भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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17. O my mind, why are you troubled at the sight of a woman whose breasts are firm and protuberent, whose thighs are fit for enjoying and whose face is lovely. If you have a desire for them, then practise virtue, because your wishes are not to be fulfilled without it.

मात्स्यमुत्सार्थं विचार्य कार्य-

मार्याः समर्थादभिदं वदन्तु ॥

सेव्या नितम्बः किमु भूशराणा-

मुत स्मरस्मरेविलसिनिनाम ॥१८॥

हे योग्यायोग्यके विचारमें निपुण श्रेष्ठ पुरुषो ! आप पक्षपात को छोड़, कर्तव्य-कर्मको विचार, और शास्त्रोंको देखकर यह बात कहिये कि, इस लोकमें जन्म लेकर मनुष्यको पर्वतोंके नितम्ब सेवन करने चाहियें अथवा कामदेवकी उर्गसेसे मन्द-मन्द मुस्कुराती हुई विलासवती तरुणी स्त्रियोंके नितम्ब ॥१८॥

खुलासा-विद्वानो ! आप शास्त्रोंको विचार कर, साथ ही ईश्वर व या पक्षपातको त्यागकर, इस बातका फैसला कीजिये, कि मनुष्यको इस दुनियामें आकर, स्त्रियोंके नितम्ब* सेवन करने चाहियें या पर्वतोंके नितम्ब ; अर्थात् उन्हें संसारमें आकर पर्वत-गुहामें वास करना चाहिये अथवा मोटी-मोटी जाँघों, कठोर कुचों और स्थूल नितम्बोंवाली स्त्रियोंके साथ भोग-विलास करना चाहिये ।

❖ नितम्बके दो अर्थ हैं :—( १ ) पर्वतका बीचका भाग, ( २ ) कमरका पिछला हिस्सा यानी वृत्त ।

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