भारतकोश
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शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

Devanagarihipublished544 पृष्ठ

( ३८६ )

जब वेश्याये' देखती हैं कि, हमारे उपासकोंके पास धन नहीं रहा, घर-घूरा सब बिक चुका ; तब वे उन्हें जृतियोंसे पिटवाकर अपने घरोंसे निकलवा देती हैं । पर वे वेश्या, इतनी बेइज्जती और जिलुते' उठाने पर भी, उनको छोड़ना नहीं चाहते; पैरोमें गिरते हैं, अनेक तरहकी खुशामदे' करते हैं, तब उन्हें ये अपने नीचे दर्जेके सेवकोंमें रहने देती हैं । अच्छे-बच्छे खानदानी अमीरोंके लड़कोंसे घरमें भ्राड़ लगवातीं, खाना पकवातीं, पीकदान साफ करवातीं और हुक्के भरवातीं हैं । कहाँतक लिखें, वेश्या-दासोंकी अन्तमें बड़ी मिट्टी झराब होती है । भगवान् दुश्मनको भी वेश्याके फन्देमें न फँसावे । वेश्या बुरी बला है । यदि वेश्याओंकी पूरी तारीफ़ लिखी जाय, तो एक पोथा हो जाय, इसलिये हम इस विषयको यही खतम करते हैं ।

वेश्या है अवगुण भरी, सब दोषोंका सिन्धु ।

अरूप दोष वर्णन किये, लाखों सिन्धुमें विन्दु ॥

ऐसी औगुणोंकी खान, धन-धर्म नसाने वाली, अबलाओं पर अन्याय करनेवाली, कुलबधुओंको दुष्कर्मोंका पाठ पढ़ाने-वाली, बाल-हत्या, पुत्री-हत्या और गोहत्या तक करानेवाली वेश्याको जो देखते, छूते और उससे रमण करते हैं, उनको विकार है ! नाचते समय वेश्या स्वयं कहती है :—

जब पूरण पापके भाण्डे तें,

भगवन्त-कथा न सुने जिनको ॥

( ३८७ )

एक गणिका नारी बुलाय लेंहूँ,

नचवावत हैं दिनकों-रनको ॥

मृदंग क्रहे—‘धिक् है ! धिक् है !!’

मजीर कहें—‘किनको किनको ?’ ॥

तध हाय उठायके नारि कहे,

‘इनको इनको इनको हनको ॥’

वेश्याकी चालें ।

‘वेश्यायें’ अपने यारोंको रिझाने और नये-नये शिकार फँसानेके लिये, मन्दिरों, मेलों-तमाशों और तीर्थ-स्थानों तथा बाग-बगोचोंमें जातीं और नाना प्रकारके मनमोहक वस्त्राभूषण पहनती हैं । कितनीही अपने यारोंकी इच्छानुसार श्रद्धांवर करतीं और कहती हैं “व्यारे ! तुम्हारे बिना हमें क्षण-भर भी कल नहीं पड़ती । माँके मारे हमारी नहीं चलती । माँके नाराज होनेके भयसे आपसे रुपया-पैसा लेना पड़ता है; वरना हमारी इच्छा नहीं कि, आपसे कुछ ले । आप हमारे सूरज और चाँद हो, आप ही हमारे पान का चूना, बिछौनेकी चादर, हुक्के की चिलम और थूकनेकी पीकदानी हो ।” नादान लोग इन की झूठी और मक्कारीकी बातोंपर लट्ठू होकर, इनको अपनी सच्ची प्रेमिका समझ लेते हैं; पर जहाँदीदा लोग जानते हैं कि, वेश्याओं में प्रीतिका नाम भी नहीं । अगर सूर्यमण्डलमें शीतलता हो, चन्द्रमा अग्नि उगलने लगे, विन्ध्या-चल समुद्र में तेरने लगे, तो वेश्या में प्रीति हो सकती है ।

( ३८८ )

आज तक जप में सत्य, कवे में पवित्रता, सर्पमें सहनशीलता, स्त्रियोंमें काम-शान्ति, नपुंसकों में वैश्य, शराबी में तरबचिता, राजा में मैत्री और वेश्या में सतीत्व न किसीने देखा और न सुना । वेश्यागामी कामकन्दला का नाम पेश करते हैं ; पर कामकन्दला वेश्या नहीं, गणिका थी । वेश्या और गणिका में बड़ा भारी भेद है । गणिका वेश्या से बहुत अच्छी होती है । वेश्या धन के लिए प्रेम प्रकट करके विषयी पुरुषों को तूत करती है । गणिका अनेक प्रकार की विद्याएँ जानती और प्रेम-प्रतीतिको समझती है । वेश्या नीच उपायों से कामियों को ठगती है ; पर गणिका उच्च प्रीतिरीति बांध कर धन हर्ती है । वेश्या केवल धन की साधिन होती है ; पर गणिका गुण, रूप और विद्वत्ता की भी प्राहिणी होती है । लेकिन आजकल गणिका कहाँ ? जिधर देखा, वेश्या-ही-वेश्या नज़र आती हैं । सब पूछो तो न गणिका भली और न वेश्या । दोनों से ही पुरुष के रूप, धन और यौवन की क्षति है ; अतः बुद्धिमानों को दोनों से ही बचना चाहिये । भूल कर भी, इन का नाम न लेना चाहिये ।

एक राजा और वेश्याकी कहानी ।

किसी पुराने ज़माने में एक रणधीर सिंह नामका राजा राज्य करता था । वह राजा था तो बड़ा प्रतापी और बलवान,

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पर कई राजाओंने मिल कर उसे हरा दिया। पराजय होते ही, वह राजधानीसे भाग गया। उसका प्रधान मंत्री गुणसिन्धु भी उसके साथ हो लिया। दोनों घूमते-घूमते एक और नगरमें पहुँचे। उस नगरमें कामिनी नामकी एक परमा सुन्दरी वेश्या रहती थी। उस वेश्याके धन-भागडार को देख कर कुवेर भी लजाता था। अपार धन होनेकी वजहसे, वह वेश्या किसी भी अमीरका आदर न करता थी। यद्यपि वह, वेश्या होनेसे, धना-कांक्षिणी और निर्धन-अपमान-कारिणी थी; तथापि उसने ब्रह्मिणी रणधीर सिंहका बड़े आदरसे आगत-स्वागत किया। अपने धन-भागडार राजाके लिए खोल दिये और भव्य भवन टिकनेके लिये बता दिये। उसकी सेवाके लिए अनेक दास-दासी नियुक्त कर दिये। अपने झूजाने को चाबियाँ राजाके हाथोंमें दे दीं और कह दिया कि, यह धन आपही का है। अपनी इच्छानुसार खर्चा कीजिये; दिलमें जरा भी संकोच न कीजिये। राजा रणधीर राज्य रहित होने पर भी, उस वेश्या का इतना सहज प्रेम देख, मन-ही-मन अत्यन्त प्रसन्न हुआ। उसे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय, विश्वासपात्री और सती समझ कर, एक दिन एकान्तमें अपने मंत्रीसे कहने लगा—“हे प्रधान! यह वेश्या बिना किसी स्वार्थके मेरे साथ इतना प्रेम रखती है। इसने अपना सर्वस्व मुझे सौंप दिया है और व्याहता स्वीसे भी अधिक आह्लाकारिणी है। यह सब देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य होता है। समझमें नहीं अरता, इस की क्या वजह है। सभी

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जानते हैं कि, वेश्याएँ किसीके साथ प्रीति नहीं करतीं। इनका प्रेम एकमात्र धनके साथ होता है और खूब धन पाने पर भी ये किसी की नहीं होतीं ; परन्तु यहाँ तो सब उल्टा ही दीखता है। यह सती और अविचल प्रेमवती है, इसमें मुझे जरा भी शक नहीं होता।” गुणसिन्धु अपने मालिक की आज़ादी को रणडी की बातों की धारामें बहती देख, दिल्ली करता हुआ, कहने लगा,—“राजन् ! वेश्याका विश्वास विश्वमें कौन करता है ? कागा जती नहीं होता और वेश्या सती नहीं होती। यह ज्ञात विश्वासयोग्य नहीं। यह किसीको प्यार नहीं करती। इसका एक मात्र प्यारा रुपया है। यह अपने वचनको कभी पूरा नहीं करती। यह कभी किसीसे नेह निर्वाह नहीं करती। झूठ बोलना इसका नियम और ब्रत है। इसके मनकी बात, इसके संकल्प और इसकी महत कामनाको सहजमें ही कोई जान नहीं सकता। यह आपका अत्यन्त आदर करती है। आपके साथ अटल प्रेम प्रकट करती है ; पर यह सुख क्षणिक है। मतिहीन लोग वेश्याके बारे विचारोंको न जान कर, उसकी ऊपरी बातों पर मर-मिटते हैं। वह उपरसे अमृत है, पर भीतरसे हालाहल विष है। वेश्या—आशाकी तरह, आरंभमें अतिशय आनन्ददायिनी होती है ; परन्तु अन्तमें अमित दुःखसे पददलित कर छोड़ती है। हरि और हर प्रभृति देवता भी वेश्या और मायाके सच्चे स्वरूप को नहीं जानते ; तब आदमी बेवारा किस क्षेतकी मूली है ?

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राजा पर मंत्रीको उपरोक्त बातों का बड़ा असर हुआ। उनके दिलमें तरह-तरहके विचार उठने लगे। उन्होंने वेश्या की प्रीतिकी परीक्षा लेनेकी ठानी। वह एक दिन साँस चढ़ा कर मुदाँ हो गये। राजाकी अन्त्येष्टि किया करनेके लिये लोग उन्हें श्मशान पर लेगये। वेश्या भी सफेद कपड़े पहन कर, सती होनेके लिये, चिताके पास पहुँची। वह ज्योंही चितामें गिरने लगी, त्योंही राजाने चितासे उठकर उसका हाथ पकड़ लिया और कहा—“प्यारी”! सच्ची सती!.. ठहर! ठहर! मैं जिन्दा हूँ।”

उस दिनसे राजा रणधीर सिंह उस वेश्याके एकदम गलाम हो गये। उन्हें मंत्री पर बड़ा क्रोध आया। वे उसे मूर्ख समझने लगे। अब राजाके दिन फिलने और मंत्रीकी बात सच्ची होनेका समय आया। राजाने वेश्याकी अपार सम्पत्ति खर्च करके, कई लाख पैदल, पचास हजार सवार और दस हजार हाथी वगैरः अपने हाथमें कर लिये। उस सेनाको लेकर उन्होंने अपने शत्रु पर चढ़ाई की और उसे पराजित कर अपना राज्य ले लिया। वेश्या पटरानी बनाई गई। सब रानियोंसे अधिक उसका मान होने लगा।

एक रोज राजाको बहुत ही प्रसन्न देखकर वेश्याने कहा—“महाराज”! मैंने आपके साथ जो भलाई की है, उसे आप यावज्जीवन नहीं भूलेंगे। क्या आप, उसके बदलेमें, मेरी भी एक मनोकामना पूरी करेंगे?” राजाने कहा—“प्यारी! तु जो कह

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में वही करनेको तैयार हूँ।” वेश्याने कहा—“महाराज ! मेरा एक प्राणाधार, परम प्यारा, नयनोंका तारा है। वह निरपराध, चोर समझा जाकर, विदर्भ नगरमें पकड़ा गया और आज तक जेलमें बन्द है। आप उसे कठिन कारागारसे छुड़ाकर, दासी को कृतार्थ कीजिये।”

वेश्याकी उपरोक्त बात सुनते ही राजाके होश-हवास जाते रहे। अकृ हवा हो गई, सन्नाटा छा गया, वे उगेसे हो गये। वे इकट्ठा वेश्याके मुँह की तरफ देखने लगे। कुम्हलाये हुए कमलके फूलकी तरह, उनका सिर नीचेको झुक गया। इस समय उन्हें मंत्रोंकी बातें याद आईं। उनके दिलमें, समुद्रकी लहरोंकी तरह, एक-पर-एक संकल्प-विकल्प उठने लगे। बड़ी देरके बाद वह बोले :—

“प्यारी ! सुख-दुःखकी साधन ! तुम्हें आज क्या हो गया है ? क्या तूने आज शराब पी ली है ? तू आज ऐसी बेहूदी बातें क्यों कर रही है ?” राजाने उसे बहुत तरहसे समझाया, पर वह अपनी बातसे जरा भी न डिगी। उसने कहा—“महाराज ! आप बहुत भोले हैं। जगत्में बिना स्वार्थके कोई भी मुहब्बत नहीं करता, जिसमें हमारा तो स्वार्थपरायण व्यवहार जगत्में प्रसिद्ध है। अगर आपको मेरे उपकारका लेशमात्र भी ध्यान है और आपके चित्तपर कृतज्ञताका जरा भी संस्कार है, तो आप मेरी इस प्रार्थनाको स्वीकार कीजिये।” लाचार, राजाने सेना भेजकर विदर्भ नगरको फतह

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किया और उस वेश्याके यारको जेलसे छुड़ाकर उसके हवाले किया।

बुद्धिमानो ! वेश्यासे सदा सावधान रहो। वह तुमसे प्रेम रखती है, तुम्हें चाहती है, ऐसा कभी मत समझो। अगर ऐसा समझोगे, तो धोखा खाओगे। वेश्या यारसे बातें करती है; पर उसका मन और जगह रहता है। वेश्या अपना तन हर किसीको सौंप देती है, पर मन किसीको नहीं सौंपता। वह क्षण-क्षणमें नई-नई बातें कहता है। एक शब्द दूसरेके, मुक्तिकूल कहना, तो उसका कर्त्ताव्य है। बातोंका लौटफेर और फेरबका ढेर सदा उसके पास मौजूद रहता है। वेश्या स्कूटकी पुतली है। उसे यथायथ रूपसे कोई भां जान नहीं सकता। वेश्या पाँच तरहके यार रखती है—(१) एककी तो वह तारीफ़ हो किया करती है, (२) दूसरेका धन लूटता है, (३) तीसरेसे सेवा कराती है, (४) चौथेको अपनी रक्षाके लिये रखती है, और (५) पाँचवें की सदा मसखरी किया करती है। वेश्या किसीसे भी प्रीति नहीं करती। जो नर वेश्याके बन्धनमें फँस जाता है, उसको मुक्ति चिकालमें भी नहीं होती। उसका सत्यानाश हो जाता है। सुख-शान्ति उसमें किनारा कर जाते हैं। कुटुम्ब परिवार वाले उसे धिक्कारते हैं। वेश्यागानों इस लोक और परलोकमें अनेक तरह-बेकष्ट और क्लेश भोगता हुआ, चौरासी लक्ष योनियोंमें भ्रमता रहता है। जिस तरह माँप अपनी पुरानी कैंचलाको त्याग देता है; उसी तरह वेश्या अपने करोड़पति यारको भी निर्धन होते

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ही, जूने मारकर निकाल देती है। इसलिये जिन्हें संसारमें सुख भोगना हो, वे वैश्याके नज्दीक न जावें।

किसीने क्या खूब कहा है :—

गाना न० १

रगड़ी नहीं किसी को यार, ओ घर बार लटाने वाले। तीखे नयन चलाने वाले, रगड़ी नहीं किसी को यार ॥ इनका कूठा है जंजाल, इनका खोटा है व्यवहार। इसमें नफा नहीं है यार, ओ घरबार लटाने वाले ॥ इनके नखेरे इनकी चाल, इनके चिकने-चिकने गाल। इनके लम्बे-लम्बे बाल, आकृत करने वाले ॥ रड़ी नहीं किसीको यार, ओ घर-बार लटाने वाले। इनकी उद्दबत, इनको बातोंमें मत आना ॥ इसपर दिलको मत ललचाना, इनकी उद्दबतसे घराना।

आकृत था जाय जाने वाले। रगड़ी नहीं किसी को यार। ओ घर-बार लटाने वाले ॥ जब तक पैसा तबतक रगड़ी। जबतक बिलसे तबतक मगड़ी। वह तो खा-खा हुई मुछगड़ी। तुम पर आने लगे तमाले। जब से रुक गई घरकी मोरी। माँगो भीख करो या चोरी। अब तो हवा जेल की खा ले। रगड़ी नहीं किसी की यार। ओ घर-बार लटाने वाले ॥

( ३६५ )

गाना न० २

पहले तो घरमें दाम बिछाती हैं रघिइयाँ ।

वे-दाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रघिइयाँ ॥

करके सिंगार शामको, छा बैठीं बाम पर ।

करती हैं फिर इधारा, वह मक्कार वेखतर ॥

देखा कि मालदार, कोई भ्राता है इधर ।

फौन किया सलाम, फिर उसने मुँकाके सर ॥

किस ढबसे तुम्हें चालमें, लाती हैं रघिइयाँ ।

वे-दाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रघिइयाँ ॥

लेकर सलाम हो गये, गेंडासे फूलकर ।

कोठे पै उसके चढ़ गये, सोचा न कुछ मगर ।

तकिया लगाके बैठ गये, सीना तामकर ।

रगड़ीने देखते ही, करो माल पर मज़र ॥

हँस-हँसके नाज़-नखरे, दिखाती हैं रघिइयाँ ।

वे-दाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रघिइयाँ ॥

गई-नमें हाथ डाल, बोली वह सोमबर :-

“पहलुमें लेके सोइये, मुने कलको रातभर ॥

दोनो मने उड़ायेगे, बड़ाह ता-सहर ।”

फिर नायकाजो बोली, कि जलदी शिकार कर ॥

दाम=जाल । बाम=छत ; भ्रातरी । वेदाने=बिना चारेके । मुर्गी-दिल= यहाँ दिलको मुर्गी पकी कहा है । गेंडा=एक भयंकर मोटा जड़ली जामर । सीना=छाती । सोमबर=चन्द्रबदनी ; चाँदी जैसी गोरी । पहलु=काल ता=तक । सहर=खेवा ।

( ३६६ )

बाते बना-बनाके, लुभाती हैं रघिइयाँ ।

वेदाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रघिइयाँ ॥

मक्कार नायकाकी, तो छन लीजिये दास्तान ।

जल्दीसे जाके अपना, उठा लाई पानदास ॥

बोझी—“तम्बाकू छालियाँ, * गूँगा दीजियेगा पान ।”

रंड़ी बोली—“हाँ, अभी आता है मेरी जान ! ॥”

पहला सवाल तुमको, सुनाती हैं रघिइयाँ ।

वेदाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रघिइयाँ ॥

जेबोंमें लगी देखने, वह हाथ डोलकर ।

सुट्टीमें भरके लाई, कुछ थोड़ासा मालोजर ॥

उस्ताद जोसे बोली—“जरा आइयो इधर ।

कल्या तम्बाकू छालियाँ, इन्हें लादे जल्दतर ”

फौरन ही फिर तो, पान खिलाती हैं रघिइयाँ ।

वेदाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रघिइयाँ ॥

चिन्हाके बोली नायका—“यहाँ होते जाइये ।

रक्ड़ी और दूध थोड़ासा, हलवा भी लाइये ॥

दो पैसेकी अफयन भी, तुम खाते आइयो ।

सदका गई उस्ताद, जरा जल्दी आइयो ॥”

थोड़ा-ही-थोड़ा करके, मँगाती हैं रघिइयाँ ।

वेदाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रघिइयाँ ॥

दास्तान—कहानी । छालियाँ—छपारी । * मालोजर—रूपया-पैसा ।

अफयन—अफोम । सदका गई=बलाये लूँ ; कुर्गान हूँ ।

( ३६७ )

जब सेठजीका हो गया-भोड़सा खर्व माल।

रंडीने फिर दी उन्हें, फौरन ही एक चाल ॥

गद्दी बचाके रख लिया, एक म्यानीमें रुमाव।

बोली कि झोड़ दो मुझे, इस वक्त है गैर हास।

अव्ययभका बहाना, बनाती हैं रथिडयाँ।

वेदाने सुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रथिडयाँ ॥

फिर नायकाजी बोली—“अजी सेठजी जनाब !

बनियेका और सनारका, देना है कुछ हिसाब ॥”

रगड़ो टसकके बोली—“नहीं रेत हो जवाब ?”

घबराके बोले सेठजी—“कुलवाइये शिताब ॥”

अब घरमें उनके, आग लगाती हैं रथिडयाँ।

वे-दाने सुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रथिडयाँ ॥

बनियेका और सनारका, जब दे चुके हिसाब।

फिर सेठजी पै और हुआ, एक मया इताब ॥

“जोड़ै बनाके लाइये, जल्दीसे लाजवाब।

फिर कौन है तुम्हारे सिवा, लूटे जा शबाब ? ॥”

हर रोज ताज़ा फिकर, बनाती हैं रथिडयाँ।

वेदाने सुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रथिडयाँ ॥

जोड़ैका नाम सुनते ही, बाज़ारमें जाकर।

कपड़ा लिया और लाये वह, दरज़ीको बुलाकर ॥

म्यानी—गुप्त अंग। औरतें रजस्वला होनेके समय उस अंगमें कपड़ा रख लेती हैं, ताकि खून-हैजसे धोती झरा न हो। शिताब—जल्दी। इताब—हुकम। लाजवाब—चै जोड़, अद्वितीय। शबाब—जवानोंका मज़ा।

( ३६८ )

कहने लगे—“सीं दो इत्ते, जलदो सजाकर ।”

रंडीसे कहा पहन लो, ऐ ! जान पहले नहाकर ॥”

इस शब फिर उसे, पास छलाती हैं रंडियाँ ।

वेदाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रंडियाँ ॥

शब-भर तो मज़ा सेठजीने, खूब उड़ाया ।

रंडीने सेहर होते ही, एक फ़िक़रा बनाया ॥

ऐसा कोई मर्द नहीं, आज तक आया ।

रग-रगमें मेरे दर्द था, तुम्हने मिटाया ॥

वे-परकी देखो कैसी, उड़ाती हैं रण्डियाँ ।

वे दाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रंडियाँ ॥

ये छुमते ही फिर सेठजी, फूलें न समोये ।

घरमें था जो कुछ मालोज़र, सारा ही ले आये ॥

गुलझरें कई रोज़ तक, खूब उड़ाये ।

जब कुछ न रहा पास, तो फिर फ़ाक्रोंपर आये ॥

शब लुब्बा बेईमान, बताती हैं रंडियाँ ।

वेदाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रंडियाँ ॥

रंडीने मूँड़-माँड़के, जब घरसे निकाला ।

आँखें जो खुलीं फिर, तो नज़र आया उजाला ॥

जो कहता था वहनोई, वह कहता नहीं साला ।

जब कुछ न रहा पास, तो अपने लगे मांसा ॥

शब=रात । शबभर=रातभर । सेहर होते ही=खेरा होते ही रग-रग=नस-नस । बेघर की=बिना सिर-पंर की । फाक्रों पर आये=उपवास करने लगे—भूखों मरने लगे ।

( ६६६ )

लो इस तरह, हज़ामत बनाती हैं रंघियाँ।

बेदाने सुर्ग-दिलको, फँसाती हैं रंघियाँ।

इकतरफ़ा और गज़ब, फ़लक-पीरने डाला।

गरमी जो हुई, फिरते हैं पक्ड़े हुए ख़ाला॥

जुज़ बहुत नहीं, और कोई पूछनेवाला।

फिर नीमको टहनोसे, पड़ा उनके पाखा॥

दोज़ख़का मज़ा अब तो, चलाती हैं रंघियाँ।

बेदाने सुर्ग-दिलको, फँसाती हैं रंघियाँ।

जिस कमरे पे होली थी, बहुत ब्यापकी इज़ज़त।

अब कोई नहीं पूछता, यह हो गई हालत॥

बेज़ार हैं सुरतसे, ग़ज़ब हो गई नफ़रत।

भड़वाँका इशारा है, कहाँको है ये मिष्ठत॥

किस जिह्वासे बनावोसे, उठाती हैं रंघियाँ।

बेदाने सुर्ग-दिलको, फँसाती हैं रंघियाँ॥

अब भी तुम्हें कुछ शर्मा, मियाँ सेठजी ! ब्राई।

जब बरमें गये, ज़तौसे मारे है खुग्राई॥

लो सुफ़तमें हसवा हुई, जिह्वा भी उठाई।

न माँ है : वफ़ादार, न फ़रज़न्द न माई॥

ज़्तों पे जो बैठें, तो उठाती हैं रंघियाँ।

बेदाने सुर्ग-दिलको, फँसाती हैं रंघियाँ॥

5 ग़ज़ब=शक्ति। फ़लक=श्राप्मान। पीर=देवता। गरम=श्रात- यक, उपदंश। ख़ाला=शिरन, लिंगोन्दिप। दोज़ख़=नरक। हसवा= बदनामी। फ़रज़न्द=बेटा।

( ४०० )

तरह हुए इकने, फिर आके सताया।

जाकरके लवे बाँम, यह रो-रोके छुआया ॥

जो माल कि था पास मेरे, मैंने लुटाया।

अब रख लो मुलाजिम, तो रहे आपका साया ॥

क्या रंग ज़मानेका, दिखाती हैं रँडियाँ।

वे-दाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रँडियाँ ॥

“शहबाज़” कलम रोक, अब आगे न बढ़ाना।

इतना ये बहुत है, जो तेरे कहनेको माना ॥

रंडोसे वफ़ा कब है ? यह जानता है ज़माना।

इस शब वह होती इमिला, खिन्न उसको ज़माना ॥

हसको नवाँ महीनो, बनाती हैं रँडियाँ।

वे-दाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रँडियाँ ॥

लो और सुनो सेठको, क्रिस्मतकी डुराई।

रंडीके जो लड़की दुहे, वह किसकी कहलाई ॥

हरेकने फिर उनकी तरफ़, उँगली उठाई।

रंडीकी जो लड़की है, इन्हींकी तो है जाई ॥

अब रिश्तेदार तुमको, बनाती हैं रँडियाँ।

वेदाने-मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रँडियाँ ॥

रंडीने छूटी नहाके, लो फिर रात जगाई।

हर भड़वा हरेक रंडी, हरेक नायका आई ॥


बरह हुए=दूर हुए। इश्क़=प्रेम। मुलाजिम=नौकर। साया=छाया। शहबाज़=कविका नाम है, जिसने यह कविता बनाई है। वफ़ा=भलाई। इमिला=गर्भवती। ज़माना=दुनिया। रात जगाई=रतजगा किया।

( ४०१ )

बोली कि सुबारक हो, यह दौलत तुने पाई ।

सदके तेरी बच्ची, यह खिलायेगी कमाई ॥

लो तुल्का नातहकीक, कहाती हैं रडियां ।

वे दाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रडियां ॥

इन सेठके लड़केने, उधर होय संभाला ।

लड़कीने जवान होते ही, जोबनको निकाला ॥

शैतानने इन दोनोंको, फिर बोखला डाला ।

लड़केने सेठकी उसी लड़कीको संभाला ॥

भाई-बहनको, पास छलाती हैं रडियां ।

वे दाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रडियां ॥

शैतानको श्रापिदें हैं, जरियते शैतान ! ।

लाहौल नहीं पकते, किधर है तुम्हारा ध्यान ? ।

दौलत भी गई मुस्तमें, खोया गया ईमान् ।

गर लाख रुपये दोजिये, तो क्या इनपर है ऐहसान ॥

और अपना ही ऐहसान, जताती हैं रडियां ।

बेदाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रडियां ॥

उपपत्त ।

जातिहीन, कुलहीन, अन्ध ; कुसित कुरूप नर ।

जरा-यसित कशगात, गलितकुडी अरु पांडर ।

सुबारक हो=फलों-फूलों; बधाई है । सदक=बलैयाँ लूँ ; कुबान होऊँ । तुल्का नातहकीक=जिधके बीजका पता न हो । बोखला डाला=पागल बसाया ; गुमराह किया । शैतान=खुदाका मुझालिफ, जो लोगोंको पुरी राह पर चलनेको बहकाता है । जरियते शैतान=शैतानको औलाद । लाहौल=नफरतका कलम । *

२६

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ऐसेहू धनवान होय, तो आदर वाकौ।

अपनो गात बिछाय, लेत रस सर्वस ताकौ।

गनिका विवेक-बेलकों, कदन करनवारी।

निरखि बच रहे कुलवन्त नर, रचत पचत मूरख हरषि ॥८६

89. What sensible man would like to have sexual intercourse with those prostitutes who give away their beautiful bodies for the sake of a little wealth even to those who are born blind, are ugly, are inactive due to old age, are foolish, are of low caste and are suffering from leprosy. These prostitutes are like knives to cut the creeper of reasoning.

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वेश्यासौ मदनज्वाला रूपेन्यनसेमथिता ॥

कामिर्भिर्यत्र ह्यनन्ते यौवनानि धनानि च ॥६०॥

यह वेश्या सुन्दरता रूपी ईधनसे जलती हुई प्रचण्ड कामाग्नि है। कामी पुरुष इस अग्निमें अपने यौवन और धनकी आहुति देते हैं ॥६०॥

खुलासा—वेश्या तेज् आगके समान है। जिस तरह आग लकड़ियोंसे जलती है; उसी तरह वेश्या रूपी अग्नि वेश्या के रूप-रूपी ईधनसे जलती है। जिस तरह होमकी अग्निमें घृत, चाँवल और तिल प्रभृतिको आहुति दी जाती है; उसी तरह वेश्याग्निमें कामी लोग अपनी जवानी और धनकी आहुति देते हैं। होमकी अग्निमें घृत चाँवल प्रभृति जिस तरह जल कर

( ४०३ )

राख हो जाते हैं; उसी तरह वेश्या-रूपी अग्निमें, कामियों के रूप, यौवन और धनकी राख हो जाती है। सारांश यह कि, वेश्यासे प्रीति करने वालोंके रूप, यौवन और धन कृतई नाश हो जाते हैं। रणडीबाज़ी करने वाले अनेकों करोड़पति स्नाकपति और दर-दरके मिखांरों हो गये। अतः बुद्धिमानोंको इस वेश्या-रूपी भयङ्कर अग्निसे सदा दूर रहना चाहिये; क्योंकि जिस तरह अग्निमें गिरनेवाला सर्वथा भस्म हो जाता है; उसी तरह वेश्या-रूपी अग्निमें गिरने वाला भी सर्वथा भस्म हो जाता है; • क्योंकि रूप-यौवन तो चन्द्र रोज़में हो स्वाहा हो जाते हैं। जब तक धन रहता है, वेश्या प्यार (झूटा दिखावटो प्यार) करती है। कामी धनहीन हुआ कि, वेश्याने उसे घरसे धक्के देकर या जूतियाँ लगवा कर निकाला। जब कामी इस दुर्गतिको पड़ु ब जाता है, तब वह या तो विष प्रभृति खाकर या गलेमें फाँसी लगा कर मर जाता है अथवा बोरी वगैरः करनेसे पकड़ा जाकर जेलमें ठूस दिया जाता है। वहाँ वह दुःख पाकर मर जाता है। अगर जेलकी अवधि पूरी करके चला भी आता है, तो फिर वेश्याके लिये धन देनेको बोरी प्रभृति करता है या किसीको हत्या करके, उसका धन हथियानेकी चेष्टामें पकड़ा जाकर, फाँसी पर लटक दिया जाता है।

दोहा ।

गनिका कनिका अगिन की, रूप समिध मजबूत ।

होम करत, कामी पुरुष, धन यौवन याहूत ॥६०॥

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सार—वेश्या धन और प्राणों के नाश करने वाली भयङ्कर अग्नि है ।

90 The prostitutes are the flames of passion burning with the fuel of beauty. Lustful men throw into that fire their wealth and health.

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करचुम्बति कुलपुरुषो वेश्याधरपल्लव मनोहमपि ।

चारभटचौरचेटकनटविदनिधीवनशरावम् ॥६१॥

वेश्याका अवर-पल्लव ( ब्राँठ ) यद्यपि अतीव मनोहर है ; किन्तु वह जासूस, सिपाही, चोर, नट, दास, नीच और जारोंके थूकनेका ठीका है । इसलिये कौन कुलीन पुरुष उसे चूमना चाहैगा ॥६१॥

खुलासा—सुन्दरी वेश्या के होठ निश्चय ही बढ़े मनोहर होते हैं, परन्तु उसके सुन्दर होठोंको चोर, बदमाश, गुण्डे, गुलाम, डाकू और भाँड़ प्रभृति महानीच चूमते और चूसते हैं ; इसलिये वह महाअपवित्र और गन्दे हो जाते हैं । ऐसे गन्दे और नापाक ओठोंको कौन प्रतिष्ठित और ऊँचे कुल का पुरुष चूमना चाहता है ? अर्थात् उसे नीच लोग ही चूमना चाहते हैं ; कुलीन पुरुष उस नीचोंके थूकनेके ठीकरके अपनी जीभ लगा कर उसे गन्दी नहीं करते ।

पहले लिख आये हैं कि, वेश्या पैसेकी गुलाम है, उसे पैसे

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से प्रेम है । वह रूप, यौवन, गुण, विद्या और उत्तम वंश प्रभृति को नहीं देखती ! उसे यदि भङ्गी और चमार धन दें, तो वह उन्हींकी हो जाती है । उसके सुन्दर ओठोंको वही चूमते-चाटते और उसके शरीरको गन्दा करते हैं । जिसे कुछ भी पवित्रता-अपवित्रताका ध्यान है, जिसने उच्च कुल और उत्तम वर्णमें जन्म लिया है, वह वैसी गन्दगीकी खानसे नेह लगाकर, क्यों अपनी आत्माको कलुषित करेंगी ? वेश्या नीच पापियोंके योग्य है, अतः नीच लोग ही उसके पास जायेंगे । भङ्गी और चमारोंका काम भङ्गी-चमार ही करेंगे ; ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य उनके कामोंको हरगिज़ न करेंगे ।

सोरठा ।

गनिकाके मृदु थोठ ; को कुलीन चुम्बन करें ? ।

नट, मट, विट, ठग, गोठ ; पीकपाल है सबनको ॥६१॥

सार— वेश्याएँ महा अधम और पापियोंके द्वारा भोगी जाती हैं, अतः वे श्रेष्ठ-कुलोत्पन्न पुरुषोंके योग्य नहीं ।

91. Though the leaf-like lips of a prostitute are beautiful, yet what respectable person would kiss that which is the pot where cheats, rogues, rustics, thieves and knaves throw their saliva.

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