शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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गरीब-से-गरीब घरको लज्जावती युवती स्वर्ग बना देती है ।
—गोल्डस्मिथ ।
प्रियदर्शनता, विनोदशीलता, प्रज्ञा और प्रभामें पुरुष स्त्रीकी बराबरी नहीं कर सकता । वह विपद्में पड़े हुए पतिकी उदासीको दूर करती, थके हुए की थकान दूर करती और अपने मुस्कराते हुए मुँहसे सारे घरमें आनन्दके फूल बरसाती है । —गिज़बोर्न ।
जब तक आदमकी शादी नहीं हुई, स्वर्ग उसके लिए काँटोंका घर था । देवताओंका गाना, पक्षियोंका चहचहाना, फूलोंका हँसना और सवेरेकी सुहावनी हवाके भोंके उसे बेमज़े मालूम होते थे । वह उदास फिरा करता था । ज्योंही हवा आई, उसका सारा दुःख दूर हो गया और नन्दन कानन आनन्द-भवन हो गया । —कैम्बेल ।
अगर संसारमें खी न हो, तो संसार इस तरह सूता और भयानक दीखने लगे जिस तरह वह मेला, जिसमें न तो खरीद-फरोख्त-कय-विक्रय और लेन-देन होता है और न कोई विल-बह-लानेका सामान होता है । स्त्रीकी मुस्कराहटके बिना सृष्टि उसी तरह निष्फल और व्यर्थ हो जावे, जिस तरह जीव बिना देह, फलफूल बिना वृक्ष, किलेदार बिना किला, नींव बिना महल और पतवार बिना नाव । अगर स्त्री नहीं तो प्रेम नहीं और प्रेम नहीं तो आनन्द नहीं । संसारमें जो सुख है वह स्त्रियोंके ही प्रतापसे है । अगर संसारमें कोई प्रकासकी रेखा है, तो वह इन्हींसे है ।