शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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नित्य-प्रनित्य विचार, सहित सब साधन साधें । की यह प्रौढ़ा नारि, धारि उर में आराधें ॥ चैतन्य मदन-शंकुश परसि, तिसकत मसकत करत रिश । रस मसत कसत विलसत हैंसत, इह विधि वितवत दिवसनिशि ॥ १६ ॥
सार—यदि सुखसे जीवन व्यतीत करना हो, तो दो में से एक काम करो:—या तो संसारसे मोह त्याग, एकाग्रचित्तसे, यशोदानन्दन कृष्णके कमल-चरणों की, निष्काम, भक्ति करो अथवा सुन्दरी रमणियों के रतिकेलि में मस्त रहो ।
19. In this unsubstantial world which has a very unsteady ending, there are only two courses for the wise. Either he spends his time by sharpening his intellect in nectar-like spiritual knowledge or he spends his time by laying his hands at and enjoying the body of a lovely and amorous woman having thick breasts,
मुखेन चन्द्रकान्तेन महानीलैः शिरोरुहैः ।
पाणिभ्यां पद्मरागाभ्यां रेजे रत्नमयीव सा ॥२०॥
चन्द्रकान्तेसे मुख, महानील जैसे केश और पद्मरागके समान दोनों हाथोंसे वह ल्नी रत्नमयी सी मालूम होती है* ॥२०॥
❖ यों भी कह सकते हैं कि, वह नाजनी अपने चन्द्रमाकी सी कान्ति वाले मुख, चोर नीले रंगके बाल और कमलके समान लाल हाथोंसे अपूर्व