शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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साथ रमण करनेकी ही इच्छा रखता है; तो इस जन्ममें परोपकार-पुण्य कर ; पुण्यके प्रतापसे तुझे कमनासी बाँकी भुक्तियों तथा स्थूल जाँघों और षष्ठन पक्षीकेसे नेत्रोंवाली, जवानीके नशेमें चूर और प्रेमसे प्रफुल्लित सुमुखी नारी अवश्य मिलेगी। वैश्य रख, अधीर मत हो। देख, परिडतराज जगन्नाथ अपने “भामिनी-विलास” में कहते हैं और बिल्कुल ठीक कहते हैं :—
लभ्यते पुण्यैर्गृहिणी मनोज्ञा तथा सपुत्राः परितः पवित्राः ।
स्फीतं यशस्तैः समुदेति नित्यं तेनास्य नित्यः खलु नाकलोकः ॥
पुण्यसे सुन्दर स्त्री मिलती है ; स्त्रीसे सच्चरित्र सुपुत्र होते हैं ; सुपुत्रोंसे विमल यश दिनों-दिन फैलता है और यशसे यह लोक स्वर्गके समान हो जाता है।
कुण्डलिया ।
रे चित ! जो चाहे रमण, कुछ कठोर नव नार ।
तो तू कर कछु सुकृत अब, मिले जु वह सुकुमार ॥
मिले जु वह सुकुमार, बंक भौ जघन विहारी ।
सुन्दर मुख मृदु हास, कंजसी अँखियाँ कारी ॥
यौवन मद भरपूर, प्रेमसों सदा प्रफुल्लित ।
मत अधीर घर धीर, मिले वह अवस, अरे चित ! ॥ १७ ॥
सार—अगर उठती जवानीकी कमलनयनी सुन्दरी कामिनी पर मन चलता है, तो पुण्य संचय करो।