शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१६ : शुक्रनीतिः
सदानुरक्तप्रकृतिः प्रजापालनतत्परः । विनीतात्मा हि नृपतिर्भूयसीं श्रियमश्नुते ॥ ६६ ॥
अतः जिस राजा की प्रजा सदा अनुरक्त रहनेवाली होती है। और जो स्वयं प्रजापालन में तत्पर रहता है एवं विनययुक्त होता है वह अत्यधिक श्रीको प्राप्त करता है ॥
प्रकीर्णविषयारण्ये धावन्तं विप्रमाथिनम् । ज्ञानांकुशेन कुर्वीत वशमिन्द्रियदंतिनम् ॥ ६७ ॥
**इन्द्रियजय की आवश्यकता का निर्देश—**राजा नाना विषयरूपी जंगलों में दौड़ते हुये मन को मथ डालनेवाले इन्द्रियरूपी हाथी को ज्ञानरूपी अङ्कुश से अपने वश में करे ॥
विषयामिषलोभेन मनः प्रेरयतीन्द्रियम् । तन्निरुन्ध्यात् प्रयत्नेन जिते तस्मिञ्जितेन्द्रियः ॥ ६८ ॥
विषयरूपी आमिष (मांस) के लोभ से मन इन्द्रिय को प्रेरित करता है। अतः उसे (मन) प्रयत्नपूर्वक रोके। उसके जीतने पर मनुष्य 'जितेन्द्रिय' कहलाता है ॥
एकस्यैव हि योऽशक्तो मनसः सन्निबर्हणे । महीं सागरपर्यन्तां स कथं ह्यवजेष्यति ॥ ६६ ॥
जो राजा केवल एक मन को भलीभांति जीतने में असमर्थ रहता है तो भला वह समुद्रपर्यन्त पृथ्वी को जीतने में कैसे समर्थ हो सकता है।
क्रियावसानविरसैर्विषयैरपहारिभिः । गच्छत्याक्षिप्तहृदयः करीव नृपतिर्ग्रहम् ॥ १०० ॥
क्रिया (भोग) के अन्त में प्रीति का विषय न रह जानेवाले, मन को आकृष्ट करनेवाले विषयों से आकृष्ट चित्त होकर हस्ती की भांति राजा बन्धन में पड़ जाता है ॥
शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धश्च पञ्चमः । एकैकन्त्वलमेतेषां विनाशप्रतिपत्तये ॥ १०१ ॥
शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध इनमें से प्रत्येक पृथक् पृथक् विषय लोगों के विनाश करने में समर्थ होते हैं ॥
शुचिदर्भाङ्कुराहारो विदूरभ्रमणे क्षमः । लुब्धकोद्गीतमोहेन मृगो मृगयते वधम् ॥ १०२ ॥
**जैसे शब्द विषय के द्वारा—**पवित्र, कुशके अङ्कुरों का आहार करनेवाला, अत्यन्त दूर तक भ्रमण करने में समर्थ भी मृग बहेलिया के गीत से मोहित होकर मृत्यु को प्राप्त होता है ॥