भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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( ७४ )

वैराग्यपक्ष ।

इस नापायेदार चन्द्रगुप्ता दुनियामें जन्म लेकर, विद्वानोंको दो राहोंमेंसे किसी एक पर चलना चाहिये :— ( १ ) या तो ब्रह्म-विद्याका अमृत पीना चाहिये, अथवा ( २ ) नवयुवती रम-गियोंके सुरतमें मग्न रहना चाहिये ।

रसिक कवि कहते हैं :—

त्याग लोक-सुख या रहें, मत्त परात्मा ध्यान ।

रमणी-रतिमें रत रहें, अथवा रसिक सुजान ॥

यद्यपि अपनी-अपनी रुचिके अनुसार दोनों राहें ही अच्छी हैं ; पर पहली की होड़ दूसरी राह कर नहीं सकती । उसके सुखमें कमी-बेशी—क्षय और वृद्धि तथा अनस्थिरता नहीं । उसका सुख सच्चा और अनन्तकाल-स्थायी तथा अक्षय है । उसमेंसे सदा पीयूष-धारा गिरा करती है ; पर दूसरीके सुखमें कमी-बेशी हुआ करती है । इसका सुख मिथ्या और क्षणस्थायी है । इसमेंसे जो अमृत-विन्दु टपकते हैं, वे वास्तवमें अमृत-विन्दु नहीं, किन्तु विष-विन्दु हैं ; लेकिन मोहसे अमृतसे जान पड़ते हैं । अब बुद्धिमान स्वयं विचार लें और जिस राहको अपने हृदयमें अच्छी समझें, उसे अवलोक्य करें ।

व्यप्य ।

अल्पसार संसार, तहाँ द्वै वात शिरोमनि ।

ज्ञान अमृतके सिन्धु, मगन है रहै रहै बुद्धिनि ॥