शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ४ )
उसने अपने सामने रखा हुआ गंडासा मेरी पीठ पर मारा ... .. ३२२
( २१ ) वह महलकी छत पर शतरञ्ज खेल रही थी, वहींसे उसने उस छैल-छबीलेको देखकर, उँगलीसे उसे सबीको दिखाया और ले आनेको कहा ... .. ३४१
( २२ ) उस नौजवानने कन्दर्पकलाके पास आकर उस की कामशान्ति की ... .. ३४२
( २३ ) विदेशसे आया हुआ गुणनिधि अपनी प्रियाको आलिङ्गन करके लेट गया, पर कन्दर्पकलाने कर-वट बदल कर मुँह फेर लिया । जब उसने उसकी साड़ी खींची, तो वह पलँगसे नीचे जा बैठी... ३४८
( २४ ) पति और घरवालोंके सो जाने पर, आधी रातके समय, वह यारसे मिलने चली । चोर भी उसके पीछे लग लिया ... .. ३५२
( २५ ) उसने अपने प्यारोंको मुर्दा देखा । उसने ज्योंही उसके मुँहमें अपने मुँहका पान दिया और उसका होठ चूसने लगी, त्योंही मुँहमें घुसे हुए प्रेतने मुँहसे उसकी नाक काट ली ... ३५७
( २६ ) वह यकायक पलँगसे उठकर चिल्लाने लगी— “इसने मेरी नाक काटली है, मुझे बचाओ, नहीं तो अब यह मुझे मार डालेगा ।” ... ३५८