भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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सन्देहोंका भँवर, अवितयका घर, साहसका नगर, दोषोंका खज़ाना, कपटका शतगृह, अविश्वसका क्षेत्र, बड़े-बड़े नरश्रेष्ठोंके भी क्रावूमें न आनेवाला, सारी मायाको पीटला—स्त्री-रूपी यंत्र, जिसमें विष और अमृत दोनों ही हैं, धर्मनाशार्थ, किसने बनाया ?

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श्रपसर ससे दुरादस्मात्कटाक्षविधानला—

त्यक्तित्विषमायोपित्स्पर्शाद्विलासफलाभूतः ॥

इतरफणिना दृष्टः शक्यश्चिकित्पितुमौषधे—

श्रुतुरवनिताभोगिघ्रस्तं त्यजन्तिहि मन्त्रिणः ॥८३॥

हे मित्र ! सहज ही क्रूर, विलास रूपी फण वाले और कटाक्षरूपी विषाग्नि धारण करनेवाले स्त्री-रूपी सर्पसे दूर भाग ; क्योंकि और सर्पोंका काटा हुआ तो मन्त्र तथा औषधियोंसे अच्छा हो सकता है ; पर चतुर स्त्री-रूपी सर्पके उसे हुए को भाड़-फूँक वाले गारुड़ी भी छोड़ भागते हैं ॥८३॥

खुलासा—स्त्री सर्पके समान है। इसका विलास इसका फण और कटाक्ष विषाग्नि है तथा यह स्वभावसे ही सर्पके समान क्रूर या विषैली है। यह स्त्री-सर्प और सर्पोंसे अधिक भयङ्कर है ; क्योंकि और सर्पोंका खाया हुआ मनुष्य मन्त्र या दवा अथवा भाड़फूँकसे कदाचित अच्छा हो भी जाता है ; पर