बात एक ही है, स्त्रीके सामने जाने, उसे घूरकर देखने और उसकी नज़र-से-नज़र मिलानेसे ही पुरुष मारा जाता है। जो स्त्रीसे दूर रहें अथवा उसे देखकर नीची नज़र कर लें, उससे आँखें न मिलावे, वे बेशक उसके जाल या बाणोंसे बच सकते हैं। जिन्हें अपने कल्याणको इच्छा हो, वे स्त्रियोंको छायाके भी पास न जायँ। उनसे दूर रहनेसे पुरुषको इस लोकमें सुख-सम्पत्ति और मरने पर सद्गति मिलेगी।

दोहा ।

काम-मील भव-सिन्धुमें, बंसी-नारी डार ।

मीन-नरनको गहि पचत, प्रेम-श्रियोंको धार ॥८४॥

84. The world is like the ocean and Kamdev the fisherman. He has spread the net in the form of woman and catches and burns, in the fire of love, those who are greedy enough to taste the bait in the form of her lips.

—*—

कामिनीकायकान्तारे कुचपर्वतदुर्गमे ।

मा सञ्चर मनः पान्यं तत्वास्ते स्मरतस्करः ॥८४॥

( २६७ )

हे मन-रूपी पथिक ! कुच-रूपी पर्वतोंमें होकर, दुर्गम कामिनी के शरीर रूपी बनमें न जाना , क्योंकि वहाँ कामदेव-रूपी तस्कर रहता है ॥८५॥

खुलासा—बन और पर्वतोंमें अक्सर तस्कर या चोर बैठे रहते हैं, इसलिये बुद्धिमान लोग वैसे बन-पर्वतोंमें नहीं जाते ; क्योंकि वहाँ जानेसे धन और प्राणोंके नाशका ख़तरा रहता है । स्त्री-रूपी बनमें भी कुच-रूपी पहाड़ हैं और उनके बीचमें कामदेव-तस्कर छिपा रहता है । जो मृदु भ्रूंकर भी स्त्री-रूपी बनमें जाता है, उसके धन और प्राण ख़तरेंमें पड़ जाते हैं । सारांश यह कि, स्त्रीसे प्रेम करनेवालेकी धन-दौलत, इज्जत-आबरू और प्राण सभी ख़तरेंमें रहते हैं । इसलिये धीमानोंको स्त्रीसे सदा दूर रहना चाहिये ।

कुण्डलिया ।

एरे मन मेरे पथिक ! तू न जाहु इहि ओर । तरुणी तन-श्वन सघनमें, कुच-पर्वत वर जोर । कुच-पर्वत वर जोर, चोर एक तहीं बसत हैं । करमें लिये कमान, वाण पाँचों बरसत हैं । लूट लेत सब स्राज, पकर कर राखत चंरे । मृदु नैन झरू कान, मुलान्यों तू कित एरे ? ॥८५॥

( ३६८ )

सार—अपनी कुशल चाहो, तो स्त्रियोंसे दूर रहो ।

85. O my traveller-like mind, do not venture to enjoy the body of woman which is like a dense forest, very difficult to pass through, on account of big breasts which are like mountains and where dwells the thief Kamdev (Cupid)

—*

व्यादीर्घेण चलेन वक्रगतिना तेजस्विना भोगिना

नीलाञ्जयुतिनाऽहिना वरमहो दृष्टो न तच्चक्षुषा ॥

दृष्टे सन्ति चिकित्सका दिशिदिशि पायेण धर्मार्थिनो

मुग्धाच्चीत्तण्वीचिन्तस्य न हि मे वैयोन चान्प्यौषधम् ॥८६॥

बड़े लम्बे, तेज चलनेवाले, टेढ़ी चालवाले, भयंकर फण-धारी काले से काटा जाना भला ; पर अत्यन्त विशाल, चञ्चल, टेढ़ी चाल वाले, तेजस्वी और नीलकमलकी कान्तिवाले कामनीके नेत्रोंसे डसा जाना भला नहीं ; क्योंकि सपके काटे हुए को बचाने वाले धर्मार्थां मनुष्य सर्वत्र मिलते हैं ; पर सुनयनाकी इष्टिसे काटे हुएकी न कोई दवा है न वैय ॥८६॥

खुलासा—साँपके काटेको आराम करने वाले प्रायः सर्वत्र मिलते हैं । वे लोग बिना कुछ लिये साँपके काटे आदमीका इलाज करते और सुनते ही नङ्गे पैरों दौड़े चले आते हैं । उनके

( ३६६ )

सिवा साँपके काटेकी दवा भी जहाँ-तहाँ विकती हैं। जङ्गलोंमें जड़ी-बूटियाँ भी पाई जाती हैं। इसलिये साँपके काटे हुए आदमीके बचनेकी उम्मीद रहती है; पर स्त्रीके नेत्रों द्वारा काटे हुए आदमीका इलाज करनेवाले और उसकी दवा—दोनों ही नहीं मिलते; इसलिये स्त्रीके काटे हुएका बचना कठिन हो जाता है। अतः प्राणरक्षा चाहने वालोंको स्त्रीके नेत्रोंसे सदा दूर रहना चाहिये, जिससे कि वे काट न सकें।

छप्पय ।

महा भयंकर चपल वक्रगति, अरु फण्णुषारी ।

डसे कालिया नाग, नहीं कछु विपता भारी ।

कोरे चिकित्सा वैद्य, धर्म-हित देयँ जिवाई ।

ये नहिं कोउ वैद्य, चिकित्सा और उपाई ।

जेहि डसत मुजेंगिनि-लिय चपल, करि कटाक्ष सो नहिं जियत । यह जानि विदुषजन जगत्में, विषय रूप विष किमि पियत ? ॥८६॥

सार—स्त्री-सर्पके काटेका इलाज नहीं है।

86. It is better to be bitten by a snake long, restless, crooked, bright fanged and colored like blue lotus than to be pierced by the oblique glances of a woman. For there are many virtuous men in every country to cure those that are bitten by snakes but there is neither a physician nor any medicine to cure those who have been glanced for a short while through the eyes of a good-looking woman.

—ॐ—

२४

( ३७० )

इह हि मधुरगीतं नृत्यमेतद्वसोऽयं स्फुरति परिमलोऽसौ स्पशं एष स्तनानाम् ॥ इति हतपरमार्थैरिन्द्रियैर्भ्राम्यमाणो द्वाहितकरणद्वैतैः पञ्चभिर्वैचित्रतोऽसि ॥८७॥

यह कैसा मधुर गाना है, यह कैसा उत्तम नाच है, इस पदार्थका स्वाद कैसा अच्छा है, यह सुगन्ध कैसी मनोहर है, इन स्तनोत्तम छूनेसे कैसा मजा आता है ! हे मनुष्य ! तू इन पाँच विषयोंमें भ्रमता हुआ—परमार्थ-नाशिनी नरकादिकी साधनभूत पाँचों इन्द्रियोंसे—ठगा गया है ॥८७॥

खुलासा—कान निरन्तर गाना सुनना चाहते हैं, नाक अतर फुलेल और फूल प्रभृति चाहती है, चमड़ा सुन्दरी थोड़शी बालाके कठोर कुचोंको मर्दन करना चाहता है और रसना—जीभ ज्वट-मीठे पदार्थोंका स्वाद लेना चाहती है। कान, नेत्र, नाक, त्वचा और जीभ—इन पाँचों इन्द्रियोंका स्वभाव अपने-अपने विषय—शब्द, रूप, गन्ध, स्पर्श और रसको ओर जानेका है। बस ; ये पाँचों इन्द्रियाँ पुरुषको अपने-अपने विषयोंमें फँसा कर बेकाम कर देती हैं। इनमेंसे एक-एक विषय भी मनुष्यका सर्वनाश कर सकता है। अगर ये पाँचों हों, तब तो कहना ही क्या ? सर्वनाशको पञ्चाव मेलको तरह अत्यन्त शीघ्रतासे पास आया समझिये। सुनिये, एक-एक विषयसे ही प्राणीका सर्वनाश किस तरह हो जाता है :—

( ३७१ )

घास और दूब खानेवाला हिरन, बहुत दूर होने पर भी, शिकारीके गीत पर मोहित होकर, प्राण गँवा देता है; यानी एक "कान" नामक इन्द्रियके वश होकर मारा जाता है। अगर हिरनकी श्रवण-इन्द्रिय—कानको शब्द या गाना सुनने का चसका न हो; तो वह क्यों शिकारीके जालमें फँसकर प्राण-नाश करावे ?

पर्वतके शिखरके समान आकारवाला और खेलमें ही वृक्षों को उखाड़ फेंकनेवाला महाबलवान हाथी, केवल हन्सीकी भोग-लालसासे, शिकारियोंके घेरेंमें आकर बँध जाता है ; यानी एक लिङ्ग-इन्द्रियके वशीभूत होनेसे, अपनी आज़ादी खोकर, कैद हो जाता है।

पतङ्ग दीपक की रमणीय शिक्षाके रूप पर मुग्ध होकर, उसे आलिङ्गन करनेको, उसके ऊपर बारम्बार गिरता और अन्त में जलबल कर खाक हो जाता है। पतङ्ग केवल एक नेत्र-इन्द्रियके वशीभूत होकर अपने प्राण गँवाता है।

अगाध जलमें डूबी हुई मछली, चारोंके लोमसे, कँटियोंमें सुँह देकर अपने प्राण गँवाती है ; यानी एक जिह्वा—जीम-इन्द्रियके वशीभूत होकर, मछली अपने प्राण गँवाती है।

भौरा कमलको कतर सकता है और अपने पङ्कसे उड़ भी सकता है ; किन्तु वह सुन्दर मनभावन गन्धके ठोमसे, कमलमें बन्द होकर, अपने प्राण गँवा बैठता है ; यानी अपनी नाक—इन्द्रियके वश होकर, भौरा अपने प्राण गँवा देता है।

( ३७२ )

कहा ह :—

कुर्गमांतंगपतंगभुंगमीनाः इताः पञ्चभिरैव पञ्च ।

एकः प्रमादी स कथं न हन्यते यः सेवते पञ्चभिरैव पञ्च ॥

जबकि हिरन, हाथी, पतङ्ग, भौरा और मछली—ये पाँचों एक-एक विषयके प्राणी होते हुए, विषयोंमें फँस कर, मौतके निवाले होते हैं ; तब मनुष्य जोकि रूप, रस, गन्ध, शब्द और स्पर्श—पाँचों विषयोंके फेरमें फँसा रहता है, कैसे बेमौत न मरता होगा ? संसारमें बन्धन भी बहुत होते हैं, पर प्रेम-रूपा रस्सीका बन्धन सबसे बुरा है । कड़ी-से-कड़ी बाँसकी गाँठको काट सकनेवाला भौरा, कमलके फूलमें बन्द होकर, उसकी नर्म पाशको नहीं काट सकता और उसके भीतर बैठा हुआ अपने मनमें यह विचारता है—

रात्रिर्गमिष्यति भविष्यति सुप्रभातं

भास्वानुदेष्यति हसिष्यतिपद्मजालं ।

इत्थं विचिन्तयति कोशगते द्विरेफे

हाहन्त-हन्त नलिनीगज उज्जहार ॥

जब रातका अन्त होगा और सवेरा होगा ; तब सूर्य भगवान् उदय होंगे और कमल खिलेगा, उस समय मैं इस कमलके बन्धनसे निकल कर इधर-उधर घूमूँगा और दूसरे फूलोंका रस पान करूँगा—भौरोंके ऐसा विचार करते-करते ही, अचानक एक जड़ली हाथी तालाबके किनारे आता है और तालाबमें घुस

( ३७३ )

भौर-समेत कमलके वृक्षको खा जाता है। बेचारे भौरके विचार उसके मनमें ही रह जाते हैं।

अब पाठक अच्छी तरह समझ गये होंगे कि, एक-एक इन्द्रियके वश होकर ही प्राणी किस तरह मारे जाते हैं; पर जो प्राणी अपनी पाँचों इन्द्रियोंके वशीभूत रहते होंगे, उनकी क्या गति होती होगी। जो मनुष्य मधुर गान सुनते होंगे, सुन्दरी वाराङ्गनाओंका नाच देखते होंगे, तरह-तरहके खादिर भोजन करते होंगे, उत्समोत्सम इत्र, फुलेल, सेण्ट, ओस्ट्रेकलन प्रवृत्ति सूर्यवते होंगे और कठोर कुर्बोंवाली सुन्दरी तरुणी छियों को छातीसे लगाते होंगे—वे क्या सर्वनाशसे बच सकेंगे?

यह जीवात्मा रूपी भौरा भी, कमलके भौरकी तरह, संसार रूपी तालाब और शरीर रूपी कमलमें बैठ डूबा, पञ्चेन्द्रियोंका सुख लूटता हुआ, उत्समोत्सम प्रत्यय पद और महात्माओंके उपदेश सुनकर विचार किया करता है कि, कलसे मैं ईश्वर-भजन करूँगा, परसों या अमुक दिनसे मैं अमुक दान-पुण्य करूँगा। जीवात्मा यह विचार करता ही रहता है और काल-रूपी हाथों अचानक आकर इसे अपने मुखमें धर कर खा जाता है। इस तरह इसके सारे विचार धरे-के-धरे ही रह जाते हैं। इसलिये मनुष्यको अपनी इन्द्रियाँ अपने वशमें करनी चाहिये।

“आँख-नाक प्रभृति पाँचों ज्ञानेन्द्रियों और हाथ, पाँव, गुदा, लिङ्ग और मुख—पाँचों कर्मन्द्रियोंको चलानेवाला एक“मन” है। ‘मन’ जिधर चाहता है, ये पाँचों इन्द्रियाँ उधर ही जाती हैं,

( ३७४ )

इसलिये 'मन' दसों इन्द्रियोंका सञ्चालन करता है ! अब जो प्राणी दुःख और क्लेशोंसे बचना चाहे', जो जगत्को अपने वशमें करना चाहें, जो परमात्मा से मिलना चाहें अथवा जो परमपूज्य मोक्ष चाहें, उनका पहला काम—अपने 'मन और इन्द्रियों'को पूर्णरूपसे अपने वशमें करना है । पर मन बड़ा चञ्चल और तेज चलने वाला है । इसकी चाल हवा और बिजलीकी चमक से भी तेज है । इसको वश करना सहज नहीं, क्योंकि इसका स्वप्नान्ही इन्द्रियोंको विषयोंकी ओर झुकाना है और विषयोंमें फँसे हुए मनुष्यका कहीं ठिकाना नहीं । मनको वश करना कठिन होने पर भी, अभ्याससे वह सहजमें वश हो जाता है । अंगरेज़ीमें एक कहावत है—“Where is a will, there is a way” जहाँ इच्छा होता है, वहाँ राह भी हो जाती है । यदि मनुष्य इस बात पर कटिबद्ध हो जाय, मनको वशमें करनेके लिए कमर कस ले, तो मन अवश्य वशमें हो जायगा । मन वशमें हुआ और मनुष्य देवता हुआ । फिर उसे दुःख क्या ?

मनके सम्बन्धमें गिरिधर कविकी कुण्डलियाँ पाठकोंको सुनाते हैं :—

कुण्डलिया ।

हे मन ! शब्द स्पर्श जो, रूप पुत्रः रस गन्ध । सर्व दुःखोंका बीज यह, तू नहीं सुमझत श्रम्य ॥

( ३७५ )

तू नहीं समझत अन्य, सदा इन्हीं को चाहे । अपनी हथी आप, आपने तन को दाहे ॥ कह गिरधर कविराय, जो प्रत्यक आनन्द धन रे । तिसहि मांहि रह लीन, सुखी तब होवे मन रे ॥

औरमी :—

कुरडलिया ।

रे मन ! भौतिक वर्ग में, तू महन्त परधान । तेरे पाछे हैं सबै, देह बुद्धि इन्द्रिय आन । देह बुद्धि इन्द्रिय प्राण, इन्होंमें तू है नायक । किया तेरे आधीन, मानसी-बाचिक-कायिक । कह गिरधर कविराय, होवे तबहीं धनधन रे । जब निर्वाकार हो रहे, सर्वथा इक रस मन रे ॥

व्यप्यय ।

काम निरन्तर गान-तान, सुनिबोही चाहत । लोचन चाहत रूप, रैन-दिन रहत सराहत । नासा अतर-सुगन्ध, चहत फूलन की माला । त्वचा चहत सुख-सेज, संग कोमल-तन बाला । रसनाहू चाहत रहत, नित खाटे मोटे चरपरे । इन पंचन या प्रपञ्च सौं, भूपनको भिन्नू करे ॥८७॥

( ३७६ )

सार—अगर मनुष्य नित्य सुख चाहे, तो इन्द्रियोंको विषयोंको और न जाने दे, उन्हें अपने वशमें करे ।

87, O men, you have been made to run about cheated by these five senses, which obstruct the way for the other world and are skilful in doing evils. ( Ear ) :—How sweet is this song ; ( Eye ) how beautiful is this dance ; ( Taste ) how tasteful is this ; ( Smell ) how sweet is this scent, and ( Touch ) how very pleasing are these breasts to touch.

—*—

न गम्यो मन्त्राणां न च भवति भैषज्यविषयो न चापि पञ्चसं व्रजति विविधैः शान्तिकशतैः ॥

अमावेशादङ्गो किमपि विदुःशङ्गमसम्

स्मरोऽपस्मारोऽयं भ्रमयति दृशं वृणीयति च ॥८८॥

जब कामदेव रूपी अपस्मार—मुगी—रोगका, भ्रमके आवेश से, दौरा होता है, तब शरीरमें असह्य वेदना होती है, शरीर दूखता है, मन घूमता है और आँखें चक्कर खाती हैं। यह रोग मन्त्र, औषधि, नाना प्रकारके शान्ति-कर्म और पूजा-पाठ किसीसे भी नाश नहीं होता।

खुलासा—अपस्मार या मुगी रोग शोक-चिन्ता प्रभृतिसे होता है। उसके दौरेके समय मनुष्यका ज्ञान नष्ट हो जाता है,

( २७७ )

नेत्र टेढ़े तिरछे घूमने लगते हैं, हाथ-पाँवोंका सत्त्व निकल जाता है और स्मरणशक्ति नष्ट हो जाती है। कामदेव रूपी अपस्मार रोगमें भी प्रायः ऐसे ही लक्षण होते हैं। कामार्त्त रोगीका मन और नेत्र घूमने लगते हैं। होश-हवास हवा हो जाते हैं। मुँहसे कहना कुछ वाहता है और निकलता कुछ है। साधारण अपस्मार और कामदेवके अपस्मारमें एक बड़ा भेद है। वह यह कि, अपस्मार तो घृत, ब्राह्मी घृत, कृष्माण्ड घृत, खलप पञ्चगव्य घृत और महापञ्चगव्य घृत तथा त्रिफला तेल एवं भूतोंके योगमें जो भाङ्ग-फूँक मन्त्र-जन्त्र किये जाते हैं, उन से आराम हो जाता है; पर कामदेव रूपी अपस्मार की कोई भी औषधि, आज तक, किसीने नहीं निकाली; इसलिये भगवान् न करे जो किसीको यह रोग हो। जिन्हें इस भयङ्कर प्राणनाशक और परमार्थ-नाशक रोगसे बचना हो, वे कामिनियों के चञ्चल नेत्रोंसे दूर रहें, क्योंकि स्त्रियों की तेज नज़रोंसे बचने वालों को यह रोग नहीं होता। यदि कोई उनकी चपेट में आ जाय, उनका विष उस पर चढ़ जाय, तो विषस्य विषमोषधम् अर्थात् विष की औषधि विष है। उनका विष वे ही उतार सकते हैं। महाकवि कालिदासने अपने “श्रृङ्गार तिलक” में कहा भी है:—

दृष्टि देहि पुनर्वाले ! कमलामृतलोचने ! श्रूयते हि पुरालोके विषस्य विषमोषधम् ॥

( ३७८ )

हे बाळे ! हे कमलनयनी ! मेरी ओर फिर अपनी दृष्टि फँक, क्योंकि सुनते हैं कि विषकी दवा विष है। मुझ पर तेरा जहर चढ़ा है, अगर तू ही उतारे तो वह उतर सकता है।

किसीने किसी इश्कके मरीजके इलाजके लिये किसी हकीमको बुलाया। हकीम साहब नज़्ज टोडलने लगे, तो किसी बुद्धिमानने कहा :—

जूँ पञ्जशाखा तू न जला उँगलियाँ तबीब ।

रख-रखके नञ्ज आशिके तफ़्ता जिगर पै हाथ ॥जौका॥

हकीम साहब ! क्यों अपने हाथको पञ्ज शाखेकी तरह दिल-जले आशिकूकी नञ्ज पर रख कर बुथा जलाते हो ? इश्क का मरीज आप की दवासे आराम न होगा।

दोहा ।

मन्त दवा अरु आपसों, वेदन मिटै न वैद ।

कामबान सों भ्रमत मन, कैसे मिटहै कैद ? ॥८८॥

सोर—साधारण अपस्मार या मृगीरोग का इलाज है, पर कामके अपस्मारका इलाज नहीं है।

88. This Kamdev ( Cupid ) like Epilepsy gives much pain due to senselessness, overcasts the mind and rolls the eyes. Neither any charm nor any medicine has any effect on those attacked by it, nor is it cured by various pacifying worships,

—*—

( ३७१ )

जात्यन्थाय च दुर्भुलाय च जराजीर्णार्षिलांगाय च ग्रामीणाय च दुष्कुलाय च गलकुष्ठाभिन्नाय च ॥

यच्छन्तीषु मनोहरं निजवपुर्लक्ष्मीलवश्रद्धया

पयस्यन्तीषु विवेककल्पलतिकाशन्तीषु रज्येत कः ॥८६॥

कुरुप, बुढ़ापे से शिथिल, गँवार, नीच और गलित कुष्टीको, थोड़ेसे धनकी आशासे, जो अपना सुन्दर शरीर सौंप देती है और जो विवेक रूपी कल्पलता के लिये छुरीके समान हैं, उस वेश्यासे कौन विद्वान् रमण करना चाहैगा ?

वेश्या एकमात्र धनकी दामी है ।

वेश्या पैसों को प्यार करती है, पुरुषको नहीं । उसे जो पैसा देता, वह उसीकी हो जाती है ; चाहे वह भट्टी, चमार या चाण्डाल हो क्यों न हो । जातिहीन, कुलहीन, जन्मान्ध, कुरुप, बूढ़ा, दुर्बल, काना और गलित कुष्टी भी अगर धनी हो और उसे धन है, तो वेश्या—बिना किसी तरह के विचार और प्रशोपेशके—उसके नीचे अपना सोने सा शरीर बिछा देती है । वेश्या को जीवन और बूढ़े, सूबसूरत और बदसूरत, काने और अन्धे, लूढ़े और लँगड़े, निर्बल और सबल, चोर और ठग, ज्वारी और शराबी, सदाचारी और कदाचारी, हिन्दू और मुसलमान सब

( ३८० )

समान हैं। उस को न किसीसे मुहब्बत है और न किसीसे परहेज। वह धन देने वाले को चाहती है और न देने वाले से परहेज करती है।

किसी कविने कहा है और बिल्कुल ठीक कहा है:—

वितेन वेत्ति वेश्या स्मरसदृशं कुष्ठिनं जराजीर्णम् ।

वित्तं विनापि वेत्ति स्मरसदृशं कुष्ठिनं जराजीर्णम् ॥

पेस्ट्रेटाले कोढ़ी और जराजीर्ण पुरुष को वेश्या कामदेवके समान सुन्दर समझनी है ; और बिना पैसे वाले धनहीन को, चाहे वह कामदेव के समान सुन्दर ही क्यों न हो, कोढ़ी और बुढ़ापेसे जीर्ण समझती है।

वेश्या जगत की जूठन, गन्दगी का पिटारा और नरक-कूप है। कौन बुद्धिमान ऐसी वेश्या के नर्म-नर्म ओठों को चुमना और उसे आलिङ्गन करना पसन्द करेगा ?

वेश्यामें और स्त्रियोंसे अधिक मोहन-शक्ति है।

यों तो संसार में जितनी स्त्रियाँ हैं, सभी पुरुषके चित्तको हरने वाली हैं ; पर साधारण स्त्रियोंकी अपेक्षा वेश्यामें चञ्चलता बहुत ज़ियादा होती है, इसी से उसमें पुरुष को मोहित कर लेने की शक्ति भी उनसे हज़ार गुणी ज़ियादा होती है। वेश्यायें अपने गाने-बजाने का जाल बिछाकर और रूपका

( ३८१ )

जुगा दिखाकर नौजवान पक्षियोंको, सहजमें, अपने फन्देमें फँसा लेती है। वेश्याओंकी लपक-भपक, चटक-मटक, नाजो-अदा और हाव-भाव तथा नखरों पर उठती जवानी के नातजुरबेकार नौजवान फिदा होकर, शीघ्र ही फँस जाते और इनके गुलाम हो जाते हैं। जो इनके दास या शिष्य हो जाते हैं, वे फिर किसीके नहीं रहते। उन्हें अपनी घर-गृहस्थी, अपने पूज्यपाद माता-पिता और अर्द्धाङ्गि कहलाने वाली स्त्री तक विषवत् बुरे लगते हैं।

साधारण नवयुवकोंको पागल बनाना, तो वेश्याओंके बाँये हाथ का खेल है। जब इन्होंने पकान्त बनमें रहनेवाले, वृक्षों के पत्तों और जल पर गुजारा करनेवाले महान् तपस्वी श्रृङ्गी और मरीचि तकको अपना चेला बनाकर छोड़ा, उनको अपने रूप-जालमें फँसाकर, उनके कठिन परिश्रम से किये हुए तपको क्षणभर में नष्ट कर दिया ; तब इनके लिये नादान नौजवानों को फन्देमें फँसाना कितनी बड़ी बात है ? ऐसी शिकार मारनेमें तो इन्हें जरा भी कठिनाई नहीं होती।

ये, दिव्य मणिधारी सर्प की तरह, देखने में बड़ी मनोहर होती हैं। ये अपनी रूपच्छटा से पुरुषों के मनों को मोह लेतीं, मधुर-मधुर बातों से चित्तोंको चुरा लेतीं तथा हाव-भाव और नीजो-अदासे हिये को हर लेती हैं। योद्धाओं के अग्नि-बाणोंसे चाहे रक्षा हो जाय, पर इन के नयनबाणोंसे किसी का निस्तार नहीं। इन के-बन्धल नेत्र प्रायः सभी के हृदयों में क्षोभ

( ३८२ )

करते हैं। किसी विरली ही सती का सपूत इनके नेत्र-बाणों से बचे तो बच सकता है।

वेश्या सन्नी राजसी है ।

वेश्यायें पुरुष का रक्त-मांस खा जानेवाली सन्नी डायन हैं ; क्योंकि जो काम डायनोंके सुने जाते हैं, वेही काम ये करती हैं। डायनें जिसे नज़र-भरकर देख लेती हैं, वह गल-गल कर मरता है और वे उसका कलेजा निकाल कर खा जाती हैं। वेश्यायें भी जिस पर अपने कटाक्षबाण चला देती हैं, वह पगला हो जाता है और फिर वे उसका कलेजा निकाल खाती हैं। वेश्यायें लड़के और नौजवान सब को खा जाती हैं ; खासकर धनियों की तो चटनी ही कर जाती हैं। इन से न राजा की रक्षा है और न प्रजा की। इनकी भूपेट में जो आ जाता है, ये उसी का करम-कल्याण कर देती हैं। ये देखते ही पुरुषों को घायल कर देती हैं और पीछे अपनी नज़र से उनके प्राण खींच लेती हैं। सर्प का डसा हुआ आदमी बच भी सकता है, पर इन डायनोंका डसा हुआ नहीं बचता। सर्पोंके तो सुँहमें विष रहता है, पर इन के समस्त शरीरमें विष रहता है। सर्प मनुष्य के पास आकर डसता है ; पर इन का विष तो दूरसे ही, इनके देखनेमात्र से ही, चढ़ जाता है। इनके अङ्ग-प्रत्यङ्ग और एक-एक बाल तकमें जहर भरा रहता है, इसीसे इनका कोई

( ३८३ )

अज्ञ भी, यदि पुरुष की नज़रोंमें आ जाता है, तो उस पर बरी तरहसे ज़हर बढ़ने लगता है। ज़हर बढ़नेसे फिर पुरुषकी ख़ेर नहीं। किसीने कहा है :—

धर्म-कर्म-धन-भक्षिणी, सन्तति-खावनहार।

वेश्या है अति राक्षसी, बुधजन कहत पुकार ॥

और भी :—

दर्शनात् हस्ते चित्तं, स्पर्शनात् हस्ते बलम् ।

मैथुनात् हस्ते वीर्यं, वेश्या प्रत्यक्ष-राक्षसी ॥

वेश्या साक्षात् राक्षसी है, क्योंकि वह देखने से चित्त को, छूने से बलको और मैथुन से वीर्य को हरती है।

वेश्याओंके कारण कुल-बधुएँ भ्रष्ट होती हैं।

— ✻ ✻ ✻ —

वेश्याओंकी बजह से श्रेष्ठ कुलवतीऔर पतिपरायणा अबलायें नाना प्रकारके कष्ट भोगती हैं। वेश्यामक न अपने सहधर्म-णियोंके पास आते, न उनसे बोलते और न उनका आदर-सम्मान करते हैं। पतिव्रता स्त्रियोंको बानेको अन्न और तन दाँकतेको कपड़ा भी नसीब नहीं होता ; पर वेश्याओंको, जो अपने पतियोंको तज, सैसुरकुल एवं पितृकुलको बद्नाम कर, वेश्यावृत्ति करती हैं, सब तरहके सुख मिलते हैं। पतिपरायणा

( ३८४ )

नारियोंको मरनेके लिये जहर तक नहीं मिलता, पर वेश्याओं को हज़ारों-लाखोंके जेवर मिलते हैं। वेश्यामहलोंकी सती स्त्रियाँ मिहन्त-मजदूरी करके पेट भरती हैं। अनेक कुलङ्कनायें खरबे कात-कात कर और आटा पीस-पीस कर अपनी शिशु-सन्तानों को पालती हैं। इस तरह नौसमभ लोग बड़ा अन्याय करते हैं। उनके अन्याय-आचरणके फल-स्वरूप इन दुष्टा वेश्याओंकी संख्या दिनों-दिन बढ़ती है ; क्योंकि जब धर्म-मार्ग पर चलनेसे भी कुलबधुओंको अन्त-वस्त्र तक नहीं मिलते, पतिका सुख नसीब नहीं होता ; तब वे अन्तसकी अग्नि शान्त न होने और नाना प्रकारके दुःख पानेसे दुःखित हो, अपना धर्मत्याग, अधर्म-मार्गका अवलम्बन करतीं और वेश्या हो जाती हैं। इसमें उनका अपराध नहीं ; क्योंकि जैसी इन्द्रियाँ मर्दोंके होती हैं, वैसी ही इन्द्रियाँ स्त्रियोंके भी होती हैं। काम मर्दोंको सताता है, तो स्त्रियोंको भी सताता है। जिस चीज़की क्वाहिश पुरुषोंको होती है, उसीकी स्त्रियोंको भी होती है। जो पुरुष आप खाते, रण्डियोंको खिलाते, आप मौज करते, वेश्याओंको मौज कराते ; किन्तु घरकी स्त्रियोंकी सुध भी नहीं लेते, उनकी स्त्रियाँ उनका सुँह काला करतीं और—उनके जीतेजी हो, उनकी बदनामी कराती हैं। वह जैसा करते हैं, वैसा फल भोगते हैं ; अतः अपना सुख चाहनेवाले समझदारोंको आगा-पीछा सोचकर, वेश्याओंसे सदा दूर रहना चाहिये।

( ३८५ )

वेश्याभक्तोंकी दुर्दशा ।

नासमभ नादान लोग जब वेश्याओंके कटाक्ष-वाणोंसे घायल होते हैं, तब रात-दिन अष्ट पहर चौंसठ घड़ी उन्हें वही वह दीखती हैं । वे उन्हें स्वर्गीय देवी समभ, उनकी हर तरह से स्तुति, पूजा और उपासना करते हैं । कोई कहता है—

दिलसे मिटना, तेरी अंगुरत हिनाईका ख्याल ।

हो गया गोशतसे, नाखुनका जुदा हो जाना ॥

कोई कहता है—

दिल वह क्या, जिसको नहीं तेरी तमन्नाये विसाल ।

चश्म वह क्या, जिसको तेरे दीदकी हसरत नहीं ॥

इस तरह उनके उपासक और भक्त उनको स्तुति किया करते हैं । उनकी ज़बानसे बात निकलती नहीं कि, उनके भक्त उसे फौन ही पूरी करते हैं । उनकी फ़रमायशें पूरी करनेके लिये, उनके सेवक अपनी ज़मीन-जायदाद गिरवी रख देते हैं, अपनी घरकी खीका जेवर तक उतार कर उनके हवाले कर देते हैं । इतनेपर भी, यदि कोई बुटि या ग़लती हो जाती है, तो वेश्यायें सख्त नाराज़ी ज़ाहिर करती हैं । उनकी नाराज़ी, वेश्याभक्तोंके लिये, ख़ुदके तीसरे नेत्र खुलने या महाप्रलय होनेके समान होती है । वे घबरा कर उनके चरणोंमें लोटते और कदमोंमें नाक रगड़-रगड़ कर माफ़ी माँधते हैं ।

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