भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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स्त्री-भोग और हरि-भजन,—ये दोनों ही काम उत्तम हैं। संसारियोंके लिये पहला और संसारसे उदासीनोंके लिये दूसरा अच्छा है। जिन्हें नवयुवती स्त्रियोंका भोग-विलास पसन्द हो, वे धनार्जन करें और उन्हें भोगें; पर साथ ही पुण्य सञ्चय भी करें; ताकि उन्हें इस सफ़रके बाद, अगले मुकाम पर भी; यानी आगे होनेवाले जन्ममें भी, फिर मृगनयनी स्त्रियाँ और अन्यान्य सम्पदायें मिलें। पर इस भोग-विलासमें बारम्बार मरते और जन्म लेनेका घोर कष्ट है। अतः जो जन्म-मरणके कष्टोंसे बचना चाहें, अनन्तकालस्थायी सुख भोगना चाहें, वे सुन्दरी-से-सुन्दरी स्त्रीको पापोंकी खान, दुःखोंकी मूल और नरककी नसैनी समझ, निर्जन गहन वनमें जा, किसी पर्वतकी गुफामें बस, सर्व मनोरथदाता पद्मपलाशलोचन हरिका एकान्न चित्तसे ध्यान करें।

दोहा ।

नीच वचन सुन अनख तज, करहु काज लहि भेव ।

कै तो सेवो गिरिवरन्, कै कामिनि-कुच सेव ॥१८॥

सार—सांसारियों के लिये नवयुवतियोंको भोगना और विरक्तोंके लिये पर्वत-गुहाओंमें हरिभजन करना उचित है। जो इन दोनोंमेंसे एक भी काम नहीं करते, उनका जन्म लेना बुरा है।