शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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इस सर्पके खायेका तो इलाज ही नहीं । इसका काटा हुआ भी, कालसर्पके काटे हुए की तरह, न खेळता है और न बकरता है ।
उस्ताद ज्ञाक फरमाते हैं :—
इसा हो कालेने जिसको काफिर
तो वह फिर्सेके असरसे खेले ।
दहानो गेसूका तेरा मारा,
न मुँहसे बोले न सरसे खेले ॥
मसल मशहूर है, कालेका काटा हुआ नहीं खेळता— नहीं अच्छा होता । फिर तेरे मुँह और जुलफोंका काटा हुआ आदमी यदि मुँह से नहीं बोलता और सरसे नहीं खेळता, तो क्या आश्चर्य है ?
महात्मा कबोर भी कहते हैं :—
नागिनके तो दोष फन, नारीके फन बीस ।
जाको डस्यो न फिर जिये, मरिहै विश्वा बीस ॥
कामिनि काली नागिनी, तीन लोक मंकार ।
नाम-सनेही ऊबरा, विषिया खाये फार ॥
नारी निरखि न देखिये, निरखि न कीजै दौर ।
देखत ही तैं विष चढ़ै, मन आवै कलु और ॥
खी-मात्र नागिन-स्वरूपिणो हैं । जैसी ही अपनी खी,