शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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निकालकर दिखा दी और उस लाशपर पड़ी हुई खूनकी बूँदोंपर भी ध्यान दिलाया । सारी घटना राजाकी समझमें आ गई । राजाने गुणनिधिको दण्ड-मुक्त किया, कन्दर्पकलाको जेलखाने भेजा, चोरको कई लाख रुपये इनाम दिये और गुणनिधिको अपना दीवान बनाकर, उसे अपनी कन्या व्याह दी । बुरेको बुरा और भलेको भला फल मिला ।
नतीजा इस कहानीका यही है कि, अधिकांश स्त्रियाँ अत्यन्त कुटिल, क्रूर-कर्म करनेवाली, लज्जाहीना और चञ्चलमति होती हैं । ये लोग अपने पति, पिता-माता, भाई-बन्धु और अपनी पेटकीओलाद तकसे द्रोह करने और उनका सर्वनाश करनेमें नहीं चूकतीं ।
जिस पतिने कन्दर्पकलाकी मुहब्बतमें, उसे खुश करनेमें, कोई बात उठा न रखी ; जिस पिताने उसे पालने-पोषने और पढ़ाने-लिखानेमें कोई चुटि न की, उसकी शादीमें करोड़ों खर्च कर दिये—उन पिता और पतिकी इज्जतका उसने कुछ भी न्ययाल न किया । इससे बढ़कर और दौरात्म्य क्या हो सकता है ? कुल्ला नारी कुलगौरव-हानि, लोकनिन्दा, जेल और फाँसी किसीकी भी परवा नहीं करती । ऐसी नारीसे जगदीश बचावे ! किसीने कहा है :—
आवर्त्तः संशयानामविनयभवनं पत्तनं साहसानां दोषाणां सन्निधानं कपटशतगृहं क्षेत्रमप्रत्ययानाम् । दुर्प्रबिं यन्महदभिर्नवरवृषभैः सर्वमायाकरगंड व्रीर्यत्र केन लोके विषममृतयुतं धर्मानाशाय सुष्ठम् ? ॥