भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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किया? अफ़सोस! तुमने इस निरपराधितोकी नाक बुथा ही काट ली! इसका क्या अपराध था?" ये बातें सुनते ही गुणनिधि का चेहरा पीला पड़ गया। वह हक्का-बक्का हो गया। होश-हवास जाते रहे। उसके मुँहसे एक अक्षर भी न निकला। उधर कन्दर्पकला फूट-फूटकर रो रही थी। उसके पिता और चाचा वगैरः गुणनिधिसे नाक काटने की वजह पूछ रहे थे। इतनेमें सबेरा हो गया। गुणनिधिके सुसरालवाले कोतवालीमें दौड़े गये; रिपोर्ट लिखाई। पुलिसने आकर गुणनिधिको गिरफ़्तारकर लिया। फिर वह राजाके सामने पेश किया गया। राजाने सब तरहसे पूछ-ताछ और गवाही वगैरः लेकर गुणनिधिको १ सालकी क़ैद और दस हजार रुपया जुर्माना किया। गुणनिधिनो एक शब्द भी अपनी ज़वानसे नहीं कहा।

यह बात सारे शहरमें फैल गई। हर आदमीके मुँहपर यही चर्चा थी कि, नगरसेठके ज़माईने अपनी स्त्रीकी नाक काट ली। वह कल ही परदेशसे आया था। न्यायके समय वह चोर, जो रातको कन्दर्पकलाके पीछे लगा था, अदालतमें मौजूद था। उसने देखा कि, निरपराध गुणनिधि बुथा मारा जाता है—बेचारेको बुथा इतनी कड़ी सज़ा दी जाती है। उसके दिलमें जोश आया और उसने सारी घटना राजाको कह सुनाई। राजा अपने अब्दमियोकै साथ स्वयं उपवनमें गया। चोरने कन्दर्पकलाके पदचिह्न, अपने छिपनेका स्थान और कन्दर्पके यारकी लाश ये सब दिखा दिये। साथ ही उस मुर्देके मुँहमेंसे कन्दर्पकलाकी नाक