भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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वसी ही पराई । विष तो सभीमें होता है । विषका अपना और पराया क्या ? मनुष्य अपने विषसे भी मरता है और पराये विषसे भी । अपने कूर्प में गिरनेसे भी डूब जाता है और पराये कूर्प में गिरनेसे भी । ख़ियोंसे सुखकी आशा करना, मृगमरीविकामे जल पानेकी आशा करनेके समान है । "भामिनी-चिलास"-रचयिता पण्डितेन्द्र जगन्नाथ महाराज कहते हैं और सच कहते हैं :—

अलकाः फणिशवतुल्यशीला

नयनांता परिपुखितेषुलीलाः ।

चपलोपमिता खलु स्वयं यावत

लोकै सुखसाधनं कथं सा ? ॥

जिस की अलकावलि सौंपके बच्चेके से ख़माव वाली है और जिसकी आँखोंके कटाक्ष सपुखवाणों की तरह लीला करने वाले हैं और जिस की ख़यं विद्युत्तुलतासे उपमा दी जाती है, हा ! वह खी इस लोकमें किस तरह सुखदायी हो सकती है ?

सार्रांश यही है कि, स्त्रियाँ नागिनोंसे भी अधिक भयङ्कर हैं, अतः अपना भला चाहने वालोंको इनसे दूर रहना चाहिये । इनमें सुख नहीं, घोर दुःख है ; अमृत नहीं, हालहाल विष है । सपंके काट्टेकी दवा है, पर इनके काट्टेकी दवा नहीं ।