भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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जो मृगनयनी कामिनियोंका भोगते हैं, उनके दिन बड़े सुखसे कटते हैं। उन्हें मालूम नहीं होता कि, कब दिन निकलता है और कब रात होती है; दिन-पर-दिन, पक्ष-पर-पक्ष, मास-पर-मास, और वर्ष-पर-वर्ष आते हैं और चले जाते हैं; किन्तु जो कामिनियों के साथ रमण नहीं करते, उनके दिन बुरी तरहसे कटते हैं। उन्हें एक-एक क्षण एक-एक वर्ष मालूम होता और जीवन भारवत् प्रतीत होता है। महाकवि नज़ीर कहते हैं :—

कल शवे वस्त्रमें, क्या जल्द कटी थीं बड़ियाँ।

आज क्या मर गये, घड़ियाल बजाने वाले ?॥

कल भोग-चिलासमें रात कैसी जल्दी कट गई ! आज तो रात बीतती ही नहीं ! क्या आज घण्टा बजानेवाले मर गये ?

और भी किसीने कहा है :—

अय्याम मुसीबतके, तो काटे नहीं कटते।

दिन ऐशकी घड़ियोंमें, गुजर जाते हैं कैसे ॥

दुःखके दिन तो काटे नहीं कटते; पर ऐशके दिन सहजमें कट जाते हैं।

मतलब यह है कि, कोमलाड़ियोंके साथ समय हवा की तरह बीतता है; पर जिनके माशूकाएँ नहीं हैं; उनके दिन पहाड़ हो जाते हैं। हाँ, उनके दिन भी परमानन्दमें हवाकी तेजीसे बीतते हैं, जो ब्रह्मानन्दमें लीन रहते हैं; लेकिन जो न तो ईश्वरका ध्यान करते हैं और न सुन्दरियोंका सुख लूटते हैं, उनके दिन काटेसे भी नहीं कटते।